vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-29, अक्टूबर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। गीत ।।

 

 

हम जंगल पलाश हैं

 

मुद्दत हुई है

लोग रहते उदास हैं

बहती हवा में जैसे बहते कपास हैं ।

 

अहसास इस तरह भी

होने लगा है आज

ज़िंदे नहीं लेकिन ज़िंदे की लाश हैं ।

 

शाहिल पे बैठते हैं

कुछ नामुराद लोग

हमसे न पूछिये हम जंगल पलाश हैं ।

 

ख़ूनके जो क़तरे

आतंक बो रहे हैं

एक रूब के जने हैं एक अमलतास हैं ।

 

बाँटों हमें हुज़ूर न

किसी और नाम से

हम आदमी है आदमी के आसपास हैं । एक रू

डॉ. बृजेन्द्र वैद्य 

आकाशवाणी, रायपुर

छत्तीसगढ़

◙◙◙

 

छांदस रचनाएँ

माह का छंदकार

डॉ. हरिप्रकाशजैन 'हरि' - गीतकार

... गाकर ही तुम शिव बन सकोगे

... बस कुछ न बोलना

... अनबूछे प्रश्न लिये

... शुभकामना के पंख

... अलस भरी पलक लिये

गीत

योगेन्द्रनाथ शर्मा

गोपालकृष्ण सक्सेना 'पंकज'

डॉ. बृजेन्द्र वैद्य

दिनेश प्रभात

 ग़ज़ल

बेकल उत्साही

बलबीर राठी

चाँद 'शेरी'

ज़ाफ़र रज़ा 

हरिप्रकाश वत्स

दोहे

[डॉ. विनय कुमार मिश्र

मुक्तक

चंदसेन विराट

 प्रवासी ग़ज़लकार

श्रद्धा जैन, सिंगापुर

 अजय गाथा

हर दिन

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google