कुछ समय पहले भारत में यह चर्चा शुरू हुई थी कि देश के अलग-अलग विमानतलों के नाम फिर से उनके शहरों के नाम पर रख दिए जाएं। ऐसा इसलिए सोचा गया कि देश-विदेश से आने वाले लोग महान लोगों के लंबे-लंबे नामों को याद नहीं रख पाते, ऐसे नामों की घोषणा में भी दिक्कत होती है, और इंटरनेट पर उन्हें ढूंढने के लिए हिज्जे भी आसानी से नहीं मिलते हैं। अब आज भारत के अलग-अलग समाजों और इलाकों में अपने महान लोगों के लिए जिस तरह का एक उन्माद छाया हुआ है, उसे देखते हुए यह समझना मुश्किल नहीं है कि फिर से शहरों का नाम रखना आसान नहीं होगा। लेकिन इससे परे नामों को लेकर एक दूसरा मुद्दा यह है कि एक सरकार के जाने और दूसरी के आने के साथ बहुत सी योजनाओं या जगहों का नाम जिस तरह बदला जाता है, वह एक बहुत ही तंगदिली की बात है।
अब आज एक अलग मुद्दा सामने है कि दिल्ली में ऐतिहासिक रामलीला मैदान का नाम बदलकर अटल बिहारी वाजपेयी पर रखने की तैयारी चल रही है, और दो-चार दिनों में इस प्रस्ताव पर फैसला भी होना है। रामलीला मैदान एक ऐतिहासिक जगह रही है, जहां से देश की कुछ सबसे बड़ी राजनीतिक घटनाएं शुरू हुई हैं, जहां पर देश के कुछ सबसे ऐतिहासिक भाषण दिए गए हैं, ऐतिहासिक धरना और आंदोलन हुए हैं। इसके साथ-साथ इस मैदान पर हर बरस दशहरे पर रावण के पुतले जलाने का काम होता है जिसमें परंपरागत रूप से प्रधानमंत्री पहुंचते हैं, और देश के कुछ दूसरे सबसे बड़े नेता भी मौजूद रहते हैं। टेलीविजन के साथ-साथ अब रामलीला का चलन देश भर में घट गया है, लेकिन फिर भी रामलीला मैदान ऐतिहासिक रामलीलाओं का मंच रहा है, और राम के नाम से जुड़े हुए इस मैदान के नाम को बदलना एक नासमझी की हड़बड़ी है। जो भाजपा राम-राम कहते हुए राजनीति करती है, और राम का नाम लेकर सत्ता पर आई भी है, उससे तो कम से कम यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह ऐतिहासिक रामलीला मैदान का यह ऐतिहासिक नाम बदलने की सोचेगी।
आज देश के करीब दो दर्जन राज्यों में भाजपा और उसके गठबंधन की सरकारें हैं। केन्द्र सरकार के गठबंधन में भी भाजपा मुखिया है, और केन्द्र सरकार के सारे संस्थानों, और योजनाओं को अटल बिहारी का नाम देने की उसे आज आजादी है, और उसके पास सारे अधिकार हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में एकमुश्त दर्जन भर से ज्यादा जगहों और संस्थानों का नाम अटलजी पर रख ही दिया है, और भाजपा के दूसरे राज्यों में भी ऐसा ही सिलसिला चल रहा है। इसे देखते हुए ऐतिहासिक जगहों के नाम भी बदलकर अटल बिहारी वाजपेयी पर रखना न तो भाजपा के लिए फायदेमंद है, और न ही यह जायज है। वैसे भी देश में आज रेलवे स्टेशनों से लेकर शहरों तक के नाम सत्तारूढ़ पार्टियों की राजनीतिक प्राथमिकताओं के मुताबिक रखे और बदले जा रहे हैं। ऐसे में राम के नाम पर चले आ रहे एक मैदान का इतिहास बख्श देना चाहिए।

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