By | January 21, 2018

राजस्थान में राजपूत महिलाओं के एक संगठन ने धमकी दी है कि अगर देश में कहीं भी पद्मावती फिल्म रिलीज होती है, तो वे चित्तौडग़ढ़ के किले में जाकर जौहर का इतिहास दुहराएंगी। इतिहास या कहानी के मुताबिक इस किले में राजपूत महिलाओं ने आग में कूदकर जान दी थी, जिसे उस वक्त की प्रथा के मुताबिक जौहर कहा जाता है। अब देश के सुप्रीम कोर्ट ने इस फिल्म को पूरे देश में रिलीज होने देने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाली है, और कहा है कि कानून व्यवस्था को सम्हालना उनकी जिम्मेदारी है, और इस पर किसी भी तरह की रोक लगाने से इंकार कर दिया है। दूसरी तरफ राजस्थान में राजपूतों के एक संगठन ने कहा है कि इस फिल्म को इजाजत देने वाले सेंसर बोर्ड के चेयरमैन को जयपुर साहित्य महोत्सव में आने पर राजस्थान में ही घुसने नहीं दिया जाएगा। इधर छत्तीसगढ़ में भी एक राजपूत संगठन की यह चेतावनी सार्वजनिक रूप से सामने आई है कि अगर इस फिल्म को रिलीज किया जाता है तो सिनेमाघरों और मॉल में आग लगा दी जाएगी।

हमारा ख्याल है कि यह देश धर्म और जाति के नाम पर एक ऐसी कट्टरता की तरफ बढ़ रहा है जिस पर काबू पाने का हौसला अदालत के अलावा और किसी जिम्मेदार संवैधानिक संस्था में दिख नहीं रहा है। संसद देश के जलते-सुलगते मुद्दों को लेकर बेअसर हो गई है, और वहां पर सत्ता और विपक्ष की गिनती के बीच एक पंजा-कुश्ती सी चलती रहती है। टीवी चैनलों पर अलग-अलग पार्टियों और संगठनों के लोग कानून को चुनौती देते हुए देश में आग लगाने और फैलाने के बयान देते हैं, और उन पर उनसे जुड़े राजनीतिक दल भी कुछ नहीं कहते, उनसे जुड़े नेता भी कुछ नहीं कहते। इन सबके चलते हुए देश एक ऐसी कट्टरता में गहरे धंसते जा रहा है जो कि शायद उस इतिहास में भी न रही हो जिसके हकीकत होने का दावा करते हुए आज बहुत सी जातियों और बहुत से धर्मों के संगठन अपनी ठेकेदारी कायम करने में लगे हुए हैं।
आज देश में जो माहौल बन रहा है उसमें सुप्रीम कोर्ट को सीधे दखल देने की जरूरत है। लोगों को याद होगा कि उत्तरप्रदेश के एक बड़बोले समाजवादी पार्टी नेता आजम खान ने बलात्कार की शिकार एक महिला के बारे में गंदी जुबान से एक बयान दिया था, और इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें कटघरे में खड़ा करके उनके उगले गए हिंसक शब्द वापिस निगलने पर मजबूर किया था। आज प्रदेशों की सरकारें अगर अपने-अपने इलाकों में हिंसा के फतवे देने वाले लोगों पर कोई कार्रवाई करने की इच्छा ही नहीं रखती हैं, कोई कार्रवाई कर ही नहीं रही हैं, तो अब जिम्मेदारी केवल अदालत पर आ जाती है। हिंसा के फतवे जारी करने वाले लोगों को गिरफ्तार करने का आदेश सुप्रीम कोर्ट सीधे भी दे सकता है, और राज्य सरकारों को भी कटघरे में खड़ा कर सकता है कि ऐसे सार्वजनिक-हिंसक बयानों के बावजूद सरकार ने अपनी जिम्मेदारी पूरी क्यों नहीं की? वोटरों के तलुए सहलाने के फेर में सत्ता पर काबिज राजनीतिक पार्टियां कोई कड़ी कार्रवाई नहीं करती हैं। ऐसे में देश में कानून का राज कायम करवाने का जिम्मा अदालत का है, और चूंकि राज्यों के हाईकोर्ट भी ऐसे हिंसक फतवों पर कोई कार्रवाई नहीं करते हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर दखल देनी चाहिए, और आत्मदाह या जौहर सरीखे आत्मघाती फतवों पर भी कार्रवाई करनी चाहिए, और दूसरों के साथ हिंसा की धमकियों पर भी।
आज बहुत से बकवासी-ठेकेदारों को मीडिया में बने रहकर अपनी हस्ती बचाए रखने की बड़ी फिक्र रहती है, लेकिन वे ऐसा करके देश में हिंसा और नफरत का, अराजकता का एक ऐसा माहौल बनाते हैं जिसका इस्तेमाल दूसरे समुदायों के लोग भी करते हैं। इसलिए हमारा ख्याल है कि अदालत को ऐसे सिलसिले को खत्म करना चाहिए, ऐसी हिंसक बकवास करने वाले लोगों को सीधे कटघरे में खड़ा करना चाहिए, और सामाजिक अराजकता फैलाने के जुर्म में सीधे जेल में डालना चाहिए। यह एक तकलीफ की बात है कि हिन्दुस्तान कुछ बरस पहले एक बेहतर लोकतंत्र था, और उसमें इतने फतवों की जगह नहीं थी, लेकिन हाल के बरसों में इसमें अराजक और साम्प्रदायिक हिंसा का माहौल बढ़ गया है, जिसे तुरंत कुचलना चाहिए।

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