हिन्दी जगत में मुझे नहीं लगता है कि उद्भ्रांत जी का नाम किसी परिचय का मोहताज है। हिन्दी साहित्य के विराट फ़लक पर उन्होंने अनेक कालजयी महाकाव्यों जैसे ‘अभिनव पांडव’, ‘राधामाधव’, ‘त्रेता’, ‘वक्रतुंड’ और ‘अनाद्यसूक्त’ तथा काव्य नाटक ‘ब्लैक होल’ और लंबी कविता ‘रुद्रावतार’ सहित शताधिक कृतियों की रचना की है। यही नहीं, लेखन की अन्य विधाओं में गीत, गजल, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, निबंध, आलोचना और बाल-साहित्य पर भी जमकर कलम चलाई है। उनका लगभग सारा साहित्य पढ़ने के बाद मेरे मन में यह सवाल अपने आप पैदा होता है कि हिन्दी साहित्य में उन्हें जो पुरस्कार मिलने चाहिए थे,वे आज तक क्यों नहीं मिले ? क्या आज तक किसी ने उनका उचित मूल्यांकन किया? या उनका साहित्य समसामायिक अथवा उदात्त नहीं है? क्या उनकी भाषा-शैली ओजस्वी नहीं है? या फिर जान-बूझकर उनकी उपेक्षा की जा रही है? जब कुछ रचनाकारों को उनकी एक–दो कृतियों पर ही साहित्यिक समाज सिर-आँखों पर बैठा देता है, फिर उद्भ्रांत जी जैसे बड़े लेखक को साहित्यकारों की अवहेलना का शिकार क्यों होना पड़ रहा है? ये सारे सवाल कई दिनों से मेरे मन में पैदा हो रहे थे। कभी-कभी लग रहा था कि उनकी रचनाएँ मिथकों पर आधारित होने के कारण क्या आलोचकों को पूर्वाग्रहयुक्त कर रही हैं ? मगर जब मैंने उद्भ्रांत जी का समग्र साहित्य पढ़ा तो मुझे उनके साहित्य में वे सारी कसौटियाँ नजर आई, जो अच्छे-खासे पाठक वर्ग को आकर्षित कर सकती हैं,जैसे पारंपरिक मूल्य,उदात्तवाद,आधुनिकता,उत्तर-आधुनिकता,मार्क्सवाद सब-कुछ। आधुनिक जमाने के सापेक्ष मिथकीय पात्रों की व्याख्या करना अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उद्भ्रांत जी एक उच्चकोटि के साहित्यकार है और उन्हें जरूर यह पीड़ा सालती होगी कि उनके समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया। सही मायने में यह एक दुखद घटना है। हमारे शास्त्रों में कहा जाता है, समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कभी किसी को नहीं मिलता है। मगर मैं इस बात से पूर्णतया सहमत नहीं हूँ। जब आप कर्म करते हैं तो उसके अनुसार फल भी मिलना ही चाहिए। यह गीता का सार भी है। मैं फिर से उसी सवाल पर लौट आता हूँ कि उद्भ्रांत जी को उनके कर्मों के अनुरूप फल क्यों नहीं मिला?

उनके तीन संस्मरण ‘स्मृतियों के मील पत्थर’, ‘कानपुर, ओह कानपुर!’, ‘शहर-दर-शहर उमड़ती है नदी’ पढ़ने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि वे कितने ज्यादा समर्पित साहित्य अनुरागी हैं और बड़े-बड़े साहित्यकारों से व्यक्तिगत संबंध स्थापित कर अपने चेतना के स्तर को ऊपर उठाने की उत्कंठा है। उनकी सूक्ष्म चेतना हर पल शब्दों के साथ अठखेलियाँ करती रहती है, अनवरत, बिना किसी विश्राम के। इन तीनों संस्मरणों के अध्ययन के बाद मुझे उनके चारित्रिक गुणों के साथ-साथ देश में हो रही साहित्यिक गतिविधियों और उनका साहित्यकारों के प्रति प्रगाढ़ प्रेम,विश्वास और अटूट अपनत्व देखकर उनके प्रति मेरे मन में अगाध श्रद्धा पैदा होती है और साथ ही उन्हें उपेक्षित देखकर मन में एक प्रकार का गंभीर विषाद भी।

उनके ये तीनों संस्मरण एक से बढ़कर एक हैं, और साथ ही साथ, हिन्दी-जगत के लिए एक अनमोल धरोहर भी; क्योंकि इनको पढ़ने से हिन्दी के कई महान रचनाकारों के अंतरंग और अनछुए प्रसंग,उनकी रचनाधर्मिता, लेखन-प्रक्रिया,सूक्ष्म अन्वेषण दृष्टि, कल्पना-शक्ति तथा चेतना-बोध के बारे में जाना जा सकता है। उद्भ्रांत जी ने बेबाकी से निष्पक्षतापूर्वक उन रचनाकारों की कमजोरियों और ताकत पर प्रकाश डाला है। उनके संस्मरण उनकी साहित्यिक आत्म-जीवनी ही तो हैं। हरिवंशराय बच्चन की जीवनी ‘क्या भूलूँ,क्या याद करूँ’, महात्मा गांधी की आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ की तरह ही इन संस्मरणों में सत्य का पूरी तरह से अन्वेषण किया गया है।

उद्भ्रांतजी ने शुरू में ही इस बात को स्वीकार किया हैकि हरिवंशराय बच्चन जैसे महान लेखक जब शुरू-शुरू में अपने पैसों से पुस्तकें छपवाते थे तो मेरी क्या औकात थी! उन्होंने भी अपनी नौकरी छोड़कर लेखकीय जुनून को पल्लवित करने के लिए अपनी बेटी सर्जना के नाम से प्रकाशनगृह खोलकर अपनी साहित्यिक कृतियों का प्रकाशन किया। जिस तरह अमृतराय अपने पिताजी प्रेमचंद की जीवनी ‘कलम के सिपाही’ में लिखते हैं कि व्यावसायिक दृष्टिकोण के अभाव में उनके पिता प्रिंटिंग प्रेस खोलने के कारण कंगाल होते जा रहे थे,ठीक उसी तरह उद्भ्रांत जी भी साहित्य के प्रति सच्चे अनुराग और समर्पण के कारण अपने खून-पसीने की गाढ़ी कमाई खर्च कर घर फूँक तमाशा देख रहे थे।  वे वित्तीय संकट और आर्थिक विपन्नता के शिकार हो गए थे, मगर उनकी ज्ञान-पिपासु आत्मा उत्कृष्टता की खोज में देश के कोने-कोने में समकालीन वरिष्ठ और कनीय लेखकों से मिलने का कोई अवसर नहीं चूक रही थी। अमृत लाल नगर,यशपाल, भगवती प्रसाद वाजपेयी, अमृत राय, हरिवंश राय बच्चन, नागार्जुन, अज्ञेय और कितने बड़े-बड़े नाम, शायद ही उन्होंने कोई मौका खोया होगा। उनकी बैचेन आत्मा उन्हें चुपचाप कहीं बैठने नहीं देती थी।वे अंतरात्मा की आवाज सुनते थे, खरी-खोटी सुनाने में भी कभी पीछे नहीं हटे। आज भी वह जूनियर लेखकों को प्रेरित करते है और उनका दिग्दर्शन भी।

जब मुझे चीन में साहित्यिक यात्रा के दौरान चीन के कवि लू-शून के बारे में जानने,समझने,परखने का अवसर  मिला तो मुझे उनका यह कथन याद आ गया कि वह अपने बेटे को कभी भी लेखक बनने की  सलाह नहीं देंगे ताकि वह अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल इधर-उधर की निरर्थक बातों में नहीं करेगा। यह लू-शून का वक्तव्य था अपने बेटे के लिए। मैंने इस वक्तव्य पर काफी गौर-विचार किया कि उद्भ्रांत जी जीवन भर कलम घिसते रहे, मगर उन्हें मिला क्या?आधुनिक युग की आपाधापी में किसी के पास समय नहीं है, कुछ सोचने-समझने या पढ़ने का, तब फिर किसी लेखक के साहित्यिक अवदान का सही मूल्यांकन कैसे हो सकता है ?

‘मंतव्य’ के संपादक हरेप्रकाश उपाध्याय ने उनके संस्मरण ‘शहर-दर-शहर उमड़ती है नदी’ में लिखा है, “ उद्भ्रांत जी शायद अपनी पीढ़ी के अकेले कवि हैं,जिन्होंने महाकाव्य,प्रबंध-काव्य,गीत,नवगीत,गजल,मुक्तछंद के साथ समकालीन कविता,कहानी,उपन्यास,संस्मरण और आलोचना के क्षेत्र में अपने पीढ़ी के कवियों से बहुत अधिक लिखा है। इतना कुछ होने के बावजूद उन्हें केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, सरस्वती सम्मान,व्यास सम्मान का न मिलना अपने आप में चयनकर्ताओं की निष्पक्षता पर सवालिया निशान खड़ा करता है।

आधुनिक लेखक के पास ‘स्वांत सुखाय’ के सिवाय और क्या विशिष्ट उपलब्धि हो सकती है, जिस पर उसे गर्व हो सकें। यह दूसरी बात है कि अपनी भाषा की सेवा भी किसी शाश्वत साधना से कम नहीं है, मगर क्या हमारा साहित्य समाज का उत्थान कर सकता है ? आज जब हमारे नीति निर्माता यह कहते हैं कि हिन्दी से देश का विकास तकनीकी,चिकित्सकीय,कानून और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में नहीं हो सकता हैं, तब विदेशियों की हमारे प्रति क्या सोच हो सकती है! ऐसे राजनैतिक परिवेश में मिथकीय पात्रों पर आधारित रचनाओं की क्या सार्थकता रह जाती है?  मगर मैं उपरोक्त तथ्यों से बिलकुल सहमत नहीं हूँ। कुछ आलोचकों का कहना है कि उद्भ्रांत जी ने  केवल मिथकों पर लिखा है और आज ये सब अप्रासंगिक है। अज्ञेय की भाषा में बर्तन को ज्यादा घिसने से मुल्लमा छूट जाता है। क्या कवि की कृतियाँ राधा-माधव,वक्रतुंड,अभिनव पांडव,त्रेता ,अनाद्य-सूक्त आदि पर यह लागू होता है? कदापि नहीं, उद्भ्रांत जी की साहित्यिक यात्रा बहुत ही लंबी,व्यापक और सार-गर्भित रही है। इस लंबी यात्रा में मिथकीय कृतियों के अतिरिक्त उन्होंने बड़ी संख्या में महत्वपूर्ण समसामयिक काव्य-सृजन भी किया है,परिणाम में जो उनके किसी भी समकालीन कवि से बहुत अधिक है।

‘शहर-दर-शहर उमड़ती है नदी’ में लेखक ने अपने यायावरी जिंदगी का ब्यौरा दिया है कि सन 1960 के बाद हिन्दी पट्टी के विभिन्न शहरों कानपुर,अलीगढ़,आगरा,लखनऊ,गोरखपुर,इलाहाबाद,पटना,जयपुर,भोपाल,रायपुर के अतिरिक्त कई हिन्दीतर भाषी प्रदेशों का भी दौरा किया है। इस संस्मरण में आगरा,अयोध्या,इलाहाबाद,गोरखपुर,बनारस,बिहार, राजस्थान,रायपुर,भोपाल,महाराष्ट्र की विशेष स्मृतियाँ है तथा लेखक हिंदुस्तान के जिन-जिन जगहों से गुजरे हैं, उनका भी जिक्र है। इस दौरान जितने भी साहित्यकार उनके संपर्क में आए,चाहे वे छोटे रहे हों या बड़े, उनसे संवाद जोड़ने में कोई कमी नहीं छोड़ी।

अब आगरा की बात क्यों ही न लें। उनके पुरखों की जन्मभूमि है,ब्रजभाषा की स्थली है। शायद पूर्वजों के वंशानुगत (जेनेटिक) गुणों ने ब्रजभाषा भाषा के माधुर्य, भाषागत संस्कार और वहाँ कण-कण में बसी कृष्ण की रास-लीला उनके लिए ‘राधा-माधव’ महाकाव्य के प्रेरणा का स्रोत बनी। इस पुस्तक का पहला अध्याय “ऊधौ,मोहि ब्रज बिसरत नाहीं” में अपने अतीत की यादों को लेखक ने तरोताजा किया है।

पुरस्कारों की राजनीति का भी उद्भ्रांतजी ने अपने अनुभवों के माध्यम से अच्छा-खासा खुलासा किया है। उदाहरण के तौर पर नीरज जैसे महान गीतकार को‘यश भारती’ पुरस्कार के लिए मुख्यमंत्री मुलायम सिंह से  सिफ़ारिश करानी पड़ी थी। उन्होंने यह भी कहा, “क्या करें आजकल जमाना ही ऐसा है? उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान में बड़ी राजनीति चलती है और उसमें मुलायम सिंह जी की पकड़ है। सही कहूँ तो वास्तव में यह पुरस्कार मुझे मिला नहीं है,वरन मैंने उनसे छीना है!” इसी तरह वीरेन डंगवाल को जब साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया, उस समय श्रीलाल शुक्ल जूरी के सदस्य होने के बावजूद दिल्ली की मीटिंग में उपस्थित नहीं होते है और ‘यात्री’ फैसला खुद सुना देते हैं। आप ही कहिए क्या यह पुरस्कार वैध है ? क्या तकनीकी तौर लिया गया उनका निर्णय सही था? आठवें दशक में कथाकार ज्ञानरंजन ने अपने दोस्त नरेश सक्सेना को उनकी एक भी पुस्तक प्रकाशित नहीं होने के बावजूद भी ‘पहल सम्मान’ से विभूषित कर दिया। क्या साहित्य जगत में यह पारदर्शी पहल है ? ऐसा ही एक प्रसंग विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी के बारे में भी आता है कि वे अपने परम मित्रों को लाभान्वित करने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाते है। नामवर सिंह जी को भर पेट कोसने वाले तिवारी जी को जब यह समझ में आ जाता है कि नामवर जी को प्रभावित किए बिना उनकी दाल गलने वाली नहीं है तो वे उनके अनुज काशीनाथ सिंह को ‘रेहान पर रग्घू’ उपन्यास (जिसे काशीनाथ स्वयं श्रेष्ठ उपन्यास नहीं मानते है) को पुरस्कृत करने के लिए अपने परम शिष्यों अरुण कमल और लीलाधर जगूड़ी को जूरी का सदस्य बना देते हैं,जबकि उस समय पुरस्कार की बारी कविता के क्षेत्र की होती है।

       अब आप अच्छी तरह समझ गए होंगे, साहित्यिक कृतियों की श्रेष्ठता का मूल्यांकन करने के बजाए रचनाकार किस खेमे से संबद्ध रखता है, यह ज्यादा मायने रखता है। साहित्य अकादमी में संयोजक होने के उनकी अपनी पत्रिका ‘दस्तावेज़’ के कुछ अंकों में अकादमी का ही एक पृष्ठ का विज्ञापन अंतिम कवर पेज पर छपने लगा तथा अपने ऊपर तमाम लोगों से लेख लिखवाकर पाँच सौ पृष्ठों का एक ग्रंथ नेशनल पब्लिशिंग हाऊस से प्रकाशित करवाना क्या तिवारी जी द्वारा अपने पद का दुरुपयोग नहीं है ? पाठकों को लगता होगा कि शायद उद्भ्रांत जी को कोई पुरस्कार नहीं मिला है, इसलिए वे अपने मन में सुषुप्त हीन ग्रंथि के कारण उनका नजरिया केवल दूसरों की खामियाँ ढूँढना है। मगर यह सरासर गलत है, इस संदर्भ में मार्केण्डेय की टिप्पणी खरी उतरती है-

“उद्भ्रांत ! तुमने इतना अधिक और गुणात्मक दृष्टि से इतना महत्वपूर्ण कार्य किया है कि उसके सामने ये अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवि बौने नजर आते हैं।“

एक पुरस्कार संस्था के पतन का भी इस संस्मरण में जिक्र है कि किस तरह रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास के अध्यक्ष ने प्रथम हरिवंश राय बच्चन पुरस्कार स्थापित कर उद्भ्रांत जी को देने की घोषणा कर कहा कि  यह मुरारी लाल त्यागी (जो वस्तुत शिक्षा माफिया हैं) द्वारा दिया जाएगा,जिसमें मंच पर सुषमा स्वराज मौजूद रहेंगी। मगर उद्भ्रांत जी ने उसे लेने से मना कर दिया तो इस पर नाराज होकर उन्होंने अखबारों में दूसरी सूचना छपवाई कि वह पुरस्कार जो पहले इक्कीस हजार का घोषित किया गया था, अब बढ़ाकर पाँच लाख का कर दिया गया है और इसे मुरारी लाल त्यागी को ही दिया जाएगा। बाद में पता चलता है कि वह महज एक ड्रामा ही था।

“शामे-अवध की अदबी रोशनी” नामक अध्याय में उद्भ्रांत जी की नजरों में लखनऊ में तीन तीर्थस्थल है अर्थात अमृत लाल नागर, यशपाल और बाबू भगवती चरण वर्मा। इनके अतिरिक्त, ठाकुर प्रसाद सिंह, श्रीलाल शुक्ल, कुँवर नारायण,मुद्राराक्षस,गिरिधर गोपाल और कृष्ण नारायण कक्कड़ जैसे मठ भी। इस संस्मरण में एक उदाहरण उल्लेखनीय है, जब उद्भ्रांत जी वर्मा जी से पूछते हैं, “आपने अपने घर का नाम ‘चित्रलेखा’ क्यों रखा ?” तो वे हँसते हुए  कहते हैं,“लेखक जब घर बनाता है तो उसे ऐसा नाम देना चाहता है, जो उसके जाने के बाद लोगों की स्मृति में रहें। चित्रलेखा मेरा प्रिय उपन्यास है, उसे जनता ने प्यार दिया और उस पर फिल्म भी बनी तब इससे बेहतर और इस घर के लिए क्या नाम हो सकता था ?” इस संस्मरण पर मुझे कन्नड भाषा के प्रसिद्ध अनुवादक डॉ॰ टिप्पे स्वामी की याद आ गई, जिन्होंने अपने घर का नाम ‘अनुवाद’ रखा। इसी तरह जब उद्भ्रांत जी उनसे कविता से हटकर उपन्यास लिखने के रहस्य के बारे में पूछते हैं तो उनका सटीक जवाब यह रहता है,“हिंदुस्तान में कविता लिखने से रोटी मिलने वाली नहीं है- जब यह बात मुझे समझ में आई तो मैं उपन्यास और कहानी की तरफ मुड़ गया।”

मुद्राराक्षस जी को मैंने उद्भ्रांत जी के साथ लखनऊ के एक साहित्यिक सम्मेलन में देखा था। यह वे ही मुद्रा राक्षस है, जिनके वृहद उपन्यास ‘मेरा नाम, तेरा नाम, वियतनाम, वियतनाम’ के प्रकाशन में उन्होंने काफी मदद की थी और उनकी प्रतिभा की खुले मन से तारीफ करना उनमें अंतर्निहित एक सच्चे साहित्यकार के उदात्त चरित्र का परिचय देता है।

श्रीलाल शुक्ल को साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत उपन्यास ‘राग दरबारी’ की उन्हीं की उपस्थिती में  पुस्तक की  भदेस भाषा की आलोचना करना उद्भ्रांत जी के सच्चे आलोचक मन को दर्शाती है। कहने का अर्थ यह है कि उद्भ्रांत कहे खरी-खरी, चाहे उनसे अपने संबंध ही खराब क्यों न हो जाएँ। इस अध्याय में राजेश जैसे बौद्धिक संवेदना वाले कवि की लखनऊ में दसवीं मंजिल से कूदकर आत्म-हत्या कर लेना अपम्ने आप में साहित्य के मूल्यांकन पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है। इस घटना पर उद्भ्रांत जी ने ‘मौत की छलांग’ नामक कविता भी लिखी थी।

इलाहाबाद की याद आते ही बच्चन जी की याद आना स्वाभाविक है। यहाँ पर सुमित्रानंदन पंत तथा हरिवंश राय बच्चन दोनों के बीच ‘पंत के दो सौ पत्र’पुस्तक के प्रकाशन को लेकर विवाद पैदा होता है और मामला इतना तूल पकड़ता है कि पंत जी कोर्ट में शरण लेनी पड़ती है। इन पत्रों में कुछ पत्र ऐसे थे,जिनमें कांता जी के पक्ष को सही मानते हुए धर्मवीर भारती की आलोचना थी या अमृत लाल नागर जी की आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए उस वर्ष उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिलवाने के लिए बच्चनजी को भी ध्यान में रखने के लिए कहा गया था। इससे पंत जी की छ्बि को आघात पहुंचता था, इसलिए उन्होंने सुझाव दिया था कि पत्र संपादित करके प्रकाशित किए जाएँ। बच्चनजी उसके लिए तैयार नहीं हुए और वह पुस्तक प्रकाशित हो गई। दोनों के बीच मध्यस्थता की भूमिका का निर्वाह उद्भ्रांत जी करते हुए नजर आते हैं। इसी अध्याय में डॉ राम कुमार वर्मा, महादेवी वर्मा,जानकी वल्लभ शास्त्री,अमृत राय और उनके महाकाव्य ‘राधामाधव’ का ब्लर्ब लिखने वाले सत्य प्रकाश,शैलेश मटियानी,दूधनाथ सिंह आदि के भी प्रसंग है। इसके अतिरिक्त, रवीन्द्र कालिया जी द्वारा उनके महाकाव्यों ‘राधामाधव’  और ‘अभिनव पांडव’ की पांडुलिपियाँ तथा कुछ कलाकृतियाँ मंगवाकर ज्ञानपीठ से प्रकाशित होने के आजीवन न्यासी के लिखित आश्वासन देने के बावजूद उन्हें पाण्डुलिपि लौटा दी जाती है तो लेखक उनके ऊपर सुप्रीम कोर्ट के वकील से 25 लाख रुपए का हर्जाना भरने के लिए नोटिस देते हैं। कहने का अर्थ यह है कि साहित्यकारों का समाज भी ईर्ष्या-द्वेष,घृणा,ऊंच-नीच,पक्षपात जैसी अनेक सामाजिक विद्रूपताओं से भरा हुआ है, भले ही ऊपर से सारस्वत साधना में लीन दिखता है, मगर वैसा स्वच्छ हैं नहीं।

ऐसा ही एक उदाहरण उद्भ्रांतजी इस संस्मरण के अध्याय “गोरखबानी,प्रेम की बानी” में देते हैं। गोरखपुर में जवाहर लाल नेहरू कॉलेज के प्रबन्धक श्री शिब्बन लाल सक्सेना द्वारा हिन्दी विभाग में लेक्चरार का पद विज्ञापित किया गया था। लेखक ने भी फॉर्म भरा और अपने पिता का उनके नाम लिखा हुआ पत्र लेकर गए तो उन्होंने कहा,“तुम शर्मा जी के बेटे हो, इसलिए झूठ नहीं बोलूँगा। विज्ञापन तो औपचारिकता पूरी करने के लिए किया गया था। कॉलेज में जो सज्जन पढ़ा रहे है, इंटरव्यू में उन्हीं की पुष्टि होनी है।” इस दृष्टांत से लेखक कॉलेजों में होने वाली नियुक्तियों के बारे में उस जमाने का यथार्थ चित्रण करते हैं।

अगले अध्याय “सुबहे-बनारस से टपकता काव्य-रस” में उद्भ्रांत जी की बनारसी स्मृतियाँ सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की यादों को ताजा करती है। धूमिल जब बीमार होते है तो वे उन्हें देखने जाते हैं तो धूमिल जी उनसे कहते हैं,“ तुम्हें शायद यह पता न  हो कि शुरुआत मैंने भी गीत लेखन से ही की थी और पिछले दशक के प्रारम्भ में बनारस की पत्रिकाओं में मेरे गीत छपते रहते थे– यह अलग बात है कि मैंने फिर गीत से दूरी कर ली,लेकिन आज भी उन्हें बहुत रुचि से पढ़ता हूँ और सराहता हूँ।”

बनारस के बाद बारी आती है बिहार की। “बिहार में साहित्य विहार” अध्याय में लेखक बिहार के साहित्यिक जमावड़ों में किस तरह शराब का प्रचलन है, इस बात का जिक्र करते है। लेखक लिखते हैं कि पीने की बात आई तो याद आया कि एक कोने में देशी दारू-जिसे ठर्रा कहा जाता है-से लबालब भरा हुआ एक ड्रम रखा हुआ था और पीने वाले,जिनमें ज़्यादातर युवा ही थे,थोड़ी-थोड़ी देर में उसका भरपूर प्रयोग कर रहे थे। पीने पर किसी की रोक नहीं थी,जिसकी वजह से कई लोग उल्टियाँ करते देखे गए। इस अध्याय में जानकी वल्लभ शास्त्री,प्रभात जी, रामधारी सिंह दिनकर से जुड़े संस्मरण हैं। दिनकर जी का मर्मस्पर्शी संस्मरण इस प्रकार है :-

“ बिहार में भूमिहारों में लड़की की शादी अभिशाप होती है। लड़के वाले खून चूस लेते हैं। भतीजी की शादी के लिए एक लड़के वाले के पास गया तो लड़के के पिता ने लंबी-चौड़ी मांग रख दी। मैंने कहा – ‘मेरे पास पैसे नहीं है।’ वह बोला – “क्यों,अभी तो आपको ज्ञानपीठ का एक लाख रुपए का पुरस्कार मिला है और कह रहे है कि पैसे नहीं है।” पुरस्कार की राशि पहले ही घर-गृहस्थी में खर्च हो चुकी थी। मैंने लड़के के पिता के सामने टोपी उतारकर रख दी और बोला –“भाई साहब! इस राष्ट्रकवि की टोपी आपके पैरों पर रख दी है। इस संबंध को हो जाने दीजिए।”

रामधारी सिंह दिनकर को उनकी विचारपरक पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पर साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। उद्भ्रांत जी के अनुसार पुरस्कार मिलने के पीछे इस पुस्तक की भूमिका अकादमी के संस्थाप्क अध्यक्ष भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा लिखा जाना था, जबकि उन्हें यह पुरस्कार उनके काव्य ‘उर्वशी’ पर मिलना चाहिए था, जो उनकी सबसे बड़ी पहचान थी। उद्भ्रांत जी के शब्दों में सत्ता झुककर लेखक को सम्मानित करें,अच्छी बात यह होगी, यह नहीं कि सम्मानित होने के लिए लेखक सत्ता के निकट जाता दिखाई दें। उनके विचार से ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पर पुरस्कार नेहरू की भूमिका के बिना मिलता या राहुल सांकृत्यायन या भगवत शरण उपाध्याय की भूमिका होती तो दिनकर जी का गौरव और ज्यादा बढ़ता। इस अध्याय में नागार्जुन तथा खगेन्द्र ठाकुर से भी जुड़ी स्मृतियाँ है। जैसे राजकमल प्रकाशन वाले नागार्जुन को दिल्ली के एक होटल में सात दिन रखकर किस तरह‘भस्मांकुर’ जैसा खंड काव्य लिखवा देते है, यह उनके समर्पण की पराकाष्ठा दर्शाती है। उस दौरान पटना में यूनियन के लोग हिन्दी अधिकारी और अनुवादक के पदों पर बिहार के लोगों की नियुक्ति की मांग कर रहे थे। ऐसे अवसर पर हिंदी अधिकारी के तौर पर उद्भ्रांत जी ने जो कार्यक्रम किया था, उसमें बाबा नागार्जुन मुख्य अतिथि थे और साथ में थे खगेन्द्र ठाकुर। बाबा को उन लोगों को डांट लगानी पड़ी, “ मध्य प्रदेश से गेंहू आता है तो आप लोग क्या खाने से मना कर देते हो या कहते हो कि हम बिहार का ही गेंहू खाएँगे? चावल कहीं का भी हो ,आप उसे खाते हो कि नहीं ? मेरी कविताएं सारे देश में पढ़ी,सुनी और पढ़ाई जाती है। कोई नहीं कहता कि नागार्जुन तो बिहार के है,हम उन्हें नहीं पढ़ेंगे? आप लोगों को ऐसी बातें करते शर्म नहीं आती।”

इस अध्याय में अरुण कमल का भी प्रसंग आता है कि किस तरह साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिलने के बाद उनके व्यवहार में बदलाव आता है। नामवर और प्रोफेसर कमला प्रसाद की कृपा से मिले ऐसे पुरस्कारों की बदौलत इस महाकवियों की ऐसी मुद्राएँ किसी अश्लील फिल्म की तरह साहित्य जगत में चलती नजर आती है। ‘अभिनव पांडव’ के संदर्भ में उन्होंने लेखक का मज़ाक उड़ाते हुए कहा था, “ आप उत्तर आधुनिक काल के पहले भक्त कवि है।”

आज के समय महत्त्वपूर्ण होने के लिए क्या चाहिए, उस पर उद्भ्रांत जी दृष्टिपात करते है:-

  1. विद्वानों,निर्णायकों की चापलूसी करने के साथ-साथ गुपचुप तरीके से वरिष्ठों,श्रेष्ठों और विरोधियों को काटते रहने की कला में प्रवीण होना।
  2. अकादमी पुरस्कार प्राप्त करना।
  3. अकादमी पुरस्कार देने की जूरी में अपना स्थान बनाना।
  4. लाभ पहुँचाने वाली अन्य समितियों में भी सदस्यता का जुगाड़ करना।
  5. अकादमी की ओर से विदेश यात्रा करना।
  6. किसी बड़े प्रकाशन संस्थान की पत्रिका का संपादक होना।
  7. बड़े आलोचकों का कृपापात्र होना।

ये सारी योग्यताएँ जुटा लेने के बाद आपको महान होने से कौन रोक सकता है? तब लेखन की गुणवत्ता की बात कौन करेगा और उसे पूछेगा भी कौन?

फिर वे लौटते है अपनी जन्म-स्थली राजस्थान। “पधारौ म्हारों देश” में ‘डेली न्यूज’ के संपादक और कवि-कथाकार दुष्यंत, हरीश करमचंदानी,नंद चतुर्वेदीजी, कौशलनाथ उपाध्याय, डॉ रामप्रसाद दाधीच,धनपत परिहार,मीठेश निर्मोही,मुरलीधर वैष्णवऔर पद्मजा शर्मा से उद्भ्रांतजी की मुलाक़ात होती हैं। डॉ॰ रामप्रसाद दाधीच ने उनके महाकाव्य ‘राधमाधव’ और ‘प्रज्ञावेणु’ से प्रेरित होकर  ‘गीतगोविंद’ और ‘धर्मक्षेत्रे कर्मक्षेत्रे’ का काव्यानुवाद किया और’गीत गोविंद’ के काव्यानुवाद को उन्हीं को समर्पित भी किया। इस संस्मरण में ओम भाटिया की बहुचर्चित कहानी ‘कब्रभाई’ का भी उल्लेख है,जिसकी पृष्ठभूमि राजस्थान के ऐसे हिन्दू भाइयों की है, जो किसी मुसलमान के मरने पर कब्र खोदने का काम करते है।

दीवार में साहित्य का एक गढ़ रहता था” अर्थात छतीसगढ़ की राजधानी रायपुर वाया विलासपुर में उनकी साहित्यिक मुलाकातें विश्व रंजन,जयप्रकाश मानस,सुधीर सक्सेना,डॉ अशोक सिंघवी, नंदकिशोर तिवारी आदि से होती है। इस यात्रा के दौरान उनका नक्सल क्षेत्र ‘दंतेवाड़ा’ का भी भ्रमण होता है,जो आगे जाकर उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘नक्सल’ की पृष्ठभूमि निर्माण करता है।

इसी तरह “साहित्य के प्रदेश के मध्य में” अध्याय में भोपाल के उनके संस्मरणों में उन्होंने मंडलोई, सुधीर सक्सेना, अनिल जनविजय आदि साहित्यकारों का विशेष उल्लेख किया है।

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