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गाकर ही
तुम शिव बन सकोगे
क्या करूँगा में
सतही मुस्कान लेकर ?
व्यर्थ की छलनाओं तुम मत सताओ
गीत हूँ मैं शांति का,
संवेदना का
मेरी साँसों को ज़रा अमृत
पिलाओ
क्या करूँगा मैं
नये परिधान लेकर ?
मेरी ख़ुशबु को
ज़रा मन में बसाओ !
यदि मुझे तुम साथ लेकर चल सके
तो
मैं तुम्हें वरदान दूँगा,
दृष्टि में विश्वास दूँगा
तुम अकेले ही समर में लड़
सकोगे
मैं तुम्हें हिमगिरि सदृश
अहसास दूँगा
क्या करूँगा मैं
महज सम्मान लेकर ?
मेरी सरित को ज़रा
उर में समाओ !
है भरा संसार सारा विषधरों से
गीत को गाकर ही तुम शिव बन
सकोगे
कामनाओं के असीमित जंगलों में
तुम अहम् से मुक्त होकर रह
सकोगे
क्या करूँगा मैं निरा अभिमान
लेकर
प्रेम की सरिता
मेरी जग में बहाओ !
डॉ.
हरिप्रकाश जैन 'हरि'
प्रतीक, श्रीराम कॉलोनी,
शिवपुरी, मध्यप्रदेश -
473551
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