भारत में महानतम इस्लामी विरासत का आधार फ़ारसी सभ्यता और संस्कृति, प्राचीन हिन्दी सभ्यता और उसकी विविधतावाद पर हैl उदहारण के लिए मध्य एशिया के साथ भारत के प्राचीन संबंधों के पेट से जन्म लेने वाले तसव्वुफ़ ने “वह्दतुल वजूद” का एक वैश्विक संदेश पेश किया जिसके आईने में “वसुधैव कुटुम्बकम (अर्थात पूरा विश्व एक खानदान है)” की पुरी सुन्दरता के साथ परिलक्षित होती हैl इस प्रकार, भारतीय इस्लामी विरासत मूलतः नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की उस रिवायत की अमली ताबीर है कि : “الخلق عیال اللہ” अर्थात: पुरी मानवता अल्लाह का खानदान हैl यह भारतीय इस्लामी रिवायत में धार्मिक बहुलतावाद का प्रतीक है जिसे अल्लाह की मर्ज़ी का वास्तविक प्रतिबिम्ब कहा जा सकता है, जैसा कि कुरआन में अल्लाह का फरमान है:

“और आप का रब चाहता तो पुरे धरती के लोग सारे के सारे ईमान ले आते”

भारत में सांस्कृतिक और साहित्यिक इस्लामी विरासत का शक्तिशाली आधार साझा ज्ञान प्राप्ति में हिन्द व अरब संघर्ष पर है, जो कि विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य, वास्तुकला, कला और हास्य कला में अपने चरम को पहुँच चुकी थीl इस्लाम के सांस्कृतिक इतिहास के प्रारंभिक चरण में ही भारतीय सभ्यता व संस्कृती पर मुस्लिम उलेमा व शोधकर्ताओं की ओर से शोध, अनुवाद और साहित्यिक सेवाएं जैसे अल बैरूनी की पत्रिका (किताबुल हिन्द “भारतीय इतिहास का अध्ययन”) और “हिन्दुस्तानी नज़रियात” पर उनकी मूल पुस्तक (तहकीक अल हिन्द), अब्बासी खलीफा अल मंसूर के आदेश पर भारतीय खगोलशास्त्र की किताब ‘सिद्धांता’ का इब्राहीम अल फिजारी का अनुवाद, आधुनिक बीजगणित पर अल खुर्जमी की किताब “अल जमा वत्तफरीक बिल हिसाब अलहिंदी”, और इब्ने मुकफ्फा की बहुत प्रसिद्ध अरबी गद्य “कलीला व दिमना” (जिसका सबसे पहले संस्कृत से पहलु भाषा में अनुवाद किया गया था) और उनहीं की किताब “अलअदब अलकबीर” जिसमें शासनों के उच्च व्यवहारिक मूल्यों और लोगों के साथ उनके संबंधों को बयान किया गया है, यह सभी हिन्द व अरब खजाने के विरासत गिने जाते हैंl प्राचीन मिस्र, बैनुन्नहर, मध्य एशिया और अफ्रीका से सैर करता हुआ काकेशस से लेकर पूर्वी एशिया के क्षेत्र तक केवल हिन्द व इस्लामी सांस्कृतिक विरासत को ही नहीं बल्कि पुरे विश्व समुदाय को भी बढ़ावा प्राप्त हुआl एक ओर तो खुसरो की शायरी और संगीत का निर्माण अब तक भारतीय कव्वाली की आत्मा बनी हुई है, जबकि इस्लाम और हिन्दू मत के बीच समानता और सूफीवाद और भक्ति मत के बीच एकरूपता की दाराशिकोह की बौद्धिक परंपरा आज तक प्रगतिशील मुसलमानों के बीच जीवित हैl

इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह इस्लामी विरासत विनम्र, संयम, बहुलतावादी और सहिष्णुता पर आधारित एक सभ्य समाज का आधार रखने का एक अभिन्न हिस्सा है जिससे अलगाववाद, अतिवाद, धार्मिक श्रेष्ठता की भावना और तास्सुब व तंगनज़री का द्वार बंद होता हैl इसलिए, मौजूदा इस्लामी इस्लामी बहस में उन मानवीय मूल्यों को उजागर किया जाना चाहिए और मुस्लिम बहुल और लोकतांत्रिक देशों में इनके आधारों को शक्तिशाली किया जाना चाहिएl

इस संबंध में उल्लेखनीय बात यह है कि जॉर्डन की हाशमी साम्राज्य जो इसी ताबनाक इस्लामी सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत है उसने भारत के विनम्र इस्लाम के बयाना की ताईद की है, जो कुरआन के बहुलतावाद, सहिष्णुता के सिद्धांतों को बढ़ावा देता हैl इसकी तहरीक कुरआन मजीद के इस शिक्षा पर आधारित है:

 “यह सब अल्लाह पाक और उसके फरिश्तों पर और उसकी किताबों पर और उसके रसूलों पर ईमान लाए, उसके रसूलों में से किसी में हम अंतर नहीं करतेl (2:285)

हाल ही में शाह जॉर्डन अब्दुल्लाह बिन हसन जो भारत के 3 दिन के दौरे पर थे, उन्होंने नई दिल्ली में “‘इस्लामी सांस्कृतिक धरोहर: समझ और संयम का बढ़ावा” के शीर्षक से आयोजित एक सम्मेलन में कहा कि: “सभी नेतृत्व का उद्देश्य लोगों की आशाओं और हित के लिए काम करना हैl यह मेरा फ़र्ज़ है जिसका आधार मेरे दीन इस्लाम की शिक्षा परl इसी कारण, हमारी सबसे बड़ी वरीयता जॉर्डन के सभी निवासियों, ईसाईयों, मुसलामानों और सभी लोगों के लिए एक बेहतर भविष्य को सुरक्षित करना हैl”

इस महा सम्मलेन में भारत के प्रधानमंत्री और शाह जॉर्डन ने इस्लामी मॉडरेशन को बढ़ावा देने और आइएसआइएस और अलकायदा के खतरों को समाप्त करने के लिए उग्रवादी विचारधारा का मुकाबला करने में दोनों देशों के दृष्टिकोण पर प्रकाश डालीl उन्होंने इस सम्मलेन में आम श्रोताओं, बुद्धिजीवियों, इस्लाम के उलेमाओं और भारत में लगभग सभी इस्लामी फिरकों के नेताओं पर आधारित एक बड़ी संख्या में मौजूद श्रोताओं को संबोधित कियाl

इस सम्मलेन में अतिवादी विचारधारा को समाप्त करने वाले के पीछे कुंजी उत्तेजक के रूप में भारत की धार्मिक विविधता को हाइलाइट किया गया हैl यह विचार कि भारत एक वैश्विक इस्लामी पहचान कायम कर सकता है दोनों नेताओं के उन बयानों से स्पष्ट था जिनमें विविध भारतीय संस्कृति के संदर्भ में इस्लामी मॉडरेशन पर जोर दिया थाl प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को इलाही संदेश (खुदा के संदेश) का एक ऐसा देश बताया जहां सभी धर्मों को बढ़ावा प्राप्त है, और उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को “ प्राचीन बहुलतावाद का नमूना” बतायाl उन्होंने कहा, “चाहे वह महात्मा गांधी हों चाहे गौतम बुद्ध, अमन और मुहब्बत का संदेश भारत से दुसरे देशों तक फैला है; भारत की पहचान यह है कि यह पुरी दुनिया को एक खानदान मानता हैl “प्रधानमंत्री ने प्राचीन भारत की बहुलतावादी व्यवहार को बढ़ावा देने में ख़ास तौर पर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के सूफीवाद का भी उल्लेख कियाl प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में वसुधैव कुटुम्बकम का वैदिक सिद्धांत, शांतिपूर्ण सूफी संदेश, विभिन्न धर्मों का आपसी संगम और गंगा जमुनी सभ्यता के महान विरासत को काफी उजागर किया, जिसका समर्थन शाह अब्दुल्लाह ने अपने इस निम्नलिखित बयान से कियाl

एतेहासिक तौर पर भारत अकेला ऐसा देश है जिसने एक ऐसी व्यापक संस्कृति (गंगा जमुनी सभ्यता) का आधार रखा है जिसमें वेदी परंपरा, गौतम बुद्ध की आठ शिक्षाएं (अष्टांग), महावीर जैन की अहिंसा, इलाही प्रकाश (वाहे गुरु) पर सिख मत की शिक्षाएं और वह्दतुल वजूद का सूफी सिद्धांत भी शामिल हैl सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल व्यापक भारतीय राजनीतिक माहौल के बहुलतावादी मूल्यों में ही सामी धर्मों का मजबूत तौहीद परस्ताना अकीदा शिर्किया धर्मों के साथ पुरे अमन व सद्भाव के साथ ज़िंदा रहाl इसलिए, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आतंकवाद का रोक थाम किसी भी धर्म के विरुद्ध लड़ाई नहीं बल्कि यह एक विशेष गुमराहकुन मानसिकता के खिलाफ एक जंग हैl शाह अब्दुल्लाह ने आतंकवाद के खिलाफ विश्व युद्ध को बजा तौर पर “आतंकवादियों के विरुद्ध सभी बिरादरी के उदारवादियों का जंग करार दिया”l

बेशक, इस्लामी आतंकवाद पर वार्ता के हवाले से मुस्लिम देशों के साथ भारत की प्रगतिशील मजबूत नीतियां देश की विदेश नीति के लिए कट्टरपंथ के खिलाफ और मुस्लिम समाज को उग्रवाद से बचाने में एक बहुत बड़ी सफलता हैl भारत के प्रधानमंत्री और शाह जॉर्डन के दो टुक बयानों से आशा है कि भारत में इस्लाम के एक व्यापक ब्याना को लोकप्रियता मिलेगी, तथापि दुखद बात यह है कि यह अब भी भिन्न तरीकों से चरमपंथियों की आक्रामक कार्यवाहियों के कारण दबा हुआ हैl तथापि, आशा है कि इस सम्मलेन में सभी मुस्लिम फिरकों की असामान्य उपस्थिति से बाहरी या आंतरिक अतिवादीयों के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को पेश आने वाले खतरों के खिलाफ मुस्लिम समाज में एक मजबूत प्रतिक्रिया की स्थापना होगी।

जाहिर है कि अगर अतिवादियों का मुकाबला करने की बात की जाएगी तो सभी वर्गों के भारतीय मुसलामानों ने इस संबंध में सद्भाव का प्रदर्शन किया हैl भारत में सभी इस्लामी फिरकों (सुन्नी, शिया, बरेलवी, देवबंदी आदि) के नेताओं और इस्लामी फिकह के सभी मजहबों (हनफी, शाफई, मालकी) और व्यक्तिगत स्तर पर भी सभी प्रतिष्ठित मुस्लिम नेताओं और विचारकों ने भी स्पष्ट तौर पर उग्रवादी प्रवृत्तियों को रद्द किया हैl वास्तविकता तो यह है कि उग्रवाद के खिलाफ सबसे अधिक फतवे भारतीय उलेमा और मुफ्तियों (इस्लामी फुकहा) ने सादिर फरमाए हैंl सुन्नी सूफी नेतृत्व (वर्ल्ड सूफी फोरम) के तहत मार्च २०१६ को रामलीला मैदान दिल्ली में आयोजित होने वाले जलसे, और जमीयत उलेमा ए हिन्द की ओर से अक्टूबर २०१७ को इन्द्रागांधी इनडोर स्टेडियम में आयोजित होने वाले बहु-धार्मिक सम्मेलन (अमन व एकता समरलैंड), में हज़ारों की संख्या में मुसलामानों ने अमन, बहुलतावाद और आतंकवाद के रोक थाम का प्रस्ताव विकल्प करने और हर प्रकार के हिंसा को गैर इस्लामी, देश के विरुद्ध और अमानवीय करार देने के लिए एकत्रित हुएl हमारे देश के अंदर इस प्रकार के फतवों की लोकप्रियता के मद्देनजर पाकिस्तानी विद्वान डाक्टर ताहिरुल कादरी ने भी आतंकवाद के खिलाफ अपने फतवा “ जदीद ख्वारिज और दहशतगर्दी” का इजरा भारत से किया इसके बाद किताब का इजरा लन्दन से भी किया गयाl

लेकिन दुख की बात है कि आतंकवाद और उग्रवाद के विरुद्ध इतने बड़े पैमाने पर सम्मेलनों औ जलसों के बावजूद भारत के उलेमा के बीच अब तक तकफीरी रुझान समाप्त नहीं हो सका, जो कि हालांकि हिंसक नहीं लेकिन इस देश में सैद्धांतिक तौर पर अब भी जीवित अवश्य हैl अदम तकफीरियत एक ऐसी चीज है जिसे भारतीय मुसलमान जॉर्डन की प्रगतिशील इस्लामी नेतृत्व से सीख सकते हैंl

भारतीय मुसलामानों के लिए जॉर्डन का महत्व इस्लाम की एक वैश्विक गैर तकफीरी ताबीर में निहित है जिसका सत्यापन शाह अब्दुल्लाह ने अमान संदेश के माध्यम से की जिसे इस्लाम परस्त कट्टरपंथ में बढ़ावे के पृष्ठभूमि में विश्व स्तरीय महत्व प्राप्त हुईl सय्यद अता हुसैन लिखते हैं: “एक ऐसे समय में कि जब मध्य पूर्व पर दुसरे महत्वपूर्ण खतरों के साथ बुनियाद परस्त इस्लाम का भी ख़तरा मंडला रहा है, इरान और सऊदी अरब के बीच सांप्रदायिक संघर्ष बढ़ रहे हैं; शाह अब्दुल्लाह ने बहुत शानदार सम्मलेन का आयोजन किया है जिससे इस्लामी उग्रवादी तत्व के माध्यम से उदारवादी इस्लामी मूल्यों के अपहरण की समस्या हल होगीl 2004 ई० में सभी फिरकों और वर्गों के उलेमा औ विचारकों पर आधारित उस सम्मलेन का निचोड़ अमान संदेश था जिस पर ना तो खातिर ख्वाह अंदाज़ में ना तो कुछ लिखा गया और ना ही कुछ कहा गयाl इस अद्भुत संदेश के संदर्भ में विभिन्न उप संदेशों में से एक यह भी था कि पुरी दुनिया के उलेमा ए इस्लाम का इस बात पर सहमति हुआ है कि ‘तकफीरियत’ के स्वयंभू दिनचर्या को जड़ से उखाड़ फेंका जाएl”

लेकिन भारतीय मुसलमान का संकट यह है कि हालांकि उनहें अनेकों कट्टरपंथ विरोधी सम्मेलनों से लोगों का ध्यान आकर्षित करने में सफलता मिली है, लेकिन वह अब तक तकफीरी सिद्धांत को परास्त करने में असफल रहे हैंl केवल आकर्षक आतंकवाद विरोधी फतवा जारी करने के बजाए, तकफीरी सिद्धांत के विरुद्ध उस युद्ध को जीतने का तरीका हमारे अमान के उलेमा से सीख सकते हैंl जॉर्डन की हाशमी साम्राज्य ने उदारवाद के आधारभूत इस्लामी सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए अमान में विधानसभा उदारवाद के लिए इस्लामी विचारों व संस्कृति का आयोजन कियाl तकफीरी सिद्धांत के खिलाफ अमान संदेश में शिरकत करने वाले भारत सहित विभिन्न देशों के चोटी के 200 इस्लामी उलेमा और मुस्लिम नेताओं का मानना है कि अगर भारत में अमान संदेश लागू किया जाता है तो इससे मुसलमान तकफीरी सिद्धांत और उसके परिणाम में साम्प्रदायिक मतभेद व फूट से निजात प्राप्त कर सकते हैंl

संभव है कि भारत में मुसलामानों को अतिवाद के खिलाफ भारत और जॉर्डन के इस साझा परियोजना से लाभ प्राप्त होl विज्ञान भवन में प्रधानमंत्री के संबोधन का एक नुमाया हिस्सा यह भी था कि “ मुस्लिम युवाओं के एक हाथ में कुरआन (परंपरा) और दुसरे हाथ में कंप्यूटर (आधुनिकता) होना चाहिए”l इसलिए, मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवी वर्ग में उनके इस महत्वपूर्ण बयान का स्वागत किया जा रहा हैl चेन्नई के इस्लामी फोरम बराए उदारवाद को बढ़ावा सिद्धांत का कहना हैl यह सम्मलेन उसी अकीदे की याद दिलाता हैl कुछ समय पहले ही प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारतीय मुसलमान बिलकुल ही कट्टरपंथ का शिकार नहीं हुए हैंl”

(न्यू एज इस्लाम)

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