By | April 11, 2018

हिंदी साहित्य जगत में एक बार फिर से लेखक संगठनों पर सवाल उठ रहे हैं। इस बार सवाल उठाया है हिंदी के वरिष्ठतम लेखकों में से एक अशोक वाजपेयी ने । हाल ही में उन्होंने वामपंथ को लेकर जो टिप्पणी की है उसके लपेटे में लेखक संगठन भी आ गए हैं। अशोक वाजपेयी के मुताबिक ‘वाम रुझान रखनेवाले लेखकों के तीन संगठन हैं, वे त्रिपुरा-हार के पहले से ही, बल्कि भाजपा की दिग्विजय से भी पहले से, अप्रासंगिक और निष्क्रिय होते गए हैं, हालांकि वे ऐसा मानने को कतई तैयार नहीं हैं। उन्होंने स्वयं कई लेखकों और वृत्तियों के साथ जो अन्याय और अनाचार किए हैं उन्हें स्वीकार करने को भी तैयार नहीं हैं। लोकतंत्र का नाट्य करते हैं पर इन संगठनों का ढांचा मूलतः और मुख्यतः लोकतांत्रिक नहीं रहा। उसके पदाधिकारियों की राजनैतिक-साहित्यिक चूकें काफी रही हैं।पर इस वस्तुस्थिति ने उन्हें बहिष्कार, निन्दा, अफवाह की गर्हित राजनीति से बचने के लिए उकसाया नहीं है। वे अब भी विचार और विश्लेषण ऐसी पदावली में करते हैं जो अब संसार भर की वाम विचारशीलता में कब की बाहर फेंकी जा चुकी है।‘ अशोक वाजपेयी ने बहुत सधे तरीके से लेखक संगठऩों की निष्क्रियता और उन संगठनों में अलोकतांत्रिक व्यवस्था को उजागर कर एक बार फिर से वाम विचारधारा को कठघरे में खड़ा कर दिया। अशोक वाजपेयी का वाम विरोध जगजाहिर रहा है और वामपंथी लेखक बहुधा उनको कलावादी कहकर मजाक उड़ाते रहे हैं। निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र जैसे लेखकों के साथ अशोक जी की निकटता जगजाहिर थी। इस वजह से भी वो वामपंथियों के निशाने पर रहते थे और अशोक वाजपेयी भी लगातार वामपंथियों पर हमले करते रहते थे। लेकिन केंद्र में मरेन्द्र मोदी सरकार आने के बाद जिस तरह से अशोक वाजपेयी ने सरकार के खिलाफ पहले परोक्ष रूप से और फिर प्रत्यक्ष रूप से मुहिम चलाई थी, जिसमें पुरस्कार वापसी अभियान प्रमुख था, उसके बाद वामपंथी लेखकों को अशोक वाजपेयी में एक अवसर नजर आया और वो अचूक अवसरवादी की तरह अशोक वाजपेयी के झंडे के नीचे खड़े होते चले गए। चाहे वो खुद को सबसे ज्यादा क्रांतिकारी मानने वाला संगठन जन संस्कृति मंच के उपाध्यक्ष मंगलेश डबराल हों या फिर जनवादी लेखक संघ के असद जैदी हों। इस तरह अलग अलग वामपंथी लेखक संगठनों में मौजूद लोग अशोक वाजपेयी के साथ जुड़ते चले गए। ये अशोक जी के साहित्यिक हितों की प्रत्यक्ष तौर पर रक्षा करते हैं या नहीं ये ज्ञात नहीं है लेकिन कई बार इनके कदमों से अशोक जी को समर्थन मिलता है। इससे यह संदेश भी गया कि अशोक वाजपेयी वामपंथी हो गए। नतीजा यह हुआ कि अशोक वाजपेयी के साथ जुड़े लेखकों उन लेखकों को परेशानी होने लगी जो वामपंथ विरोध की वजह से अशोक जी के साथ थे। मैंने एक बार अशोक जी से इस बारे में जिक्र किया और उनको कहा कि आप तो सरकार और मोदी विरोध के चलते वामपंथियों के साथ चले गए तो अशोक जी ने थोडी नाराजगी भरे स्वर में मुझे कहा कि मैं किसी से साथ नहीं गया बल्कि वो मेरे साथ आ गए। खैर…

अब, जब अशोक वाजपेयी ने वामपंथी लेखक संगठनों को कठघरे में खड़ा किया है तो ये देखना दिलचस्प होगा कि मंगलेश डबराल या असद जैदी जैसे कवि/लेखक कोई प्रतिक्रिया देते हैं या नहीं। हलांकि इसकी उम्मीद कम से कम जनवादी लेखक संघ को नहीं है क्योंकि जनवादी लेखक संघ के उपमहासचिव संजीव कुमार ने अशोक वाजपेयी को फेसबुक पर लंबी टिप्पणी लिखकर जो जवाब दिया हैं उसमें इस बात के पर्याप्त संकेत हैं। ‘अशोक वाजपेयी की मुश्किल’ शीर्षक से की गई लंबी टिप्पणी में संजीव कुमार ने लिखा- ‘अशोक जी इतने सुजान तो हैं ही कि उनकी हर बात बेबुनियाद न हो। मसलन, उनका यह कहना कि लेखक संगठनों के लोग ‘अब भी विचार और विश्लेषण ऐसी पदावली में करते हैं जो अब संसार भर की वाम विचारशीलता में कब की बाहर फेंकी जा चुकी है’ (‘अब’ ‘कब’ के प्रयोग में जो अटपटापन है, उसका श्रेय मुझे न दें), वामपंथी लेखकों के एक हिस्से के लिए बहुत गलत नहीं है। लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि अपनी चरम निराशा में उन्होंने वामपंथी पहचान वाले लेखकों को पढ़ना ही छोड़ दिया है, इसलिए उन्हें मुहावरे के बदलाव और विश्लेषण में उभरे नए नुक्तों का कोई इल्म नहीं है। उनसे यह उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए कि उन्होंने सब कुछ पढ़ रखा हो, लेकिन यह उम्मीद तो की ही जा सकती है कि‘संसार भर की वाम विचारशीलता’ आदि के बारे में सब कुछ पढ़े हुए जैसा दावा करने से बचें—अगर बौद्धिक ईमानदारी के ख़याल से नहीं, तो अपने को हास्यास्पद होने से बचाने के लिए ही सही! उनकी इस बात से भी सहमत होने के अलावा कोई चारा नहीं कि ये लेखक संगठन निष्क्रिय होते गए हैं. अगर निष्क्रिय न होते तो ऐसा क्यों होता कि अशोक जी के या किसी भी और के लगाए आरोपों का जवाब देने के लिए कोई आगे न आता! ऐसा तभी होता है जब संगठन के साथ अपनी पहचान को जोड़ने से उसके सदस्य भी कतराते हैं, या दूसरी तरह से देखें तो वह उनकी आत्म-छवि का हिस्सा नहीं होता. शामिल लोग संगठन से अपनी पहचान को न जोड़ें, यह निष्क्रियता की सबसे बड़ी निशानी है; इससे पता चलता है कि कार्यक्रम आदि करा लेने के बावजूद, जो कि मुट्ठी भर सक्रिय लोगों के प्रयास से भी हो सकते हैं, संगठन कुल मिलाकर एक जीवंत इकाई की तरह काम नहीं कर रहा।‘ अशोक वाजपेयी को उत्तर देने के क्रम में संजीव कुमार ने लेखकों के संगठन से अपनी पहचान जोड़ने से कतरानेवाले लेखकों की ओर इशारा किया है। बेहतर होता कि संजीव कुमार अपने लेख में ऐसे लेखकों के नाम उजागर करते। साहित्य जगत को यह तो पता चलता कि कौन से ऐसे लेखक हैं जो संगठन में रहते हुए उसका लाभ तो उठाते हैं लेकिन जब संगठन पर किसी तरह का संकट आता है या उसपर कोई साहित्यिक हमला होता है तो वो उससे अपना नाम जोड़ने में कतराते हैं।

इस पूरे प्रसंग से एक बात तो साफ है कि हिंदी साहित्य में जो लेखक वाम विचारधारा के ध्वजवाहक हैं, उनमें से ज्यादतर अवसरवाद की ध्वजा लिए घूम रहे हैं और जिस जगह पर उनको अवसर दिखाई देता है अपना झंडा वहीं गाड़कर कीर्तन करने लग जाते हैं। अशोक वाजपेयी के अखाडे में इन दिनों इस तरह के लेखकों का अखंड कीर्तन होता दिख रहा है। अशोक वाजपेयी लंबे समय तक भारत सरकार में नौकरशाह रहे हैं, मंत्रालयों में उच्च पदों पर काम किया है, इसलिए यह माना जा सकता है कि उनको इस तरह के लेखकों की पहचान करने में कोई दिक्कत नहीं होती है और वो गाहे बगाहे इनका इस्तेमाल करते रहते हैं, तरह तरह के लॉलीपॉप देकर।

अशोक वाजपेयी ने लेखक संगठनों पर दो बेहद संगीन इल्जाम लगाए हैं, एक तो ये कि इन संगठनों ने लेखकों और वृत्तियों के साथ अन्याय और अनाचार किया। यह सही है। जिस तरह से पूर्व में कई लेखकों को सायास उपेक्षित किया गया वो अब सबके सामने है। हिंदी में प्रचुर और महत्वपूर्ण लेखन करनेवाली शिवानी और मालती जोशी को लगातार उपेक्षित किया गया। उनके लेखन पर जानबूझकर विचार नहीं किया गया। नरेद्र कोहली की कथावाचक कहकर खिल्ली उड़ाई जाती रही। जबकि इन लेखकों के पास तथाकथित मुख्यधारा के लेखकों से कई गुणा ज्यादा पाठक थे और अब भी हैं। यह अन्याय ही तो है। अशोक वाजपेयी और कड़े शब्दों में कहते हैं कि ये लेखक संगठन ‘लोकतंत्र का नाट्य करते हैं पर इन संगठनों का ढांचा मूलतः और मुख्यतः लोकतांत्रिक नहीं रहा।‘ यह सबसे संगीन इल्जाम है। इस बात पर हिंदी साहित्य जगत में विचार किया जाना चाहिए कि क्या इन लेखक संगठनों में लोकतंत्र नहीं है क्या वो लोकतंत्र का नाटक करते हैं। इन लेखक संगठनों के अध्यक्ष उपाध्यक्ष और महासचिव के कार्यकाल को देखकर तो अशोक जी के आरोपों में दम लगता है। पर यह भी लगता है कि इन लेखक संगठनों की सार्थकता तो लगभग समाप्त हो गई है, प्रासंगिकता तो ये पहले ही खो चुके हैं, इनकी विश्वसनीयता भी लगभग समाप्त ही हो चुकी है तो ऐसे में अशोक जी क्यों चिंता कर रहे हैं? संजीव कुमार की तो मजबूरी समझ में आती है क्योंकि वो जनवादी लेखक संघ के पदाधिकारी हैं लिहाजा उनका बोलना आवश्यक है। लेकिन अकेले संजीव कुमार का बोलना भी तो कुछ संकेत करता ही है। इन संकेतों को समझने की जरूरत भी है।

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