देवता का भय

भीषण दरिद्रताभूखप्यासगरीबी देखकर अकुलाए एक भलेमानुष ने दुनिया बचाने की ठान ली। समाधान की खोज में चलताचलता वह क्षीरसागर तक पहुंचाआंखों के सामने दूध का समंदर लहराते देख उसके आनंद का पारावार न रहा—

यहां मेरी चिंताओं का समाधान संभव है?’ आदमी ने सोचातभी उसकी दृष्टी शेषनाग पर आंखें मूंदकर लेटी भव्य आकृति पर पड़ीउसने विनीतभाव से कहा—

जहां से मैं आया हूं वहां भूख का तांडव मचा है। भरपेट भोजन न मिलने से बड़ों की अंतड़ियां सिकुड़ चुकी हैं। मासूम बच्चे माताओं के स्तन से चिपकेचिपके दम तोड़ रहे हैं। इस महासागर से थोड़ासा दूध मिल जाए तो लाखों मासूमों की जान बच सकती है।

देवता के अधरों पर मुस्कान तैर गईउसी को सहमति मान भलामानुष धरती की ओर दूध उलीचने लगा। अकस्मात कुछ पंडितजनों की टोली उधर से गुजरीआदमी को क्षीरसागर के किनारे देख वे चौंक पड़े। उनमें से कई की भृकुटियां तन गईं—‘महाराजजिस तेजी से यह दूध उलीच रहा हैउससे तो कुछ देर में क्षीरसागर भी खाली कर देगा।

धरती की भूख मिटाने के लिए यह परमावश्यक है।’ शेषनाग पर लेटे देवता ने कहा।

सोच लीजिए भगवन्लोग जब तक भूखेप्यासे हैंतभी तक आपका नाम लेते हैंभूख और गरीबी न रही तो तुम्हारे साथसाथ हमें भी कोई नहीं पूछेगा।’ देवता ने कुछ देर सोचाअचानक उसने करवट बदली और मुंह दूसरी ओर कर लियाभक्तों के लिए इतना इशारा काफी था। ‘असुरअसुर’ कहकर वे उस आदमी पर टूट पड़े।

उस दिन धर्म और भूख के रिश्ते से एक और पर्दा हटा।

गाय और ईश्वर

गाय जल्दी से जल्दी बस्ती से चूर निकल जाना चाहती थीअचानक ईश्वर सामने आ गया—‘जंबूद्वीप में सब कुशल तो हैं?’ ईश्वर ने पूछाउखड़ी सांसों पर काबू पाने का प्रयत्न करते हुए गाय ने उत्तर दिया—

कुछ भी ठीक नहीं है। लोग धर्म में शांति की खोज करते हैंजो सर्वाधिक अशांत क्षेत्र हैऐसी तकनीक के भरोसे बुद्धिमान होना चाहते हैंजो उन्हें दिमागी तौर पर पंगु बनाने के लिए तैयार की गई है। चाहते सब हैं कि भ्रष्टाचार मिटेपरंतु हवस कोई छोड़ना नहीं चाहता।

किसी महापुरुष ने कहा है—दुनिया से भागने से अच्छा हैउसे बदलोवैसे भी भारतवासी तुम्हारी पूजा करते हैं। उन्हें छोड़कर जाना उचित न होगा।’ ईश्वर ने समझाया। गाय झुंझला पड़ी—

आदमी को मेरा दूध और चमड़ी चाहिएइन दिनों हालात और भी बुरे हैं। हर दंगेफसाद में मेरा नाम घसीट लिया जाता है। जो कुछ नहीं कर पाता सकतावह गौरक्षक बना फिरता हैमैं ऐसी जगह एक पल भी ठहरना नहीं चाहती।

मुझसे कहतींमैं कभी का ठीक कर देता।’ ईश्वर बोला। गाय का गुस्सा भड़क उठा।

चुप रहो। सारे फसाद की जड़ केवल तुम हो। मंदिर में पड़ेपड़े रोटियां तोड़ते रहते होमेहनत न खुद करते हो न भक्तों से करने को कहते होतमाशबीन बनकर ईश्वर होने का दावा करने से तो अच्छाहै किसी कुआपोखर में डूब मरोलोग कुछ दिन हैरानपरेशान रहेंगे। बाद में अपने भरोसे सबकुछ ठीकठाक कर लोगे।

ईश्वर स्तब्धवह कुछ उत्तर देउससे पहले गाय आगे बढ़ गई।

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