रेलवे बोर्ड के चेयरमैन अभी गुजरात दौरे पर पहुंचे तो अंग्रेजों के वक्त की एक परंपरा के मुताबिक प्लेटफॉर्म पर पांव पोंछना बिछाकर उनका स्वागत किया गया। उन्होंने पहले ही ऐसे किसी भी स्वागत की परंपरा को खत्म कर दिया है और उनके आने पर अफसरों को प्लेटफॉर्म तक आने की मनाही कर दी गई है। उन्होंने स्वागत में गुलदस्ते देना भी बंद करवा दिया है, और उनके कहे मुताबिक रेलवे के छोटे कर्मचारियों का बड़े अफसरों के पांव छूना भी बंद करने के कड़े आदेश जारी हो चुके हैं।
रेलवे बोर्ड चेयरमैन अपने विभाग के तो बड़े नेता हैं, लेकिन वे देश के निर्वाचित नेताओं में से मंत्री बनने वाले लोगों के मातहत ही काम करते हैं।  उन्होंने सामंती रिवाजों को खत्म करने की जो पहल की है, वह अगर दूसरे लोगों को भी कुछ समझ दे जाए, तो इस देश में हर मिनट करोड़ों रूपए बचना शुरू हो जाएंगे। इसके अलावा छोटे ओहदों पर बैठे हुए लोगों की जिंदगी से अपमान कुछ घट जाएगा। हमने छत्तीसगढ़ जैसे छोटे से राज्य के राजभवन में बैठे ऐसे बददिमाग राज्यपाल भी देखे हैं जो कि कर्मचारियों से अपने जूते बंधवाते थे। इक्कीसवीं सदी में भी जिनके दिमाग को लोकतंत्र छू भी नहीं गया है, वे लोकतंत्र की खाते हैं, लोकतंत्र की गाते हैं, और लोकतंत्र को पांवपोंछने की तरह कुचलते भी हैं। यह सब कुछ इस देश की गरीब जनता के पैसों से होता है। मंत्रियों और बड़े ओहदों पर बैठे जजों, राज्यपालों, और दूसरे संवैधानिक दर्जाप्राप्त लोगों के लिए शिष्टाचार के नाम पर बहुत से ढकोसले होते हैं, और ऐसे तमाम प्रोटोकॉल का खर्च गरीब जनता की जेब से जाता है।
जब सड़कों पर ऐसे तथाकथित वीवीआईपी लोगों के काफिले निकलते हैं, तो सायरन बजाते, लोगों को धकियाते पुलिस की गाडिय़ां चलती हैं, और जनता को यह अहसास कराती है कि वह दूसरे दर्जे की नागरिक है। देश में वामपंथी दलों के मुख्यमंत्रियों के अलावा कोई भी ऐसे नहीं रहे जिन्होंने सादगी का सम्मान किया हो। वामपंथियों के अलावा शायद पश्चिम बंगाल में उन्हीं की परंपरा की वजह से मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी भी शासकीय और राजकीय तामझाम से परे रहती हैं। लेकिन बाकी देश में किसी को भी आतंकी-सामंती इंतजाम बुरा नहीं लगता, बल्कि लोग इसके लिए अड़ जाते हैं। बहुत से सांसद और मंत्री अपने ही शहर में सायरन वाली पायलट गाड़ी के बिना मानो पेशाब करने भी नहीं जाते, और उन्हें यह शर्म भी नहीं आती कि बचपन से जिन लोगों के बीच वे नंगे घूमे हैं, आज उन्हीं को धकेलकर वे सड़कों पर चिंघाड़ते चलते हैं।
अब इसके खिलाफ कोई जनहित याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाना भी इसलिए फिजूल है कि देश की सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े जज भी अपने आपको खास नागरिक मानते हैं, और अपने लिए शिष्टाचार की व्यवस्था जारी रखते हैं। हैरानी की बात तो तब हुई जब सरकारी इश्तहारों में नेताओं की तस्वीरों के खिलाफ एक जनहित याचिका लगी और उस पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने यह हुक्म दिया था कि सरकारी इश्तहारों में देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, और मुख्य न्यायाधीश की ही तस्वीरें लगाई जा सकती हैं। बाद में इसके खिलाफ जब अपील की गई तो इस लिस्ट में मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, और मंत्रियों के नाम भी जुड़ गए। अब सवाल यह उठता है कि किसी सरकारी इश्तहार में मुख्य न्यायाधीश की फोटो छपने की क्या जरूरत हो सकती है? खासकर तब जब सुप्रीम कोर्ट ही इस सरकारी फिजूलखर्ची के खिलाफ फैसला ले रही है, तो उसे कम से कम अपने आपको तो इससे अलग रखना था। लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत के जजों को भी महत्व पाना बुरा नहीं लगता है। सुप्रीम कोर्ट की अनगिनत परंपराएं अंग्रेजों के छोड़े गए बोझ की तरह हैं जिन्हें इक्कीसवीं सदी के लोकतंत्र के जज भी बड़े फख्र से ढोते हैं। इस सिलसिले में पिछले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का यह फैसला जिक्र के लायक है जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति के लिए महामहिम संबोधन खत्म कर दिया था, और बाद में मजबूरी में देश भर के राज्यपालों को भी वैसा करना पड़ा था। आज जनता के पैसों पर चलने वाली सरकारों, अदालतों, और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं में आडंबर पर भारी फिजूलखर्ची होती है। यह सिलसिला पूरी तरह अलोकतांत्रिक है और इसका कदम-कदम पर विरोध किया जाना चाहिए।

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