By | June 15, 2018
कवि तो कहेगा
जब जब सूरज को देखेगा
उसके उगने की बात कहेगा
समुद्र के गर्भ से शनैः शनैः
ऊपर उठने की
नरम गुलाबी रंगत से बदल कर
गर्म अग्नि में बदलने की
पूरे आकाश को लांघ कर
धीरे धीरे नीचे उतरने की
और पुनः समुद्र की गोद में विलीन होने
की बातें विस्तार से कहेगा
उसके शब्द इतने जीवंत होंगे
कि कल सूरज रहे न रहे
उसका मिजाज उसका रुप और पृथ्वी पर
शासन करने का तरीका उसका
अंकित रहेगा समय के पन्नों पर
उसके उदय से उजाला और
अस्त से अंधेरा होता है
उसके अस्तित्व से ही जीवन है
जीवन में गति है
सब कुछ अक्षरों में बाँच देगा
पीढ़ियाँ जाने समझें और कविता में साक्षात्
देख लें उसका स्वरूप
इसलिए कहेगा
कवि तो कहेगा…..
अन्तर्यात्रा
मन के आले पर
एक दीप जला कर
रखा है
दिन भर बौराई फिरती हूँ
दुनिया दारी के झंझटों में
साँझ ढले लौटती हूँ
मन के पास
पलकों के द्वार भीतर से बंद करते ही
दीख जाता है उजाला
मद्धिम मद्धिम
सात परतों में छुपा कर रखा है जिसे
बाहर की आंधी झंझा
बुझा न दे
जितना दूर जाती हूँ
उतनी ही खिंची जाती हूँ
अद्भुत आकर्षण है इस दीप में
आसनी डालकर बैठती हूं सामने
देखने की कोशिश करती हूं
कोई एक किरण उतर जाए
हृदय में
कि उजाला भर जाए रोम रोम में
सुना है कोई मेघ खंड
आया था उतरकर
दिव्य प्रकाश लिए
किसी के जीवन में उजाला भरने
पुरानी बात है
पर निरंतर इंतजार करता है हृदय
तुम्हारे चरणों का ध्यान करती हूँ प्रभु
जैसे धूप से आकर आँखों को
कुछ नहीं दीखता
समय लगता है
अभ्तस्त होने में
बाहरी चकाचौंध से चुंधियाई हुई आँखें
कुछ भी नहीं देख पातीं
सोचती हूं
तुम्हारे माटी भरे बाल मुख में
माता ने सारी सृष्टि के
दर्शन किए थे
मुझे भी मिलेगी वही छवि
इसी लौ में
इसी दीप के लौ में
इसी आले पर रखे दीप की लौ में
विश्वास है हृदय में
धीरे  धीरे प्रवेश करती हूं
रौशनी के सहारे
भीतर अपने हृदय के
डगमगाते कदमों को साधने का
प्रयास करते हुए…….

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