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सृजनगाथा
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वर्ष-3, अंक-29, अक्टूबर, 2008
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।। गीत ।।
चूल्हा-चक्की फाँके मारें
पहुँच न पाई
पीहर की पाती
कर्ज़े ने घर झाड़ा-पोंछा
न्यौता देती फिरे बेबसी
ढोलक लेकर खड़ी ग़रीबी
आतिशबाज़ी अग्नि पेट की ।
पीड़ा दुल्हन
अश्क घराती
मेढ़ खेत की भरे उबासी
सेंदुर भरी उमर है गिरवी
ताने मारे बाँह पिया की ।
रात-रात भर
नींद न आती
भरी माँग आरी-सी छीलें
पैर डसे चाँदी बिछिया की
बरस अठारह बनी अटारी
मंगल-सूत्र लगाये फाँसी
ससुर आग-सा
सास कुआँ-सी ।
गोपालकृष्ण सक्सेना 'पंकज'
254, मोती निधि कॉम्प्लेक्स
छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश - 480000
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छांदस रचनाएँ
माह का छंदकार
डॉ. हरिप्रकाशजैन 'हरि' - गीतकार
... गाकर ही तुम शिव बन सकोगे
... बस कुछ न बोलना
... अनबूछे प्रश्न लिये
... शुभकामना के पंख
... अलस भरी पलक लिये
गीत
योगेन्द्रनाथ शर्मा
डॉ. बृजेन्द्र वैद्य
दिनेश प्रभात
ग़ज़ल
बेकल उत्साही
बलबीर राठी
चाँद 'शेरी'
ज़ाफ़र रज़ा
हरिप्रकाश वत्स
दोहे
[डॉ. विनय कुमार मिश्र
मुक्तक
चंदसेन विराट
प्रवासी ग़ज़लकार
श्रद्धा जैन, सिंगापुर
अजय गाथा
हर दिन
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