छत्तीसगढ़ में कल पुलिस में प्रमोशन के लिए हो रही एक दौड़ में एक सिपाही की मौत हो गई। पिछले बरस भी ऐसा ही हुआ था। पचास बरस की उम्र में किसी सिपाही को हवलदार बनने के लिए अगर अपने फिटनेस की परीक्षा देनी हो, और उसके लिए दौड़ के नियम तय हों, तो हो सकता है कि हर कोई उसके लायक तैयार न हों, और ऐसा हादसा हो जाए। अब कल हुए इस हादसे के साथ एक दूसरी बात यह भी जुड़ी हुई है कि ऐसे शारीरिक परीक्षण के दौरान किसी डॉक्टर या इलाज का इंतजाम नहीं था। लेकिन इस छोटी जानकारी से परे यह समझने की जरूरत है कि पुलिस विभाग के छोटे कर्मचारी किस हाल में रहते हैं, और उनसे अचानक फिटनेस की ऐसी उम्मीद किस वजह से गलत है।

 जो लोग पुलिस के काम को रोजाना देखते हैं, वे जानते हैं कि छोटे कर्मचारियों का अधिकांश हिस्सा जेल से कोट-कचहरी, या थाने से अस्पताल, या एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर कैदी और फाईलों को लेकर आने-जाने का काम करते हैं। पुलिस की जांच में भी किसी तरह की दौड़-भाग की जरूरत नहीं पड़ती है। एक बहुत छोटा सा हिस्सा जो कि कानून-व्यवस्था बनाने में लगे रहता है, उसे ही सड़कों पर प्रदर्शन या भीड़भाड़ से निपटने के लिए ताकत और फिटनेस की जरूरत पड़ती है। नतीजा यह होता है कि इस विभाग के अधिकतर लोग प्रमोशन के वक्त किसी दौड़-भाग के लायक बचते भी नहीं है। फिर यह भी है कि बीस बरस की नौकरी में कभी ऐसी दौड़-भाग न करनी पड़े, और फिर एकाएक प्रमोशन के वक्त उनसे ऐसा करवाया जाए, तो उनकी सेहत के लिए खतरे की बात रहती ही है। पुलिस के छोटे कर्मचारियों की जिंदगी में शायद ही ऐसा समय निकलता हो कि वे कसरत करके तंदुरूस्त रह सकें क्योंकि उनकी ड्यूटी दिखाई कहीं भी जाए, उनमें से बहुत से लोग बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों के बंगलों पर चपरासियों की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं, और बच्चों से लेकर कुत्तों तक को घुमाने में काम लाए जाते हैं। ऐसा सब काम करते हुए, कपड़े धोते हुए, खाना पकाते हुए, या लॉन सींचते हुए, उनका मनोबल भी टूट चुका होता है, और उन्हें लगता है कि पुलिस का काम सेवा-चाकरी करना ही है।
हम विभागीय पदोन्नति के लिए बनाए गए पैमानों के खिलाफ नहीं हैं, वे तो होने ही चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ छोटे पुलिस कर्मचारियों की तकलीफों, काम के उनके बुरे हालात, और उनके मनोबल के बारे में भी सोचने की जरूरत है जिस पर देश में बहुत सी कमेटियों और आयोगों की रिपोर्ट पड़ी हुई हैं। लेकिन हम पुलिस के कामकाज के हालात सुधारने के लिए सरकार में एक ईमानदारी और गंभीरता को काफी मानते हैं। अगर सरकार यह तय कर ले कि किसी पुलिस कर्मचारी को मंत्रियों और अफसरों के बंगलों पर, और यहां तक कि रिटायर्ड अफसरों के घरों पर, काम पर नहीं लगाया जाएगा, पुलिस से पुलिस का काम ही करवाया जाएगा, तो भी जनता के पैसे की बर्बादी थमेगी, और पुलिस कर्मचारियों को अपने काम में गौरव भी हासिल हो सकेगा। दूसरी बात यह कि जिस तरह राज्य सरकार बाग-बगीचों में, और सड़कों के किनारे कसरत की मशीनें लगा रही है, हर थाने के अहाते में ऐसी मशीनें लगानी चाहिए जिसका इस्तेमाल पुलिस कर्मचारी भी कर सकें, और आसपास के लोग भी। इससे पुलिस की एक जनकल्याणकारी तस्वीर भी लोगों के मन में बनेगी, और पुलिस में भी अपनी सेहत ठीक रखने का उत्साह होगा।
लेकिन जब तक यह सब न हो जाए तब तक पुलिस की फिटनेस परीक्षा को अचानक ही कर्मचारियों पर लादने के बजाय हर बरस उनकी फिटनेस ठीक रखने का अभियान चलाना चाहिए, और इसे महज प्रमोशन का पैमाना बनाकर दस-बीस बरस की चर्बी के ऊपर एकदम से नहीं डालना चाहिए। यह एक छोटी सी बात लग रही है, लेकिन पुलिस के तन-मन को बचाने के लिए, बनाए रखने के लिए जरूरी बात भी है।

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