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सृजनगाथा
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वर्ष-3, अंक-29, अक्टूबर, 2008
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।। गीत ।।
हम जंगल पलाश हैं
मुद्दत हुई है
लोग रहते उदास हैं
बहती हवा में जैसे बहते कपास हैं ।
अहसास इस तरह भी
होने लगा है आज
ज़िंदे नहीं लेकिन ज़िंदे की लाश हैं ।
शाहिल पे बैठते हैं
कुछ नामुराद लोग
हमसे न पूछिये हम जंगल पलाश हैं ।
ख़ूनके जो क़तरे
आतंक बो रहे हैं
एक रूब के जने हैं एक अमलतास हैं ।
बाँटों हमें हुज़ूर न
किसी और नाम से
हम आदमी है आदमी के आसपास हैं । एक रू
डॉ. बृजेन्द्र वैद्य
आकाशवाणी, रायपुर
छत्तीसगढ़
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छांदस रचनाएँ
माह का छंदकार
डॉ. हरिप्रकाशजैन 'हरि' - गीतकार
... गाकर ही तुम शिव बन सकोगे
... बस कुछ न बोलना
... अनबूछे प्रश्न लिये
... शुभकामना के पंख
... अलस भरी पलक लिये
गीत
योगेन्द्रनाथ शर्मा
गोपालकृष्ण सक्सेना 'पंकज'
दिनेश प्रभात
ग़ज़ल
बेकल उत्साही
बलबीर राठी
चाँद 'शेरी'
ज़ाफ़र रज़ा
हरिप्रकाश वत्स
दोहे
[डॉ. विनय कुमार मिश्र
मुक्तक
चंदसेन विराट
प्रवासी ग़ज़लकार
श्रद्धा जैन, सिंगापुर
अजय गाथा
हर दिन
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