इस दौर में *मज़हब ए इस्लाम* को आतंकवाद से इस तरह जोड़ दिया गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी गैर मुस्लिम के सामने इस्लाम का शब्द ही बोलता है तो उसके मन में तुरंत आतंकवाद का ख्याल घुमने लगता है जैसे कि आतंकवाद मआज़ अल्लाह इस्लाम ही का दुसरा नाम है…..जबकि हिंसा और इस्लाम में आग और पानी जैसा बैर है, जहां हिंसा हो वहाँ इस्लाम की कल्पना तक नहीं की जा सकती, इसी तरह जहां इस्लाम हो वहाँ हिंसा की हलकी सी भी छाया भी नहीं पड़ सकती..इस्लाम अमन व सलामती का स्रोत और मनुष्यों के बीच प्रेम व खैर ख्वाही को बढ़ावा देने वाला मज़हब है..

और क्यों ना हो जबकि इस्लाम का शब्द ही जिस का असल माद्दा “सीन, लाम, मीम” हैl जिसका शाब्दिक अर्थ बचने, सुरक्षित रहने, सुलह व अमन व सलामती पाने और प्रदान करने के हैं, हदीस ए पाक में इस शाब्दिक अर्थ के लिहाज़ से इरशाद है:

……*المسلم من سلم المسلمون من لسانه و يده*

जिसका अनुवाद “सबसे अच्छा मुसलमान वह है जिसके हाथ और जुबान से मुसलमान सलामत रहें” है

इसी माद्दे के बाब इफआल से शब्द इस्लाम बना है, इसलिए साबित हो गया कि इस्लाम का शब्द ही हमें बताता है कि यह मज़हब अमन व शांति, बन्धुत्व व भाईचारगी का मज़हब है लेकिन फिर भी मैं इससे आगे बढ़ कर यह बताना चाहती हूँ कि इस मज़हब अर्थात इस्लाम का बनाने वाला, इसकी शिक्षा नबियों के माध्यम से इंसानों तक पहुंचाने वाला अर्थात सारे ब्रह्मांड का पैदा करने वाला जिसे मुसलमान अपना रब और अल्लाह कह कर पुकारते हैं वह अपने बन्दों पर कितना मेहरबान है चाहे वह मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम उस रब की रहमत का अंदाज़ा इस घटना से लगाए और फिर हमारे गैर मुस्लिम भाई बहन ज़रा सोचें कि क्या वह लोग जो उस मज़हब के मानने वाले हैं जिसका रब अमन व रहमत का ऐसा हुक्म देता है वह किसी इंसान का खून बहा सकते हैं?? वह घटना यह है

रिवायत में आता है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम जो अल्लाह के रसूल व नबी हैं उनका यह मामूल था कि वह बिना अतिथि के खाना नहीं खाते थे जब तक कोई अतिथि उनके दस्तरख्वान पर नहीं होता खाना नहीं खाते लेकिन एक बार ऐसा इत्तेफाक हुआ कि आपके पास कई दिनों से अतिथि नहीं आ रहे थे और तलाश करने पर भी कोई नहीं मिल रहा था, जब कई दिन गुज़र गए तो अआप को एक बुज़ुर्ग (बूढ़े) मुसाफिर नज़र आए उन्होंने उस मुसाफिर को अपना अतिथि बना लिया और अपने घर ले कर आए खाना खाने के लिए दस्तरख्वान बिछाया गया फिर आप अपने अतिथि को लेकर दस्तरख्वान पर बैठे आप ने फरमाया: अल्लाह के नाम से खाना शुरू कीजिये! उसने कहा कि मैं तो अपने बुत ही के नाम से खाना खाउंगा इसलिए खिलाना है तो खिला देl हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि मैं तो अल्लाह के नाम से खिलाउंगा उसने जवाब में कहा कि मैं बुत ही का नाम ले कर खाउंगा खिलाना है तो खिला वरना मैं चला और यह कह कर वह घर से बाहर निकल गया इतने में अल्लाह पाक ने हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की ओर जिब्रील अलैहिस्सलाम के जरिये यह वही भेजा की ऐ इब्राहीम! तूने मेरे बन्दे को नाराज़ कर दियाl हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने हैरत भरे अंदाज़ में अर्ज़ किया ऐ अल्लाह! वह तेरा बन्दा है? वह तो तेरा नाम तक लेने को तैयार नहीं.. अल्लाह पाक ने इरशाद फरमाया की मैं उसे 80 साल से खिला रहा हूँ और तुम 1 दिन नहीं खिला सके..

इतना सुनना था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम उसके पीछे दौड़े और एक पहाड़ी के पास उसे देखा आपने आवाज़ लगाईं कि आएं खाना खा लें, वह बुज़ुर्ग बोले मैं अपने बुत ही के नाम पर खाउंगा आपने इरशाद फरमाया ठीक है उन्होंने हैरत से पुचा कि अभी तक तो आप अल्लाह के नाम पर ही खिला रहे थे इतनी जल्दी परिवर्तन कैसे आ गई? आप ने फरमाया: उसी रब का हुक्म है तभी मैं खिला रहा हूँ..इतना सुनना था कि वह तड़प उठे और कहा कि आप खाना बाद में खिलाना पहले उस रब का कलमा पढ़ाओ जिसकी रहमत इतनी व्यापक है..

सुबहान अल्लाह सुबहान अल्लाह

यह है मजहब ए इस्लाम जिसकी झलकी मैंने आपके सामने पेश की अब आइए मैं मुबल्लिगे इस्लाम, दाई ए इस्लाम, हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पवित्र जीवन के प्रकाशित कोनों में से एक कोना आपके सामने पेश करती हूँ कि उन्होंने आतंकवाद को किस प्रकार आतंकवाद को मीलों दूर फेंकते हुए मुसलमान तो मुसलमान गैर मुस्लिमों के साथ कैसा अमन व सलामती भरा व्यवहार अपनाया आप जीवन के हर हर पल प्रेम व भाईचारगी का दर्स देते रहे और खुद अमली नमूना पेश फरमाते रहे एक बार की घटना है

एक यहूदी शायर जो आपसे बहुत नफरत करता था आपकी शान में गुस्ताखी भरे शेर लिखा करता था और लोगों को मजहबे इस्लाम से दूर करने की कोशिश करता थाl उसी यहूदी का जनाज़ा आपके सामने से गुज़रा आप उसके जनाज़े को देख कर खड़े हो गए तो सहाबा रज़ीअल्लाहु अन्हुम ने अर्ज़ किया या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम! आप उसके लिए खड़े हुए जो आपकी गुस्ताखी करता था, आपने इरशाद फरमाया: क्या हुआ क्या? वह इंसान नहीं था?

आपने इंसानियत का इतना अधिक लिहाज़ रखा कि अगर कोई हमें सब व शितम करे चाहे वह काफिर ही क्यों ना हो लेकिन हमारा यह अखलाकी फरीजा है कि हम उसको इंसानियत का हक़ जरुर दें, यह है मज़हब ए इस्लाम का मुहब्बत भरा दर्स गैर मुस्लिमों के साथ, तो क्या यह कौम किसी गैर मुस्लिम को ना हक़ क़त्ल कर सकती है?

इसी तरह आपकी जीवन का पल पल गुजरा यहाँ तक कि मक्का विजय के मौके पर जो आपने अपनी उम्मत को अमन व सलामती का जो दर्स दिया उसकी मिसाल किसी मज़हब में ना थी ना है ना रहेगी कि कुफ्फार और वह दुश्मन जिन्होंने आपको अपने देश में तरह तरह की तकलीफें दी और केवल तकलीफ ही नहीं बल्कि हमेशा मौत की घात उतारने की कोशिश करते रहें और यहाँ तक मजबूर कर दिया कि आपको अपने प्यारे वतन मक्का को छोड़ना पड़ा लेकिन फिर भी जब कुछ सालों के बाद आप की फतह हुई और फातेहाना शान से मक्का में दाखिल हुए तो आपने सबको माफ़ कर दिया और सब अमन व अमान व सलामती के साथ अपने देश अपने घर में रहने दिया….यह है मज़हब ए इस्लाम और इसकी पवित्रता का दर्सl

इसी तरह सहाबा अमन व अमान का दर्स देते रहे उनके बाद ताबईन फिर तबा ताबईन और फिर हर दौर में उलेमा ए इस्लाम औलिया ए किराम और सुफिया ए इज़ाम उल्फत व मुहब्बत का दर्स देते रहे और आज तक मज़हब ए इस्लाम में उल्फत व मुहब्बत का दर्स दिया जा रहा है…

इस लेख से स्पष्ट रूप से यह बात साबित हो गई कि आज जो इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ा जा रहा है यह सरासर अन्याय है…और अगर कोई ऐसा व्यक्ति आतंकवाद करे जो टोपी और कुर्ता पहना हो तो उसे देख कर यह नहीं कहा जा सकता कि मुसलमान आतंकवादी हैं क्योंकि मुसलमान केवल टोपी दाढ़ी रख लेने का नाम नहीं है बल्कि जिसके अन्दर लोगों के खून की हिफाज़त करने का जज़्बा होगा, नाहक कत्ल व गारत को रोकने वाला होगा वह मुसलमान होगा क्योंकि मज़हब ए इस्लाम इसी की तालीम देता है…मैं अंत में स्पष्ट शब्दों में यह कहती हूँ कि जहां आतंकवाद है वहाँ इस्लाम का नाम व निशान भी नहीं हैl

आखिर में अब मैं अपनी कौम को संबोधित करते हुए कहना चाहूंगी कि हर मुस्लिम अपने इस्लाम को अच्छे से समझे; ताकि हर उठते हुए फितने का जवाब डट कर दे सके और गैर मुस्लिमों के सामने अपने इस्लाम की हकीकत को पेश कर सकेंl

इस लेख को खुद भी पढ़ें और समझें और अगर किसी गैरमुस्लिम को समझाना हो तो इसका अनुवाद अंग्रेजी में करके उन तक इस्लाम के मुहब्बत भरे संदेश को जरुर पहुंचाएंl

और तथाकथित अमन पसंद जालिमों आतंकवाद के नाम पर इस्लाम के और विशेषतः मदरसों के छोटे छोटे बच्चों को बम व बारूद से तबाह मत करो, उन पर अत्यचार के पहाड़ ना तोड़ो!

*जब चाहा हमको जोड़ा है बारूद व बम हथियारों से*

*जोड़ा है मुस्लिम को तुमने दहशतगर्दी के तारों से*

*दिखलाया तुमने हमको सदा बस सितम के पर्दों पर*

*है बैर तो ज़ालिम को फकत दीन के पैरुकारों से*

( न्यू एज इस्लाम से)

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