|
हिंदी उर्दू का अद्वैत
प्रो.महावीर शरन जैन
रोमानिया
की राजधानी
'बुकारेस्त' (रोमानियन
भाषा में उच्चारण 'बुकुरेश्ति',
भारत में अँगरेज़ी के अनुकरण पर 'बुखारेस्ट')
में अक्टूबर 1985 ई.
में हमने पाकिस्तानी राजदूतावास के प्रभारी राजदूत (शार्ज दै
अफ़ेअर्स) मिस्टर एस.वाई. नक्वी को बिदाई दी।वे प्रथम सचिव-स्तर
के राजनयिक थे। इसके थोड़े दिनों बाद ही बुकारेस्त में 'इण्डो-रोमानियन
ज्वाइंट कमीशन' की बैठक हुई जिसमें भाग
लेने के लिए भारत से मंत्री एवं अधिकारीगण आए। इस उपलक्ष्य में
भारत के तत्कालीन राजदूत श्री हरदेव भल्ला ने अपने आवास पर
स्वागत-समारोह का आयोजन किया तथा इसमें उन्होंने रोमानिया में
नवागत पाकिस्तानी राजदूत श्री रब्बानी को भी आमंत्रित किया।
भल्ला साहब ने मेरा एवं रब्बानी साहब का परिचय कराया। रब्बानी
साहब ने मुझसे कहा, ''प्रोफ़ेसर साहब!
आप बुकारेस्त यूनिवर्सिटी में हिन्दी के प्रोफ़ेसर हैं। हम भी
पाकिस्तान से उर्दू के प्रोफ़ेसर को यहाँ बुलाना चाहते हैं। इस
बारे में हमें तरक़ीब बताइएगा।''
मैंने उत्तर दिया,
''आप उर्दू के किसी प्रोफ़ेसर को बुलाना चाहते
हैं-यह मेरे लिए ख़ुशी की बात है, मगर
जब तक वे नहीं आते तब तक आप मुझे ही उर्दू का भी प्रोफ़ेसर मान
सकते हैं क्योंकि मैं हिन्दी एवं उर्दू को एक ही ज़बान मानता
हूँ।''
मेरी इस बात को सुनकर वे चौंक पड़े और
उन्होंने प्रतिवाद किया,
''ये आप क्या कह रहे हैं?
दोनों ज़बानें तो जुदा-जुदा हैं।''
मैंने कहा,
''ज़बानें जुदा-जुदा नहीं हैं,
हिन्दी-उर्दू एक ही ज़बान की दो स्टाइलें हैं।''
उन्होंने कहा,
''हरगिज़ नहीं, हम यह
नहीं मानते।''
मेरे मन में यह भाव आया कि मेरे द्वारा
राजनयिक वातावरण की औपचारिकताओं में विघ्न नहीं पड़ना चाहिए।
मैंने अत्यंत विनम्र स्वरों में उनसे निवेदन किया,
''बेहतर हो, हम लोग
अलग बैठकर आराम से इस मुद्दे पर बातचीत करें।''
मेरा यह प्रस्ताव उन्हें पसंद आया। हम
दोनों एक सोफे पर बैठ गए। मैंने वार्ता आरंभ की,
''हिन्दी मुसलमानों का दिया हुआ लफ़्ज है।''
इसको सुनकर उन्होंने कुछ ऐसा भाव प्रकट
किया,
जैसे मैं उनको बनाने का प्रयास कर रहा हूँ।
इसके पहले कि वे कुछ कह पाते, मैंने
गंभीर होकर कहा, ''देखिए आप एक देश के
एम्बेसेडर साहब हैं, हमारे मेहमान हैं।
मगर ज़रा आप यह भी सोचिए कि मैं भी एक प्रोफ़ेसर हूँ। मैं
एकेडेमिक बात कह रहा हूँ। किसी जज़बात में बहकर कोई बात नहीं कह
रहा हूँ। मेरा इस मुद्दे पर जो नज़रिया है,
मैंने जो पढ़ा-लिखा है,
सोचा है, उसे आपके सामने रखने की कोशिश
कर रहा हूँ।''
मेरी बात सुनने के बाद वे आराम से बैठ
गए। मैंने उन्हें विस्तारपूर्वक बतलाया कि ईरान की प्राचीन
भाषा अवेस्ता में
'स्'
ध्वनि नहीं बोली जाती थी। 'स्'
को 'ह्'
रूप में बोला जाता था। जैसे संस्कृत के
'असुर' शब्द को वहाँ
'अहुर' कहा
जाता था। अफ़ग़ानिस्तान के बाद सिन्धु नदी के इस पार
हिन्दुस्तान के पूरे इलाके को प्राचीन फ़ारसी साहित्य में भी
'हिन्द', 'हिन्दुश'
के नामों से पुकारा गया है तथा यहाँ की किसी
भी वस्तु, भाषा,
विचार को 'एडजेक्टिव'
के रूप में 'हिन्दीक'
कहा गया है जिसका मतलब है 'हिन्द
का'। यही 'हिन्दीक'
शब्द अरबी से होता हुआ ग्रीक में 'इंदिके',
'इंदिका', लैटिन में
'इंदिया' तथा
अँगरेज़ी में 'इंडिया'
बन गया। अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में हिन्दी
में बोली जाने वाली ज़बानों के लिए 'ज़बान-ए-हिन्दी',
लफ़्ज का प्रयोग हुआ है। भारत आने के बाद
मुसलमानों ने 'ज़बान-ए-हिन्दी',
'हिन्दी जुबान' अथवा
'हिन्दी' का
प्रयोग दिल्ली-आगरा के चारों ओर बोली जाने वाली भाषा के अर्थ
में किया। भारत के गैर-मुस्लिम लोग तो इस क्षेत्र में बोले
जाने वाले भाषा-रूप को 'भाखा'
नाम से पुकराते थे, 'हिन्दी'
नाम से नहीं। इसी कारण मैंने यह कहा था कि
'हिन्दी'
मुसलमानों का दिया हुआ
लफ़्ज है।
जिस समय मुसलमानों का यहाँ आना शुरु हुआ
उस समय भारत के इस हिस्से में साहित्य-रचना शौरसेनी अपभ्रंश
में होती थी। बाद में डिंगल साहित्य रचा गया। मुग़लों के काल
में अवधी तथा ब्रज में साहित्य लिखा गया। आधुनिक हिन्दी
साहित्य की जो जुबान है,
उस जुबान 'हिन्दवी'
को आधार बनाकर रचना करने वालों में सबसे पहले
रचनाकार का नाम अमीर खुसरो है जिनका समय 1253
ई. से 1325
ई. के बीच माना जाता
है। ये फ़ारसी के भी विद्वान थे तथा इन्होंने फ़ारसी में भी
रचनाएँ लिखीं मगर 'हिन्दवी'
में रचना करने
वाले ये प्रथम रचनाकार थे। यदि आपको यकीन न हो तो मैं इनकी
अनेक पहेलियाँ सुना सकता हूँ।
रब्बानी साहब कुछ नहीं बोले। मैंने
खुसरो की दो रचनाएँ सुनाईं-
(1)
क्या जानूँ वह कैसा है। जैसा देखा वैसा है।
(2)
एक नार ने अचरज किया। साँप मारि पिंजड़े में दिया।
रब्बानी साहब ने कहा कि इन्हें तो उर्दू
कहा जा सकता है। मैंने कहा कि नाम में क्या रखा है,
आप चाहे हिन्दी कहें,
हिन्दवी कहें, उर्दू कहें-एक ही तो बात
है। मगर अमीर खुसरो ने इसे 'हिन्दवी'
कहा है। एक जगह उन्होंने लिखा है जिसका भाव है
कि मैं हिन्दुस्तानी तुर्क हूँ,
हिन्दवी में जवाब देता हूँ। ( उनकी मूल पंक्ति इस प्रकार है :
'तुर्क हिन्तुस्तानियम हिन्दवी गोयम
जवाब')
उर्दू
इसके बाद हमारी बातचीत उर्दू के मतलब
तथा उसके जन्म की तरफ़ मुड़ी।
'उर्दू'
मूलत: तुर्की लफ़्ज है जिसके मायने होते हैं :
छावनी, लश्कर। 'मुअल्ला'
अरबी लफ़्ज है जिसके मायने हाते हैं : सबसे
बढ़िया। शाही पड़ाव, शाही छावनी,
शाही लश्कर के लिए पहले 'उर्दू-ए-मुअल्ला'
शब्द का प्रयोग आरम्भ हुआ। बाद में बादशाही
सेना के पड़ावों, छावनियों तथा बाज़ारों
(लश्कर बाज़ारों) में हिन्दवी अथवा देहलवी का जो भाषा रूप बोला
जाता था उसे 'ज़बाने-उर्दू-ए-मुअल्ला'
कहा जाने लगा। बाद को जब यह जुबान फैली तो
'मुअल्ला' शब्द
हट गया तथा 'ज़बाने उर्दू'
रह गया। 'ज़बाने उर्दू'
के मतलब 'उर्दू की
जुबान' या अँगरेज़ी में 'लैंग्वेज
ऑफ उर्दू'। बाद को इसी का संक्षेप में
'उर्दू'
कहा जाने लगा।
उर्दू में साहित्य-रचना बाद में आरम्भ
हुई। उर्दू-साहित्य के इतिहासकार वली औरंगाबादी (रचनाकाल
1700 ई. के बाद) को
उर्दू का प्रथम शायर मानते हैं। आधुनिक साहित्यिक हिन्दी का
इतिहास लिखने वाले इनको खड़ी बोली की 'दक्खिनी
हिन्दी' का एक कवि मानते हैं। शाहजहाँ
ने अपनी राजधानी, आगरा के स्थान पर,
दिल्ली बनाई और अपने नाम पर सन् 1648
ई. में 'शाहजहाँनाबाद'
आबाद किया, लालकिला
बनाया। ऐसा मालूम होता है कि इसके बाद से राजदरबारों में फ़ारसी
के साथ-साथ 'जबाने-उर्दू-ए-मुअल्ला'
में भी रचनाएँ
होने लगीं। यह प्रमाण मिलता है कि शाहजहाँ के समय में पंडित
चन्द्रभान बिरहमन ने बाज़ारों में बोली जाने वाली जनभाषा को
आधार बनाकर फ़ारसी शैली में रचनाएँ कीं। ये फ़ारसी लिपि जानते
थे। अपनी रचनाओं को इन्होंने फ़ारसी लिपि में लिखा। धीरे-धीरे
दिल्ली के शाहजहाँनाबाद की उर्दू-ए-मुअल्ला का महत्व बढ़ने लगा।
उर्दू के शायर मीर साहब (1712-181.
ई.) ने एक जगह लिखा है-
''दर
फ़ने रेख़ता कि शेरस्त बतौर शेर फ़ारसी ब ज़बाने
उर्दू-ए-मोअल्ला शाहजहाँनाबाद देहली।''
ज़बान तथा स्क्रिप्ट
रब्बानी साहब ने कहा कि कम-से-कम
''स्क्रिप्ट''
का अन्तर तो आप भी मानते हैं। मैंने कहा कि
स्क्रिप्ट (लिपि) का भेद रहा है क्योंकि बादशाही दरबारों की
भाषा फ़ारसी थी तथा लिपि भी फ़ारसी थी। उन्होंने अपनी रचनाओं को
जनता तक पहुँचाने के लिए भाषा तो जनता की अपना ली,
मगर उन्हें
फ़ारसी लिपि में लिखते रहे।
मगर ज़बान (भाषा) अलग चीज़ है,
स्क्रिप्ट (लिपि) अलग चीज। ज़बान है जो बोली
जाती है, लिपि है जिसमें उसे लिखा जाता
है। एक ज़बान को एक से अधिक लिपियों में लिखा जा सकता है तथा एक
ही स्क्रिप्ट (लिपि) में एक से अधिक ज़बानें लिखी जा सकती हैं।
रोमन लिपि में यूरोप की कितनी भाषाएँ लिखी जाती हैं। रोमन
स्क्रिप्ट तो एक ही है उसी एक स्क्रिप्ट में कितनी भाषाएँ लिखी
जाती हैं। हिन्दी के बहुत से कवियों ने अपनी रचनाएँ फ़ारसी लिपि
में लिखीं मगर उनकी रचनाएँ फ़ारसी भाषा की नहीं,
हिन्दी की हैं। सन् 1928
ई. में जब तुर्कों ने अरबी के स्थान पर रोमन
स्क्रिप्ट में लिखना स्वीकार किया, तो
उनकी ज़बान नहीं बदल गयी,
तब भी वे उसी प्रकार बोलते रहे जैसे
पहले बोला करते थे।
इसके बाद मैंने यह स्पष्ट किया कि
18वीं सदी के अन्त तक
हिन्दी, हिन्दवी,
उर्दू, रेखता,
देहलवी, हिन्दुस्तानी,
आदि शब्दों का ''सिनानिम''
(समानार्थी) रूप में प्रयोग होता रहा। मैं
आपको उदाहरण दे सकता हूँ जिससे यह बात साफ़ हो जाएगी। नासिख,
सौदा, मीर तथा आतिश ने
अपने शेरों को एकाधिक बार हिन्दी शेर कहा है तथा ग़ालिब ने अपने
ख़तों में हिन्दी, उर्दू,
तथा रेखता का कई जगहों
पर सिनानिम (समानार्थी) रूप में प्रयोग किया है।
अँगरेज़ तथा हिन्दी और उर्दू का अलगाव
रब्बानी साहब ने जानना चाहा कि जो कुछ
मैंने कहा है वह यदि सही है तो फिर हिन्दी एवं उर्दू को
अलग-अलग जुबान क्यों माना जाने लगा।
इसके लिए मैंने अँगरेज़ों की हिन्दुओं
एवं मुसलमानों में
'फूट डालो और राज्य करो'
वाली नीति का
ब्यौरा दिया । इस बारे में उन्होंने अपनी रज़ामंदी प्रकट की।
इसके बाद काम आसान हो गया। मैंने कहा जैसे पॉलिटिक्स की अलग
तरह की ज़बान होती है उसी प्रकार ज़बान की पालिटिक्स भी होती है
जिसे अँगरेज़ी में
Glottopolitics
कहते हैं। अँगरेज़ों ने कलकत्ता में
फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। इसका उद्देश्य भारत में आने
वाले अँगरेज़ कर्मचारियों को देशी भाषाओं का ज्ञान कराना
प्रतिपादित किया गया। उद्देश्य तो बहुत अच्छा था। मेरा सवाल है
कि
19वीं सदी में ईसाई
मिशनरियों ने उत्तर भारत में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के
लिए बाइबिल के अनुवादों में जिस सरल एवं जनसुलभ भाषा-रूप को
अपनाया, फोर्ट विलियम कॉलेज में
अँगरेज़ कर्मचारियों को सिखाने के लिए उस भाषा-रूप में
भाषा-पाठय सामग्री का निर्माण क्यों नहीं किया गया। फोर्ट
विलियम के डाइरेक्टर गिलक्राइस्ट ने लल्लूलाल को 'प्रेमसागर'
के लिखते समय 'यामनी
(मुसलमानी) भाषा छोड़ दिल्ली आगरे की खड़ी बोली में कह'
की हिदायत क्यों दी। उन्होंने सदल मिश्र से यह
क्यों ठहराया और उन्हें यह आज्ञा क्यों दी कि वे
अध्यात्म-रामायण की रचना ऐसी बोली में करें जिसमें अरबी-फ़ारसी
के शब्द न आने पावें। सबसे पहले गिलक्राइस्ट ने 'हिन्दी'
तथा 'उर्दू'
का भेद नहीं किया। सन् 18.4
ई. में उन्होंने 'हिन्दुस्तानी'
एवं 'खरी बोली'
का अंतर बतलाते हुए कहा कि खरी बोली में किसी
भी अरबी एवं फ़ारसी शब्द का प्रयोग नहीं होता। जनता तो
अरबी-फ़ारसी शब्दों का प्रयोग अँगरेज़ों के आने के पहले भी
करती थी उनके ज़माने में भी करती थी और आज भी करती है। मगर
गिलग्राइस्ट के सिर पर तो भाषा के शुद्धिकरण की चिन्ता सवार
थी। वे खरी, शुद्ध,
बिना मिलावट की, खालिस
तथा विशुध्द भाषा का निर्माण कराने में लग गये। 1804
ई. में जो अंतर 'हिंदुस्तानी'
एवं 'खरी बोली'
में प्रतिपादित किया गया था उसे सन्
1812 ई. में 'हिन्दुस्तानी
- रेख्ता' एव 'हिन्दी'
का भेद बतलाया गया। सन् 1812
ई. मे फोर्ट विलियम कॉलेज के वार्षिक विवरण में कैप्टन टेलर ने
यह भेद बतलाते हुए कहा,
''मैं केवल
हिन्दुस्तानी या रेख्ता का जिक्र कर रहा हूँ जो फ़ारसी लिपि में
लिखी जाती है। मैं हिन्दी का जिक्र नहीं कर रहा हूँ जिसकी अपनी
लिपि है तथा जिसमें अरबी-फ़ारसी शब्दों का प्रयोग नहीं होता।''
पृष्ठ
1
-
2 -
3
आगे पढ़ें..
|