 |
एक शब्द
पेट
डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया
पेट
को लेकर कहावतों-मुहावरों की भरमार है। पेट एक अर्थ अनेक । कोई
नया शब्द पेट से जुड़ा और अर्थ बदला। पेट को लेकर आदमी वैसे भी
अनेक रंग बदलता है। भरे पेट और ख़ाली पेट के चरित्र अलग हैं।
भरा पेट मौजमस्ती पसन्द करता है जबकि ख़ाली पेट कितनी ही
यातनायें झेलता है। भरा पेट स्वामी है और ख़ाली पेट सेवक । पेट
बड़ा विचित्र है। कभी फूलता है, कभी ऐंठता है, कभी बिगड़ता है
तो हालत ख़राब कर देता है। पेट की हालत ही पतली नहीं होती, पेट
वाले की दशा भी पतली हो जाती है।
जिस पेट में विकार है वही ख़राब होता है। उस समय कुछ पचता
नहीं। पाचन शक्ति जिनकी ख़राब होती है वे कभी शरीरिक, मानसिक व
आर्थिक रूप से स्वस्थ नहीं रहते । कई लोग इतने हलक़े और उतावले
होते हैं कि उनके पेट में अनाज भले पच जाए, पर कोई बात नहीं
पचती । पेट में बात बचना गुण और न पचना दुर्गुण है। वैसे बात
भले न पचे पर अब कई लोगों के पेट इतने बड़े और शक्तिशाली हो गए
हैं कि वे सड़क, तालाब, चारा, खाद, रेल के इंजिन, टेलिफ़ोन के
यंत्र यहाँ तक कि चारा तक पचा जाते हैं । उनका वश चले तो वे
पूरे देश को खाकर हजम कर जायें। ऐसे पेट बड़े कमाल के होते
हैं। ऐसे लोगों को बड़े पेट वाला कहा जाता है। इनके पेट से कोई
बात या चीज़ बाहर नहीं निकाली जा सकती । बड़े गजब के पेट होते
हैं। पेट काटा जाता है। पेट मारा जाता है। पेट चीखता है।
सामान्य आदमी का पेट उखड़ता है, चढ़ता है, गुड़गुड़ाता है।
ख़ाली पेट ज़्यादा गुड़गुड़ाता है। कई लोग पेट की चिन्ता में
ही परेशान रहते हैं। पेट के लिए जाने क्या-क्या कर्म करने के
लिए विवश होते हैं और बड़े दुख से कहते हैं
‘पापी
पेट जो न कराये सो थोड़ा है।’
ग़रीब लोग अपना पेट काटकर बच्चे पढ़ाते हैं, बच्चों का पेट
मारकर जीवन-यापन करते हैं और बड़े लोग ग़रीबों का पेट काटते
है। उनका पेट मारकर अपने भरे पेट को और भी ठूँस-ठूँसकर भरते
हैं। ग़रीब आदमी ख़ाली पेट भूख से कराहता है और बड़े आदमी
ज़्यादा पेट भर जाने से कराहते हैं। ग़रीब ख़ाली पेट की दवा
ढूँढता है और सम्पन्न व्यक्ति भरे पेट की दवा तलाशता है। भरे
पेट की चोचलें होती हैं और ख़ाली पेट की चीत्कारें । भरा पेट
गाने-बजाने, खाने-पीने में मस्त रहता है, ख़ाली पेट को इसके
लिए फ़ुर्सत कहाँ ?
आज कल कई बातें सुनने में आती हैं- कोई पेट से होता है, कोई
पेट गिराता है, कोई पेट साफ़ कराता है। वैसे पेट से होना शुभ
लक्षण है, पर जब अमर्यादित या अवांछित ढंग से कोई पेट से होता
है तो लोकलाज बचाने के लिए लोग पेट गिरा देते हैं। पेट गिराना
क़ानूनन अपराध है। ऐसी घटनायें किसी के लिए दुखद और किसी के
लिए सुखद भी होती है। वैसे जनसंख्या-वृद्धि से भयभीत होकर भी
कई लोग पेट साफ़ करवा लेते हैं। यह सब कार्य महिलाओं के पक्ष
के हैं। करता कोई है और भोगता कोई है। शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान
के बढ़ने और देश की स्वतंत्रता के बावजूद महिलायें आज भी पेट
छिपाती है। पेट खोलना यानी रहस्य खोलना। इसे लोग अच्छा नहीं
मानते । वैसे दाई से पेट छिपाना बड़ा कठिन होता है। चतुर लोग
पेट की बात निकाल ही लेते हैं।
कई लोगों के पेट का पानी नहीं डोलता क्योंकि वे कोई परिश्रम ही
नहीं करते और कई लोगों के पेट की आग कभी बुझती ही नहीं ।
हाय-हाय और असंतोष बना ही रहता है। उनका पेट कुआँ बन जाता है
जो कभी भरता ही नहीं। कुछ लोगों के ख़ाली पेट में चूहे कूदते
रहते हैं और कुछ लोगों के पेट में प्रसन्नता से हँसते-हँसते बल
पड़ जाते हैं। जिनके पेट में बल पड़ते हैं वे भाग्यवान होते
हैं। पेट मरोड़ना भी दो प्रकार से होता है- एक तो पेट ख़राब
होने पर, कब्ज या गैस होने पर और दूसरा ईर्ष्यालु लोगों का पेट
दूसरों की सुख-समृद्धि देखकर भी मरोड़ता है। किसी रहस्य को न
पचा पाने के कारण भी कुछ लोगों का पेट खलभलाता रहता है। पेट
में कीड़ा पड़ना भी कष्ट का काम है। कुछ कीड़े दवा से मारे
जाता हैं, परन्तु जिनके पेट में विकृति औक कुविचार के कीड़े
होते हैं वे कभी मरते नहीं, परेशान ही करते रहते हैं। ईष्यालु
लोगों के पेट में साँप लोटने लगते हैं। उनका पेट खौलता रहता
है। कुछ लोग के पेट में दाँत होते हैं। वे बोलते मधुर हैं पर
आचरण दुर्भावनापूर्ण होता है। कथनी-करनी में भेद होता है। ऐसे
लोगों को कहते हैं कि इनके पेट में दाँत हैं । इसी प्रकार जब
कोई छोटा लड़का बड़ों को छकाने या मूर्ख बनाने की चेष्टा करता
है तो लोग कहते हैं-मेरे पेट का लड़का मुझी से अउकी-बउकी करता
है। कई बार पेट को पकड़ कर रह जाना पड़ता है यह कभी दर्द के
कारण
होता है और कभी अधिक हँसी के कारण। हँसी-खुशी स्वाभाविक होती
है, पेट में गुदगुदी करके दुखी व्यक्ति को प्रसन्न नहीं किया
जा सकता। ईर्ष्या के कारण भी कुछ लोगों के पेट में दर्द होने
लगता है। कुछ लोग मजबूरी में अभावग्रस्त दशा में यहाँ-वहाँ पेट
दिखाकर भीख भी माँगते हैं। कुछ लोग इतने जर्जर और दुर्बल होते
हैं कि उनके पेट और पीछ एक हो जाते हैं। निराला ने भिक्षुक का
चित्रण इसी प्रकार किया है।
इस प्रकार इस पेट के रंग निराले है, पर पेट से किसी का पिंड
नहीं छूटता ।
डॉ. गंगाप्रसाद
बरसैया
के 30 आपीआईए
रोड
नं. 1,
कोटा (राज.) -
5

◙◙◙
|