दिन की वार्ता है कि पिछले चवालीस दिन, यानि 2018 के जनवरी-फरवरी के महीने के दिनों में छब्बीस भारतीय जवान सरहदों पर, विशेषकर जम्मु कश्मीर के इलाकों में मारे गए। उसके पहले भी अनेक मारे गए, आगे भी स्थिति यही होगी। आगे चैनल के वार्ताकार राष्ट्र्ीयता, आतंक, पाकिस्तान, सैनिकवृत्तियॉ आदि विषयों पर चर्चा का समन्वयन करता है। पक्ष व विपक्ष में जोशीले अंदास में चर्चा आगे बढती है। आजकल यही मीडिया की कारामती शैली है जो द्वन्द्वात्मक तथ्यों को पेश करके, पडोसी को दुश्मन बता कर, उन्हें राक्षसीय रूप में प्रक्षेपित करती है, तद्वारा मनुष्य समुदाय के समायोजन एवं उस संबन्धी भविष्यत् की संभावनाओं तक को दॉव पर लगा देती है। यह आंकडा सिर्फ भारत की उत्तरी राष्ट्र्सीमा को लेकर है, पाकिस्तान के आकंडे अलग हैं, इज्राएल के भिन्न हैं, फिलिस्तीन के उससे भी अधिक होगा। इतना बताना आसान है कि राष्ट्र्सीमा के नाम पर होनेवाला आतंक और मनुष्यहिंसा इस संसार में दूसरे सभी तरह के प्राकृतिक दुर्घटनाओं व मनुष्यनिर्मित आतंकवाद से भी व्यापक और अविरल चलती रहती है। अंतर सिर्फ यह है कि सत्ताई आतंक से संबन्घित रहने पर हर एक आधुनिक राष्ट्र् और वहॉ के अधिकाधिक ’सभ्य’ कहे जानेवाले नागरिक बृद्धिजीवि व उनसे नियन्त्रित रहनेवाली राष्ट्र्व्यवस्था इस बात को हठात् भूलने की वृत्ति अपनाती है।
द्वन्द्ववाद पर पनपी आधुनिक समय की तमाम धारणाएं और उसकी विभीषिकाएं काफी समय से मानवकुल के उूपर हावी हो रही हैं, जिनपर उस समय से विद्वानों को शंकाएं थीं, जो आज स्पष्ट और मूर्त बनकर मनुष्य के बेहतर समुदायिक जीवन को खा रही हं, असमंजस में डाल रही हैं। पर बहुसंख्यक सहमति पर आगे बढनेवाली सत्ता एवं सामाजिकता सदैव बहुसंख्यकों को काबू में रखनेवाले लोगों के हित में रूपायित हो जाती है। बहुसंख्यक धारणा का मतलब ही इस तरह निराधार एवं दुरूह बन जाती है। बहुसंख्यकता आंकने या निश्चित करने के तरीके भी फूहड एवं अवसरवादी हैं। मनुष्य को कई जाति-धर्म-नस्ल-राष्ट्र् में बॉटने और बड्डपन जमाने की रीतियॉ संसार के इतिहास से शुरू हैं, जो नए नए तरीकों व कारणों पर आज भी चल रही हैं। आज जो भुगत रहा है, उसपर महाशयों ने पहले समय से दीर्घदृष्टि डाली थी। समस्या यह है कि उनकी बातों को उस समय पर या परवर्ती समय में लोगों ने उतनी गंभीरता से नहीं लिया या उस संबन्ध में किए गए इलाजकर्म कभी वांछित दशा तक पहुॅच नहीं पाए। विश्वमानवत्व की कल्पना में संसार सबका है, यहॉ पर सब समान है। सामान्य दृष्टि से ही यह वायवी कल्पना है, कभी न साकार होनेवाली कोरी कल्पना। इसके नाम लेकर यदि राजनीतिक धूर्तता व सत्तात्मक प्रवंचना चलती रहती है तो उन पर बोलना पडता है।
संकल्पनात्मक दृष्टि से आज किसी को यह शंका नहीं है कि निश्चित भूसीमा पर अधिष्ठित राष्ट्र्सत्ता के पास संप्रभुता और वर्चस्व को वैध करार देने के सभी उपकरण है और उनके बल पर ही वह राज एवं सत्तात्मक राजनीति करती रहती है। वैधता की विविध संरचनाएं क्रमवार खडा करती हैं कि आम इंसान को वे सटीक व क्रमबद्ध शासन केलिए अनिवार्य होने का आभास देती हैं। दार्शनिक दृष्टि से ऐसी कोई वैधता किसी राज्य के स्वभाव में नहीं है। अतः अवसानुकूल राज्य के संस्थागत संचालन केलिए नियमों का इस्तेमाल किया जाता है। समान नागरिकता का दावा और उसकी वैधता इस तरह की प्रतीतियों में एक है। ऐसे में राष्ट्र्ीय विशेषण से युक्त जितने भी साधन व सामग्रियॉ व परवर्ती कार्रवाईयॉ हैं, उनका उपयोग-प्रयोग प्रतीतियों के बल पर इंसान के वैचारिक उद्वेलन को रोकने केलिए सत्तात्मक सख्तियों के द्वारा उपयुक्त किए जानेवाले उपकरण भी बन जाते हैं।
जॉर्ज बर्नाड्षा किसी प्रकार के अहम राष्ट्र्गौरव को नहीं मानते थे, आइनस्टाइन भी राष्ट्र् एवं उस पर जतानेवाले मिथ्यासम्मान, दोनों के विरोधी थे। आधुनिकता के स्वत्वरूपायन में इन दोनों, माने राष्ट्र् तथा राष्ट्र्प्रेम का प्रचलन बहुत मायने रखता है। राष्ट्र् अपनी गणतंत्रीय सामाजिकता को खोकर जब राजनीतिक सत्ताकेन्द्र बन जाता है, तब वह अधिकार और वर्चस्व का दरिया बन जाता है। उसका कार्य राजनीतिक क्रियाकर्मों का अड्डा बन जाता है। विडंबना यह है कि कुछ लोगोंके क्रियाकर्मों के आगे सत्ता को मौन साधना पडता है, क्योंकि सबकुछ उसके अधीन होती है। अंततः ऐसी स्थिति किसी महाजनी, साम्राज्यवादी या पूंजीवादी प्रकृति से भी बडी धुरंतर बन जाती है। उपनिवेश के साथ इस प्रवृत्ति को जोडकर देखने से आज के इंसानी समाज को तसल्ली नहीं मिल सकती है। राष्ट्र् रखने केलिए उन तमाम औजारों का उपयोग करना होता है, जो बुनियादी तौर पर मनुष्यत्व के विरोधी हैं। फिर बचाव केलिए राष्ट्र् गौरव का उपाय इस्तेमाल किया जाता है। राष्ट्र्प्रेम की विनिर्मित मानसिक स्थिति का परवर्ती परिणाम राष्ट्र्वाद निकल जाता है और उसके प्रचंड और वहशी रूपों से मुखातिब साधारण से साधरण इंसान और उनकी सामाजिकता के संवेदनात्मक रिश्ते अपने आप में निरस्त और निस्पृह पाते हैं। ’नागरिकता’ या ’विश्व मानवत्व’ की अवधारणा किसकेलिए, क्यों और कैसे की गई और उसका कार्यान्वयन कौन, कैसे, किसकेलिए करता है? विदर्भ में जीवन संकट के मारे, आत्मबली चढानेवाला कोई कंकाल किसान या उसकी असहाय पत्नी को कोई विश्वमानव कहेगा या नहीं? उनपर भी कभी कोई अपनी नागरिकता की चर्चा में सोचेगा या नहीं? उल्टे कभी भी जीवन की विभीषिकाओं के आमने सामने उन्हें अपनी नागरिकता पर गर्व आएगा कि नहीं? आदर्श, मनुष्य जगत केलिए अनिवार्य है। पर आदर्श के नाम पर झूठे व निराधार अहसास दिया जाता है तो उसकी सार्वजनिक चर्चा अनिवार्य बन जाती है, क्योंकि समय बीतने पर भी वह असर नहीं कर पाता है। चर्चा यहॉ पर बु़द्धजीवियों व अकादमिकों का कार्य रहती है, विशाल जगत के सामान्य इंसान से वे अलग रहते हैं तो उनका आदर्श केवल पुस्तकीय बात रह जाता है।
गणतंत्र पर सम्मान रखना है, इस बात पर कोई दूसरा मत नहीं हो सकता है। पर उसका अर्थ एवं परवर्ती कार्य इतिहास निरपेक्ष नहीं है, काल-समय निरपेक्ष भी नहीं है। सबसे अधिक राजनीतिक रहनेवाली यह बात राजनीति-निरपेक्ष होने के अंदाज में उपयुक्त-प्रयुक्त एवं कार्यान्वित की जाती है। राजनीतिक क्षेत्र में इस प्रतीति का उपयोग निजस्वार्थ केलिए संभव एवं संपन्न किया जाता है। अनेकों गुप्त मान्यताओं व पूर्वग्रहों से प्रेरित इस कार्य में राजनीति से बढकर अधिकारलिप्सा और दलीय कूटनीति काम करती है।
सीमा भूनिर्णयों के बिना राष्ट्र् की पहचान मुश्किल है। इसलिए राष्ट्र् को केन्द्र में रखकर किए जानेवाले सभी निर्णय भीतरी भावुकता से परिपूरित किया जाता है। इस अर्थ में वह लोगों को लुभाता भी है, पर दूसरा पहलू इससे भारी रहता है कि इस तरह का कोई भी निर्णय अधिकार की भाषा में ही अवतरित हो पाती है, उसके बिना उसका होना, रहना और अमल में आना मुश्किल है। गणतंत्र के रूपायन के बाद, सत्तात्मक नियन्त्रण में नए राज्यों की स्थापना हुई, मगर वे राज्य कभी जनता के राज नहीं बन पाए। तकनीकी दृष्टि में उनकी आपूर्ति और व्यावहारिक जगत में उनका फासला आज भी जारी रहनेवाली किसानी हत्या और खेतीहर आंदोलनों से सर्वविदित होता है। गलती कहॉ हुई यह देखने का समय बीत गया। चुनाव के मैदानों और राजनीतिक दलों के महासम्मेलनों में सर्वहारा, दलित, स्त्री या किसान शब्द जितनी बार सुने व सुनाए जाते हैं, उसके बाद वे उतने ही अनसुना रहते हैं।
भारत देश की राष्ट्र्ीयता की अवधारणा काफी समय से चर्चित रही है। राष्ट्र् की स्थापना के समय से लेकर उसपर परिचर्चाएं होती रही हैं और यह शिकायत की जाती है कि उसपर वैश्विक पूंजीवाद की छाया है। पहले उपनिवेश और तत्संबन्धी प्रशासनिक व्यवस्था ने देश के भीतर व बाहर को विषलिप्त कर रखा था, जिससे आज भी राष्ट्र् मुक्त नहीं है। बहुलता के देश में मतभेद सुलझना मुश्किल रहता है तो उसके बदौलत फूट व भीतरी क्लेश खडा करना आसान है। इस संदर्भ में देश, सत्तधारी ’राष्ट््र’ के रूप में व्यवहार करता है और जिस ’अस्पष्ट’ जनता की खुशहाली की वह बात करता है, व्यवहार में उसके विपरीत में रह जाता है। लोकतंत्र के नाम पर होनेवाली नेतागिरी व भ्रष्टता के हाथों में देशजता और निचले पायदान की जनता पिस जाती है।
गॉधीजी व टागोर इस देश के दो महान हस्तियॉ थीं, जिन्होने आरंभ से लेकर राष्ट्र् की संकल्पना एवं उस संबन्धी बातों पर गंभीर बहस काफी समय तक जारी रखी थी। उनका जीवन समय भी इसकेलिए प्रेरित करनेवाला था। उनकी बातों ने वाद, विवाद एवं संवाद खडा किया, पक्ष-विपक्ष एवं अन्तर्विरोधों पर चर्चाएं हुई। आज भी समय संदर्भानुसार इन दोनों की बातों का उपयोग-प्रयोग जरूरतमंद लोग करते रहते हैं। भारतीय राष्ट्र्ीयता को देशप्रेम के साथ मिलाकर दोनों की बातों व तत्संबन्धी संकल्पनाओं को समय-संदर्भ के अनुसार राजनीति के साथ मिलाया जाता है। प्रकरणों में जनतांत्रिकता को भुलाकर बाहर आनेवाले वहशी कार्यकलाप बहुत होते रहते हैं। राजनीतिक ़क्षेत्र में सांस्कृतिक संकल्पनाओं के वाचन की विविध रीतियॉ स्वतः समाप्त होती है। अतः दिन-ब-दिन बढनेवाली ऐसी वैसी कार्यप्रणालियों से देश की आत्मा पस्त रहती है कि यहॉ पर अब जाति, धर्म या दलीय पहचान के बाहर कुछ होता नहीं है। सामान्य व विशेष अर्थ में इन संकल्पनाओं का अर्थ सिमटकर नकारात्मक वृत्तियॉ बन जाती हैं और लोकतंत्र की मुख्य प्रवृत्ति के रूप में ख्याति प्राप्त आत्मविश्लेषण या आत्मालोचन की ऑखें बंद हो जाती हैं। तदनुरूप अब सत्ता व देश का द्वन्द्व भी इतना फासला रखने लगता है कि इनपर होनेवाले आपसी मतभेद, न्यायिक मामला बनकर अदालत के पास पहुॅचता रहता है। राष्ट्र् के मस्तिष्क चिंतन और सत्ता के राजनीतिक लोभ के साथ दलीय स्वार्थ एवं दंभ जब मिल जाता है तो इस देश की आत्मा और जनता के सपने चकनाचूर होते हैं। गरीब से गरीब इंसान और बेसहारा किसान यहॉ पर वह नृशंसता झेलने को अभिशप्त होता है, जो प्रागैतिहासिक समय में भी उसके सामने इस दम तक उपस्थित नहीं थी।
सत्ता विमर्श करनेवालों को आतंकवादी बनाने की विधियॉ स्टेट यानि राज्य के पास कई हैं। सत्तात्मक राजनीति का आतंक जोरों पर है। सत्ता हडपने केलिए कोई हर तरह का अतंक करता है। बताया जाता है कि जनता की सेवा के नाम परही कोई दल या राजनीतिज्ञ ऐसा करता है। असलीयत यह है कि सत्ता के भूखे को फिर कभी उस रास्ते से हटना मुमकिन नहीं लगता है। इसलिए है कि उसकी सत्ता आतंकों व हलचलों के आधार पर हासिल हुई होती है। हजारों भ्रष्टताओं को ओढने केलिए उसे अपने को राजनीतिक सत्ता के केन्द्र में स्थापित रखना पडता है। जनसेवी इंसान क्यों झुंड हत्या माने मोब लिंचिंग पर चुप रहेगा या मतांतर दिखानेवालों को समाप्त करने की राजनीति सोचेगा?
राष्ट्र्वाद पर अतिवादी मान्यताओं की जडें जितनी मजबूत और दलीय राजनीति के बल पर स्थापित व प्रवर्तित रहती है कि उसकी चर्चा तथा पोल खोलने के रास्ते में लोग पराजय पाते हैं। निजस्वार्थ में डूबे दलीय प्रतिनिधियों के बीच का मतभेद भी फेन की तरह सद्यः सिकुड जाता है। यहॉ पर यह आसान है कि सांप्रदायिक हवा डालकर झुंडहत्या काआयोजन करें। इयत्ता के नाम पर भीतरी जनता में भी अलगाव और अजनबीपन डालने की इस प्रवृत्ति का अंजाम इतना बुरा निकल रहा है कि राष्ट्र्ीय कार्यक्रमों के औपचारिक अवसरों के प्रदर्शनों के अलावा इस देश में दो उपजाति, जाति, धर्म या राज्य के लोगों में समीपवर्ती इंसानी सहूलियत की उम्मीदें मुश्किल साबित हो रही हैं। क्रिकेट का खेल या राजनीतिक दलों की महारैलियों के मैदान के अलावा ’विविधता’ का आभास कहीं नहीं है, हालांकि ये दोनों स्थानों पर झुंड सोचविचार या विवेकी संवेदनात्मकता के परे विनिर्मित झूम झूमती नजर आती है, और सुधबुध खोकर व्यवहार करती है, जो आत्मनियंत्रित थोडा और अन्यनियन्त्रित अधिक है।
रवीन्द्रनाथ टागोर कई संदर्भों पर राष्ट्र् के पक्ष नहीं थे, राष्ट्र्गान पर हुई परवर्ती कार्यप्रणालियों व कार्यान्वयन विधियों के आगे से यह बात विरोधाभास लग सकता है। इतने सालों में और आज भी उन्हीं की पंक्तियॉ राष्ट्र्गान के रूप में हर जगह सुनाई जा रही हैं। वे देश की उन्नति और भविष्य चाहते जरूर थे, ’विश्वभारती’ की स्थापना के समय में वे वैश्विक स्तर की शिक्षा का प्रचलन करना चाहते थे और भारतीय ज्ञान को विश्वभर में पहॅुचाना चाहते थे। यह बताया गया है कि राष्ट्र्ीयता संबन्धी उनकी काफी शिकायती मान्यताएं थीं। उन्होंने राष्ट्र्वाद के आगामी रूपायन और विभीषिकाएं पहले ही देखीं और विदेशी विद्वेष को भडका कर काम चलानेवाली सत्तात्मक चालाकियों व प्रशासनिक बचकानों पर आलोचनात्मक नजर डाली। टागोर की बातों की संदिग्धता के अंशों को प्रत्यक्ष करनेवाले बाद के विद्वानों के मंतव्य भी चर्चित व आनूदित हुए। इसमें संदेह नहीं कि काल व समयानुसार उनकी चर्चा की संकल्पनागत सीमाएं हैं, जिनपर अकादमिक एवं सांस्कृतिक चर्चा जरूरी है। यह मानी हुई बात है कि अनुवाद ने टागोर को विश्व पुरूष बनाया है। यह अक्सर बहुत सकारात्मक और गौरवपूर्ण अंदाज में कहा जाता है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया और उसके असामान्य प्रयोगों पर आलोचनात्मक दृष्टि डालनेवाले केलिए यह उतना सकारात्मक तथ्य नहीं है, विश्वमनुष्यत्व की संकल्पना पर इससे प्रश्नचिह्न लगाया जाता है। यह मानना मुनासिब है कि विश्वमनुष्यत्व के आदर्श का संघर्ष भी परिपक्व एवं चिंताशील इसांन का कार्य है, जिससे क्रमशः आशय का विस्तार या सकारात्मक प्रचलन संभव होता है। यह चिंतन आज झुंड की अतियों व हत्याओं के आगे सन्न और वायवी दिखता है। जहॉ पर संघर्ष, प्रतिरोध आदि सकारात्मक संकल्पनाएं दम तोडती हैं, जो अर्थ से फिसलकर अब ’अति’ का पर्यायवायक बन जाती है, वहॉ पर कोई पददलित या हाशिए का इंसान इनपर कोई आश्रयपूर्ण सहूलियत महसूस नहीं करता है।
देश के भीतर भी प्रान्त या राज्यसीमाओं की दीवारें पनप उठती रहती हैं। हर प्रेदश या राज्य इस कारण की खोज में रहता है कि अपनी सीमा या भूपरिधि से होकर बहनेवाली नदियों का जल या खदानों सहित समस्त प्रकृति संपदा की वस्तुओं की उपादेयता से दूसरे प्रदेश या राज्य को कैसे वंचित रखा जा सकता है। राज्यस्तरीय, राष्ट्र्ीय या अन्तर्राष्ट्र्ीय राजव्यवस्था अपने वैश्विक स्वरूप के एवज व अहंकार में झुलसती हैं तो उस समय समाज, या देश के सामान्य सी इंसानी जरूरतें नगण्य बन जाती हैं, सार्वजनिकता का अर्थ खोखला बन जाता है। वहॉ पर पॉच हजार कर्ज चुकाने में खुद को असमर्थ पाकर, आत्मसम्मान रखने केलिए देशज खेतीहर आत्महत्या करता है, पर पन्द्रह-बीस हजार करोड रूपए चुराकर आभरण या मदिरा व्यापारी आसानी से राष्ट्र् से भाग सकते हैं और बेहतर जीवनस्थितियों में अपनी रीतियों को अच्छी, सटीक व परिस्थितिजन्य घोषित करके आराम परस्त जी सकते हैं!
झुंड की करतूतों पर राज्य या न्याय तक का नियन्त्रण नहीं है, जरूर यह आभास देने का प्रयास होता रहता है कि उसपर दलीय, प्रशासनिक या न्यायिक कार्रवाई की जाएगी। पर होनेवाले आक्रमणों व अतिक्रमणों की बढती संख्या यही बताती है कि पंथ या झुंड को काबू में रहने का कोई भी दावा उतना सफल नहीं है। इसलिए दीर्धदृष्टिपूर्ण वह कथन साकार हो उठता है कि राष्ट्र््वाद के प्रचलन के समय में मनुष्य, मनुष्यत्व विरोधी बन जाता है।
देश और राष्ट्र् के शब्द जब तक एक दूसरे के पूरक नहीं बन पाते है, तब तक किसी गणतंत्रीय राष्ट्र्ीयता की संकल्पना सटीक नहीं बन पाती है। पिछले कुछ समय से इस देश की बहुस्वरता तक को हिलानेवाली राजनीतिक चंडूखाने का प्रचलन हो गया। विविधता के समवाय में समग्रता को देखने के बदले एकोन्मुखी राष्ट्र्ीयता का नारा अधिक सुनाई पडता है। इसका बुरा परिणाम झुंड राजनीति है, जो दलसत्ता या राष्ट्र् के नियन्त्रण से भी बाहर चलती जा रही है। इस देश के ऐतिहासिक राष्ट्र्दर्शन में विविधता के संकल्प अनुपेक्षणीय थे जिसके प्रति श्रद्धा और निष्ठा के बिना संविधान का निर्माण तक असंभव था। विडंबना कहें कि उस विविधता को अब राष्ट्र्ीयता के प्रचंड और एकोन्मुखी आडंबर से टक्कराना और छिन्न भिन्न होना पड रहा है।
राष्ट्र्ीयता को सबसे निखरे सम्मानों में एक माना जाता है, पर वह मिथ्याभास तब बन जाता है जब एक गणतंत्र के रूप में उसका दुरूपयोग हम रोक नहीं पाते हैं। राष्ट्र्भाषा पर इतराने और उस संबन्धी नियमों को अमल करने का कृत्रिम एवं कार्यालयीन कार्यान्वयन यही बताता है कि कार्यालयों व बाजारों की भाषा जनभाषा से अलग, काफी दूर पर ही रहती है। राष्ट्र्भाषा या मातृभाषा के विकास पर आंदोलन चलानेवाले और उनके नाम पर राजनीतिक फैसले लेनेवाले यह भूल जाते हैं कि ज्ञानकेन्द्रित समाज में भाषास्वत्व का मतलब ही उसकी ग्रहणीयता, संग्रहणीयता और लोकभंगिमा है। आपकी भाषा में यदि सामान्य से विशेष तक की ज्ञानशाखाओं को कहा, पढा, लिखा और समझा नहीं जा सकता है, तो नियम, अधिकार और नौकरशाही के उपकरणों के बल पर आप बस, नियम पालन की औपचारिकता ही पूरी कर सकते हैं।
गणराज्य स्थापना केलिए अधिकारी से बढकर जनता का कार्य पूरा होना है, कम से कम यही उसका बुनियादी दर्शन है। पर सत्ता व दलीय राजनीति के कूटनीतिक मिलन के कारण दलीय लोग चुनाव एवं राज्याधिकार पर ही सोचनेवाली मानसिकता में बने रहते हैं। पाने से बढकर देने या बॉटने की खुशी राजनीति की मूलसंकल्पना बताई जाती थी। पर यहॉ की पक्ष-प्रतिपक्ष की राजनीति आपस में ललकारने व कीचड फेंकने से बढकर सकारात्मक परिणाम लाने में सक्षम नहीं है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आधुनिक राष्ट्र्महिमा को वर्तमान रखने केलिए भूतकाल में व्यवहृत लोकसमवाय के दर्शन को भूलना अनिवार्य है या नहीं? नागरिकता, राष्ट्र् के बाहर की तरफ बहनेवाली संकल्पना भी है, उसमें इयत्ता कम दिखायमान है, आत्मीयता ज्यादा मुखरित रहती है। भारत एक राष्ट्र् नहीं, देशजता का समवाय संकल्प है। उसकी नागरिकता का मतलब है, सबकी आजादी या खुशहाली रखनेवाली समीपवर्तिता। सत्ता की केन्द्रियता की जगह नागरिक संचय को मिलाने और अवसर बॉट देने की बात पर सोचना है। गणराज्य की स्थापना और उस केलिए प्रयत्न उस समय के नेताओं व कार्यकर्ताओं के जीवन के लक्ष्य थे। फलस्वरूप प्राप्त राष्ट्र् या राष्ट्र्दर्शन स्वायत्त होने के बाद भी उपनिवेशी विरासत की केन्द्रीय राजनीति का अनुकरणकरतेरहने का कार्य अब इस देश की जनता की देशज रीतियों व समीपवर्ती जीवन आकाक्षाओं पर हावी रहता है।
सामान्य एवं विशेष दृष्टि से ’राष्ट्र्प्रेम’ और ’विश्वमानवत्व’ अत्यंत सकारात्मक संकल्पनाएं हैं। समस्या वहॉ है, जहॉ इनके नाम पर होनेवाले आतंकों व अलगावों को उन्हीं के अधीन होकर परिभाषित करना पडता है, राष्ट्र् के भीतर या बाहर विविध कारणों पर होनेवाले उत्पीडनों, हत्याओं, आतंकों व भिडंतां को इन संकल्पनाओं के तहत स्पष्टीकृत रखना पडता है। उस समय में सामान्य इंसान का कोई स्थान नहीं है, उनका जीवन संदर्भ कहीं नहीं रहता है। उसे लगता है कि वह सरकारी व सत्तात्मक परिभाषाओं के आसपास तक कभी पहुॅच नहीं पाता है। अफसोस के अलावा चिंतावान इंसान समस्त परिभाषाआें व सीमातीत संकल्पनाओं के भिडंत में कुछ तय नहीं कर पाता है। इतना तो लगता है कि सार्वभौमिकता, विश्वमानवत्व, मानवतावाद, इयत्ता, राष्ट्र्र्भक्ति इत्यादि अवधारणाओं के पीछे प्रवर्तित मान्यताएं एकदम निष्कलंक एवं नितांत नहीं हैं। कम से कम इस बात को मानने से आदर्श और व्यवहार के भेदभावों की समझ बढती है और हर समस्या को राजनीतिक व कूटनीतिक ढंग में सुलझाने की राष्ट्र्नीति की फॉकों पर पुनरवलोकन जरूरी लगता है। इस बात के चिंतन मनन को सार्वजनिक करने व लोगों तक पहुॅचाने का दायित्व कमलकर्मी को भी उठाना है। मनुष्य को अपनी विविध अस्मिताओं के साथ मनुष्य वंश की अस्मिता एवं मनुष्यत्व के अस्तित्व को भी बनाए रखना है। धर्म हो या कर्म, कला हो या सौन्दर्य, ज्ञान हो या विज्ञान मानवीय अस्मिता की स्थापना और पुरोगामिता सबका कार्य है, लक्ष्य है। इसलिए गतकालीन चिंतकों की शंकाओं को विशद करने व उपयुक्त करने में ज्ञानादर्श के साथ संवेदनात्मक सच्चाई का भी सम्मेलन जरूरी है, जो अबके दौर में कुछ फीका या स्थगित सा लग रहा है। इस तरह आगे बढते समय आदर्शात्मक संकल्पनाएं दुबक कर किताबी रह जाती हैं और विपरीत यथार्थ के राक्षसी रूपों के आगे सामान्य इंसान चकित रह जाता है।

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