काव,काव,काव! आम के पेड़ पर बैठकर काला कौवा बोल रहा था। जल्दी से बिस्तर से उठकर बैठ गई शांति। पीछे वाला दरवाजा खोला। अभी तक सूर्योदय नहीं हुआ था, मगर पूर्व दिशा का आसमान लाल दिखने लगा था। चिड़ियां कलरव करते हुए अपने घोंसले से बाहर उड़ने की कोशिश कर रहे थे। झाड़ू से शांति आँगन बुहारने लगी। आँगन में चारों तरफ गोबर जल छिड़क कर रसोई घर साफ कर दिया उसने।

एक बड़े कमरे वाला घर। सोने,उठने-बैठने के लिए वही एक कमरा।पीछे की तरफ बरामदा और बरामदे के एक कोने में रसोई घर।दूसरी तरफ लकड़ी की जाली से घेरकर एक छोटा-सा कमरे का रूप दिया गया था। वहाँ पर बूढ़ी सोती थी, शांति की काकी सास। इस सास के अलावा और कोई नहीं था शांति के ससुराल में। बूढ़ी के बाल-बच्चे नहीं थे। सनिया को छोटे से की अपने बेटे की तरह पाल पोस कर बड़ा किया था उसने। हृदय का सारा वात्सल्य उसके ऊपर उंडेल दिया था।

: “सुबह हो गई है,बहू? माणिक सारी रात मिमिया रही थी। आज बच्चा जनेगी! जामुन की छोटी डाली उसके सामने डाल दो।” बूढ़ी की आवाज सुनाई दे रही थी।

: “ ठीक है काकी।”

: “सारी रात खांसी से परेशान हूँ।थोड़ा गरम पानी दोगी,बेटी। गले को थोड़ा आराम मिलेगा।”

एक स्टील के कटोरी में लाल चाय और दूसरे कटोरी में मूढ़ी डालकर बूढ़ी के सामने रख दिया शांति ने। गरम-गरम चाय में एक-एक मुट्ठी मूढ़ी  डालकर बूढ़ी चाय पीने लगी।

लूँगी संभालते-संभालते घर से बाहर निकल आया सनातन उर्फ सनिया। अंजलि में पानी लेकर मुंह धोते हुए वह कहने लगा- “होर्लिक्स की बोतल दे दो।दूध लेकर आता हूँ। थोड़ी-सी देरी होने से वह दूध में पानी नहीं,पानी में दूध मिला देगा। तुम्हारे कपटी कृष्ण के ऊपर मुझे विश्वास नहीं,उसी तरह उसके वंशज गोपालों पर भी विश्वास नहीं है।”

शांति की कृष्णभक्ति देखकर सनातन उसे इस तरह चिढ़ाता था।

शर्ट पहनकर सनातन बाहर निकला दूध लेने के लिए।

शांति सिगड़ी उठाकर बाहर ले गई।उसमें लकड़ी के दो-चार टुकड़े,बुरादा डालकर किरोसिन छिड़ककर आग लगा दी।

सनिया ने रसोई-घर के सामने दूध बोतल रखकर चाय के लिए आवाज दी। शांति ने दूध वाली चाय बनाई। स्टील-गिलास में चाय डालकर शांति ने सनिया के हाथ में थमा दिया। खुद कटोरी में चाय पीने लगी। लूँगी में गिलास पकड़ते हुए फूँक-फूँक कर चाय पीने लगा  सनिया। चाय पीते-पीते शांति उसकी तरफ देख रही थी। दोनों की आँखें एक हो जाने पर शर्म से हंसते हुए नीचे देखने लगी वह।

‘आज मैं जल्दी फ़ैक्टरी जाऊंगा’ कहकर सनिया बरामदे में कागजपत्र,कैलकुलेटर और पेन लेकर बैठ गया।

सनिया स्पंज आयरन की फ़ैक्टरी में काम करता था, एक अनस्किल वर्कर के तौर पर। वह इंटरमीडिएट पास था,लेकिन आईटीआई,एसटीआई जैसे कोई व्यवसायिक प्रमाणपत्र उसके पास नहीं थे, इसलिए वह हेल्पर का काम करता था। मेहनत ज्यादा,लेकिन पैसा कम। इतने कम पैसों से शहर में घर नहीं चलता था। आग से लेकर पानी तक सब-कुछ खरीदना पड़ता है। केवल खाने-पीने से नहीं चलेगा। जीवन में उतार-चढ़ाव है,रोग है। वह ड्यूटी के बाद घर में ठेकादारों के बिल बनाता था। उससे अच्छी आय होती थी।जैसे-तैसे उसका घर चल जाता था। मगर उसे काम से कभी फुर्सत नहीं मिलती थी।

 

खाना खाकर सनिया काम के लिए निकल गया।बाहर जाते समय एक झोला पकड़ा दिया शांति ने उसके हाथ में। सनिया की चाची अपनी लाठी को ठुक-ठुक करते हुए आकर खड़ी हो गई  दरवाजे के सामने और कहने लगी, ‘अरे! सनिया,कल बाटमंगला की पूजा करनी है। दो पके   केले लेकर आना, आते समय।‘

हाँ,कहकर बाहर निकल गया सनिया। फाटक बंदकर अपने काम में लग गई शांति। मुन्नी को खिला-पिलाकर दादी के पास छोड़ दिया। अमूल-डिब्बे पर छड़ी से ठक-ठक करते हुए बूढ़ी उसे खिलाने लगी। अभी भी बच्ची के हाथ-पैर अच्छी तरह से खुले नहीं थे। वह घुटनों के बल चल रही थी। जब तक मुन्नी बूढ़ी के पास खेलती थी,तब तक शांति घर के  सारे काम पूरे कर लेती थी।

दोपहर का खाना खाकर धूप की तरफ पीठ करके सो गई थी बूढ़ी। मुन्नी को खिलाते-खिलाते,गोदी में लेकर उसे सुलाते-सुलाते शांति को नींद आ गई। जब उसकी नींद खुली, उस   समय तक धूप जा चुकी थी। जल्दी से उठकर बैठ गई शांति। सर्दी के दिन। थोड़ी देर बाद शाम होने वाला था। सनातन के लौटने का समय हो गया था। उसके आने से पहले अपने आप को थोड़ा ठीक करना पड़ेगा। सनातन कहता था- दिनभर थक-हार कर घर लौटने के बाद पत्नी के चाँद जैसे मुखड़े के दर्शन होने  से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।

जल्दी-जल्दी उसने चारों तरफ झाड़ू लगा लिया। हाथ-पैर धोकर उसने माँड़ लगी साफ सुथरारी छिट वाली साडी पहन ली। चेहरे पर पाउडर लगा लिया।बालों को अच्छी तरह से संवार कर मांग में सिंदूर भर दिया। चूल्हा जलाने जा रही थी तभी दूसरी तरफ से सुनाई देने लगी साइकिल घंटी की आवाज। मुन्नी की आवाज में बाबा….आ…आ…आ की पुकार।

शांति दौड़कर बाहर गई। दरवाजा खोलकर भीतर आ गया सनिया। साइकिल के हैंडल से झोला उतार कर बढ़ा दिया शांति के हाथ में। मुन्नी सनिया के एक पैर को पकड़ कर बाबा…आ…आ… कहकर ऊपर देखने लगी। सनिया ने उसे नीचे से उठाकर अपनी गोदी में ले लिया।

“अरे….रे……पिताजी को हाथ-पैर धोने दे।दिनभर काम कर लौटे हैं,थक गए होंगे। आओ,मेरे पास आओ। पिताजी को हाथ पैर धो लेने दे।” कहकर शांति हाथ बढ़ाए मुन्नी को अपनी गोदी में लेने के लिए।

मगर मुन्नी पिताजी को छोडने के लिए राजी नहीं थी और ज्यादा ज़ोर से पकड़ लिया  मुन्नी ने पिताजी की कमर को।

मुन्नी की ऐसा ढंग देखकर शांति झूठी नाराजगी दिखाते हुए कहने लगी, “हाँ,दिनभर मैं सब करूंगी,खिलाऊँगी मैं,पिलाऊँगी मैं। और पिताजी को देखते ही बेटी की पिता के लिए प्रेम तो  देखो। मेरे से ऐसा व्यवहार कर रही है मानो मैं इसकी कुछ नहीं लगती हूँ।”

“देखो,देखो मुन्नी,मम्मी कैसे नाराज हो रही है। जाओ,जाओ मम्मी के पास जाओ।”

सनिया पीछे आँगन की तरफ जाकर हाथ-मुंह धोकर पीड़े पर बैठ गया। शांति ने खाने के लिए मूढ़ी लाकर दी। उसमें मिक्स्चर,प्याज और सरसों का तेल मिला कर खाना उसे बहुत अच्छा लगता था। मुन्नी उसके गोद में बैठी हुई थी। ‘दो,दो’ कहकर मांग रही थी। एक-एक मूढ़ी चुनकर सनिया उसके मुंह में देने लगा।मुन्नी सूं-सूं आवाज करते हुए मूढ़ी खाने लगी। चाय पीने के बाद सनिया उसके साथ और कुछ समय खेला।

बहुत ठंडा पड रही थी। साँय- साँय… करते हुए ठंडी हवा दरवाजे की फांक से घर के अंदर घुस रही थी। सर्दी से शरीर ठंडा होने लगा था। रात्रिभोज की व्यवस्था करने लग गई शांति। । सनिया खाने के लिए बैठा। गरमागरम खाना परोस दिया शांति ने। गरम-गरम भात, बड़ी मिश्रित बैंगन भरता और गोभी की सब्जी के झोल मांगने लगा  सनिया . गोभी की सब्जी के झोल को भात में मिलाकर बड़ी तृप्ति से खाने लगा सनिया।

घर के सारे काम समाप्त करते-करते काफी  रात हो गई थी। बूढ़ी खर्राटे भरने लगी थी। सरसों का तेल गरम कर बूढ़ी के पैरों में मालिश करने लगी शांति।

सारे काम पूरे कर दरवाजे की चिटकनी लगाकर शयन-कक्ष की तरफ बढ़ी शांति। सनिया और मुन्नी प्रगाढ़ नींद में सो रहे थे। मुन्नी के शरीर से रज़ाई नीचे खिसक गई थी। फिर से उसको अच्छी तरह से ओढा दिया। उसके पास सोने की कोशिश करने लगी, काफी देर तक छत देखते-देखते आँखें बंद की। फिर खोली,मगर नींद का कहीं नामो-निशान नहीं।

नहीं, और उसे नींद नहीं आएगी। उठकर उसने आधी खिड़की खोल दी। बाहर स्वच्छ आसमान। चमेली फूल की तरह सफेद चंद्रमा और तारों का विक्षिप्त पटल। चाँदनी से धुले  पेड-पौधे।

खिड़की खोलते ही एक पल में ठंडी हवा कमरे में घुसने लगी और उस पवन के साथ मनमोहक सुगंध। खिड़की के उस तरफ बरसाती बूंदों की तरह अंजलि-अंजलि शेफाली फूल गिर रहे थे।सिहरण पैदा हो रही थी शांति के तन-मन में। स्मृतियाँ ताजा हो रही भीतर-ही-भीतर। शादी के बाद उसने यह पेड़ लगाया था खिड़की के पास। इस पेड़ पर पहली बार फूल आए थे। धीरे-धीरे शांति सपनों की दुनिया में खोते जा रही थी……..

धीरे से बैठ गई खाट के किनारे और देखने लगी सनिया की तरफ। शांत-स्निग्ध लग रहा था वह। उसके के घने केश सहलाने का मन हो रहा था। गभीर आश्लेष में भर देना चाहती थी उसका सारे अस्तित्व को। चुंबनों से भर देना चाहती थी उसका सारा शरीर। हाथ बढ़ाने लगी शांति…..

अचानक नींद खुल गई सनिया की। आश्चर्यचकित होकर देखने लगा वह।

: “क्या हुआ? अभी तक सोई नहीं हो….?” उसने पूछा। हड़बड़ा गई शांति। वह क्या उत्तर देगी? उसकी बातें सुनकर सनिया हसने लगेगा। वह शरमा गई।

“नहीं,नहीं ऐसे बात नहीं ……।नींद नहीं आ रही थी तो…. “…… उसकी बातों को बीच में ही काटते हुए सनिया कहने लगा, “ अरे, खिड़की क्यों खोली हो? घर में ठंडी हवा घुस रही है। जाओ,खिड़की बंद कर चुपचाप सो जाओ। कुछ समय आँखें बंद कर लेटे रहने से अपने आप नींद आ जाएगी। सुनो,कल सुबह मुझे थोड़ा जल्दी उठा देना। जरूरी काम है। चौधरी बाबू के बिलों का काम किसी भी हालत में कल करने पड़ेंगे। समझ गई…….. ।जाओ, अब सो जाओ।” कहकर करवट बदलकर सो गया सनिया।

शांति आधी खुली खिड़की से बाहर देखने लगी थी। बाहर चाँद खिलखिलाकर हंस रहा था। मगर उसे लग रहा था मानो वह उसकी मज़ाक उड़ा रहा हो।

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *