सृजनगाथा डॉट. कॉम. के बैनर तले रूस की सरजमीं पर राजधानी मॉस्को में आयोजित होने वाला यह 15वां अंतराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन था । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और हिंदी-संस्कृति को प्रतिष्ठित करने के लिए साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़/साहित्यिक वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम द्वारा, विभिन्न सहयोगी संस्थाओं के आत्मीय सहयोग से किये जा रहे इस प्रयास के अनुक्रम में अब तक रायपुर, बैंकाक, मारीशस, पटाया, ताशकंद (उज्बेकिस्तान), संयुक्त अरब अमीरात, कंबोडिया-वियतनाम, श्रीलंका, चीन, नेपाल, मिस्र, असम-शिलांग, बाली (इंडोनेशिया) तथा राजस्थान में 14 अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन  कर चुकी है। 

यूँ अनेक पर्यटन कम्पनियाँ देश-विदेश की यात्राएं करा रही हैं,पर संयोजक जयप्रकाश मानस की मौलिक सूझ का स्वागत किया जाना चाहिए कि उन्होंने शब्द-संस्कृति के इस आयोजन को अकादमिक पर्यटन से जोड़ा । इस क्रम में यह संस्था देश और विशेष रूप से  विदेशों की धरती पर सहभागी साहित्यकारों की साहित्यिक विधाओं की प्रस्तृति के साथ उनकी कृतियों के विमोचन को अंजाम देती रही है । विदेशों में काम कर रहीं हिंदी संस्थाओं व हिंदी साहित्यकारों के जुड़ाव ने इसे समृद्धतर किया है । संस्था के संस्थापक अध्यक्ष के बाद 14 वें सम्मेलन तक मूर्धन्य आलोचक खगेन्द्र ठाकुर अध्यक्ष रहे । मास्को में आयोजित 15वें सम्मेलन में वरिष्ठ कवि रमाकांत उद्भ्रांत तीसरे अध्यक्ष चुने गए । कवि शमशेर के जीवन के अंतिम वर्षों में मानवीय ढंग से उनकी सम्पूर्ण सार-सँभाल का जिम्मा उठाने वाली कवयित्री सुश्री रंजना अरगड़े और राजकमल प्रकाशन के प्रमुख अशोक माहेश्वरी इसके उपाध्यक्ष हैं।

राधा माधव को अंतरराष्ट्रीय टैगोर सम्मान

रूसी समय अनुसार लगभग साढ़े दस बजे माँ सरस्वती को माल्यार्पण और मनमोहक सरस्वती वंदना के बाद मूर्धन्य कवि उद्भ्रांत एवं अन्य वरिष्ठ साहित्यकारों के अध्यक्ष-मण्डल में उद्घाटन सत्र शुरू हुआ। सम्मेलन के लिए विशेष रूप से तैयार कराए गए सुंदर बैजेज़ से अध्यक्ष-मण्डल के सभी सदस्यों को नवाज़ा गया। इसके उपरांत संयोजक जयप्रकाश मानस ने अब तक हुए आयोजनों की संक्षिप्त ब्यौरा पेश किया। सम्मान समारोह की कड़ी में सर्वप्रथम मूर्धन्य कवि उद्भ्रांत को उनके चर्चित महाकाव्य ‘राधा-माधव’ के लिए इसी वर्ष शुरू हुए प्रथम अंतरराष्ट्रीय टैगोर सम्मान से सम्मानित किया गया। हजारीबाग बिहार से पधारे वरिष्ठ कवि शम्भू बादल के साथ इस नाचीज़ को भी कविता विधा का सृजनगाथा डॉट कॉम सम्मान मिला । वरिष्ठ कवि मीठेश निर्मोही, परिवेश पत्रिका के सम्पादक मूलचंद गौतम, कथाकार हरिप्रकाश राठी,वरिष्ठ लेखक श्याम लाल निर्मोही, डॉ. पार्वती दास-सुश्री रेणु पंत एवं युवा साहित्यकार प्रभात मिश्र को भी वार्षिक पुरस्कारों से पुरस्कृत किया गया । मानस जी ने यहाँ भी मौलिक सूझ से काम लिया । शेष बचे लगभग सभी साहित्यकारों को रूस के प्रमुख 26  साहित्यकारों के नाम से जुड़े सम्मान-पत्र दिए गए।

तीन भाषाएँ 25 कृतियाँ

कृति विमोचन हेतु 25 कृतियाँ प्रस्तावित थीं:1.विजयिनी मानवता हो जाय(संपादन)सवाई सिंह शेखावत,जयप्रकाश मानस 2. शहर-दर-शहर उमड़ती है नदी (संस्मरण)-उद्भ्रांत 3. चंद तारीख़ें (डायरी) उद्भ्रांत 4. जो मेरी जात में शामिल है (कविता संचयन) शैलेय 5. सेतु के आर पार (नाटक) डॉ. संतोष खन्ना 6. अकाब (उपन्यास) प्रबोध गोविल 7. कथानिका (कथा संग्रह) -डॉ. श्यामलाल निर्मोही 8. यात्रा के ईश्वर (उपन्यास)- पुरुषोत्तम पोमल 9. मनुष्यता का दर्शन (चिंतन) डॉ. रामकृष्ण राजपूत 10. आहत संवेदनाएं (लघुकथा संग्रह) अरविंद श्रीवास्तव 11. कोई शिकवा नहीं (ग़ज़ल संग्रह)दिलशेर ‘दिल’ 12. सम्राटों के वंशज दलित : दलित पिछड़ों का इतिहास-डॉ. श्यामलाल निर्मोही13. सोच की परछाइयां (गीत/ग़ज़ल संग्रह) अरविंद श्रीवास्तव 14. The Fatal Flow (उपन्यास)बी. के. एस. रे 15. मन के मनके (गीत संग्रह)-डॉ. पुष्पा जोशी 16. भीगे हुए जज़्बात (तरही ग़ज़ल) दिलशेर ‘दिल’ 17. संग-प्रसंग (रचनाकार प्रसंग)जयप्रकाश मानस 18. सपनों के क़रीब हो आँखें (कविता संग्रह) जयप्रकाश मानस 19. ट्रू मीडिया (मासिक पत्रिका विशेषांक)ओमप्रकाश प्रजापति, डॉ. पुष्पा जोशी 20. भज गोविंदम् (अनुवाद) डॉ. प्रवति दास
21. चीन में सात दिन-डॉ. दिनेश माली 22. शिखर तक संघर्ष-डॉ. दिनेश माली 23. त्रेता : एक सम्यक मूल्याँकन-डॉ. दिनेश माली 24. तमन्ना (ओडिया कविता)-डॉ. सिंधु नंदिनी त्रिपाठी 25. निराश्रये मों जगदीश रखा (ओडिया कविता)-डॉ.सिंधु नंदिनी त्रिपाठी। कुछ-एक को छोड़ लगभग सभी का विमोचन हुआ ।

हिंदी,संस्कृत, उड़िया,अंग्रेजी आदि भाषाओं के चलते विमोचन का स्वरूप वाक़ई अंतरराष्ट्रीय-सा हो गया था। इन निजी कृतियों के साथ 15वें हिंदी अंहिसं के लिए विशेष रूप से प्रकाशित पुस्तक ‘विजयिनी मानवता हो जाय’ का विमोचन परिवेश के सम्पादक वरिष्ठ साहित्यकार मूलचन्द गौतम के हाथों सम्पन्न हुआ । गए साल से सृजनगाथा गाथा डॉट कॉम ने यह अभिनव शुरुआत की है। पिछले साल राजस्थान में हुए 14वें अंहिसं में ‘रेत में उमंगते पाँव’ जैसे सार्थक शीर्षक से एक साझा कविता-संग्रह प्रकाशित हुआ था। ‘विजयिनी मानवता हो जाय’ के आवरण को देखकर सभी लट्टू हो गए।सूर्य प्रकाशन बीकानेर ने इसका प्रकाशन किया।आवरण में बुद्ध के पार्श्व में दक्षिणी भारतीय शैली में बने मंदिर के अक्स को थोड़ा झीना दर्शाने का सुझाव मैंने भाई प्रशांत बिस्सा को दिया था-ताकि वह निरी धार्मिक कृती-सी नज़र न आए-क्योंकि पुस्तक में वेदांत, बुद्ध, कॉर्ल मार्क्स,विवेकानंद, टैगोर, गाँधी के साथ ही ख्यात खगोल भौतिकविद स्टीफ़न हॉकिंग के भी संदर्भ हैं।

विजयिनी मानवता हो जाय

विमोचन के पश्चात 15वें अंहिसं के लिए निर्धारित थीम विषय ‘विश्व मानवतावाद की संस्कृति’ पर हुई चर्चा हुई।चर्चा में जब वक्ताओं ने पुस्तक से अतिरिक्त अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ साझा की तो लगा यदि हम इन्हें भी ‘विजयिनी मानवता हो जाय’ में शामिल कर पाते तो पुस्तक और भरी-पूरी होती। डॉ. सुशीला राठी, डॉ मंजुला दास एवं डॉ अर्चना लोबो के वक्तव्य काफ़ी प्रासंगिक थे। पर समयाभाव के चलते समकालीन विश्व के लिए नितांत मौजू इस विषय पर वैसी गंभीर चर्चा न हो सकी, जैसी गए साल उदयपुर में आयोजित गोष्ठी ‘राष्ट्र:धर्म'(असली-नकली मायने) में हुई थी । लगभग साढ़े तीन-चार घण्टे चली उस गुरु गंभीर बहस के बाद भी उसकी स्तरीयता और प्रासंगिकता को देखते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष इंदुशेखर तत्पुरुष ने उस विषय पर अकादमी की ओर से बसकेदा एक राष्ट्रीय-संगोष्ठी किए जाने का ऐलान किया था । वे बात के धनी हैं, समय मिला तो उसे पूरा भी कर भी दिखाएंगे। सत्र का बेहद शालीन संचालन युवा लेखक-आलोचक डॉ प्रभात मिश्र ने किया।

 नगरवधु के सौंदर्य की अनदेखी

लंच के बाद रचना पाठ में गद्य-सत्र की अध्यक्षता मूर्धन्य कथाकार शरद पगारे एवं अन्य नौ वरिष्ठ गद्यकारों ने की । कार्यक्रम का संचालन डॉ. शैलेय ने किया। कथाकार हरिसुमन बिष्ट,प्रबोध गोविल एवं हरिप्रकाश राठी की कहानियों अर्थपूर्ण थी। वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत ने अपनी लिखी जाने वाली आत्मकथा के संदर्भ साझा किए। डॉ. मूलचंद गौतम, बी.के.एस.रे और श्रीमती रेणु पंत के व्यंग्य पाठ भी उल्लेखनीय थे। डॉ. पुरुषोत्तम पोमल का उपन्यास अंश,रूसी कथाकार इल्या ओस्टापेन्को का आलेख अपनी प्रस्तृति में अद्भुत बन पड़े थे। लेकिन सर्वाधिक उल्लेखनीय था मूर्धन्य कथाकार शरद पगारे की बुद्ध एवं नगरवधू की कथा पर आधारित उपन्यास का सजीव मौखिक पाठ। बुद्ध द्वारा नगरवधु के सौंदर्य की अनदेखी पर उसकी नाराजगी में पीठ एवं कुचाग्र के कम्पन का उनका  बिम्ब अभी तक मेरी रीढ़ में झुरझुरी पैदा कर रहा है।

हवा हूँ हवा मैं वासंती हवा हूँ

कविता सत्र का संचालन अक्खड़ शायर मुमताज को करते देख लगा पुश्किन द्वारा साँस ली गई प्रेम पगी रूस की हवा में तसल्ली से कविता पाठ का स्वप्न शायद ही पूरा हो पाए। पर जयप्रकाश मानस द्वारा केदारजी की कविता ‘वासंती हवा ‘का पाठ जिस अद्भुत तन्मयता और लय से सम्पन्न हुआ वह गदगद कर देने वाला था। कवि उद्भ्रांत का ‘राधा-माधव’ का पाठ, शम्भू बादल की कविता नदी’ का पाठ, मीठेश निर्मोही की हिंदी-राजस्थानी कविताओं का पाठ, ना-ना करते भी अम्बिकादत्त की कविता ‘असुरक्षित जल’ का पाठ और अपनी कविता ‘हमारे सुनने का ऐब’ भी आल्हादित करने वाले थे। डॉ. उषा देव की संस्कृत की कविताओं, बी.के.एस.रे एवं सन्तोष खन्ना की अंग्रेजी कविताओं, मृत्यंजय मोहंती, एन.सी दास, सिंधु नन्दिनी और श्रीमती बशीरन बीवी की उड़िया कविताओं व इलिया ओस्टापेन्को की रूसी कविताओं ने कविता सत्र को सच में अंतरराष्ट्रीय बनाया । शायर अरविंद श्रीवास्तव एवं दिलशेर ‘दिल’ की ग़ज़लें भी खूब सराही गईं। संचालक शायर मुमताज़ का क़लाम भी काबिले तारीफ़ था । पर कविताओं के नाम पर कुछ मित्रों ने जिस तरह भजन और फिल्मी गीत पेले उसे देखते हुए लगा मुमताज़ का अक्खड़पन भी बाज वक्त जरूरी हो जाता है।

चुपचाप कौन लौटना चाहेगा !

समाहार में भारत की नृत्याँगान ममता अहार की ‘मीरा’ पर एकल प्रस्तुति एवं रूस की नृत्यांगना दरिया बतूरीना के अद्भुत नृत्यों ने जो समां बाँध वह अद्वितीय था । लेकिन सवाल कार्यक्रमों की अराजकताओं भरी रेल-पेल का था। सुबह साढ़े दस बजे से शुरू हुआ यह अविराम सिलसिला रात के दस बजे बाद तक निपट नहीं पा रहा था। अनेक लोग मन मसोस कर रह गए। आख़िर एक और सत्र के आश्वासन के बाद किसी तरह विराम लगा। आयोजकों को अगली बार से विदेश में कम से कम तीन दिनों में इन सत्रों को हर हाल विधावार विभाजित करना चाहिए ताकि लोग तसल्ली से अपनी प्रस्तुति दे सकें। एक अंतराष्ट्रीय आयोजन में जाकर चुपचाप कौन लौटना चाहेगा? मैं ही नहीं, यह कदाचित् भारत के सभी 76 प्रतिभागियों का मन भी कह रहा होगा ।

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