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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-29, अक्टूबर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

हमें बताओ बादल

 

पहले हमें बताओ बादल, छुट्टी कहाँ बिताकर आये

 

सुर्ख टमाटर से लगते हो, लगता है कश्मीर गये थे ।

पहले भी लौटे हो तुम पर कभी न ऐसे नये-नये थे

ऐसी भरी-भरी काठी पर, कैसे नहीं नदी ललचाये !

 

कुछ रातें तो तुमने निश्चित, शिमला में भी काटी होंगी

जिस जंगल से गुज़रे होगे, हरी-हरी हर घाटी होंगी

सारे मज़े लूट लेते हो, अक्सर ही तुम बिना बताये !

 

जाएँ और मनाली छूटे, ऐसा भला कहाँ होता है

तुम जैसा घूमंतु प्राणी, क्या ऐसा मौक़ा खोता है

बोलो वहाँ नये चेहरों से, तुमने कितने लैन लड़ाये !

 

निकले थे जब उधऱ भ्रमण को, कुल्लू भी तो था रस्ते में

कम पैसे में इतनी ठंडक, तुम तो निपट गये सस्ते में

तुमसे ख़ुब हवाएँ लिपटीं, हम लपटों में ख़ूब नहाये !

 

पिछले साल बहुत दुबली थी, आज घटा की देह गठीली

साथ तुम्हारा पाया जबसे, ये भी कुछ हो गयी हठीली

अब इसका कुछ नहीं भरोसा, कब सावन में आग लगाये !

 

गिने-चुने दिन, ड्यूटी करते, पूरे साल मनाते छुट्टी

पिला रखी अपने अफ़सर को, तुमने भला कौन-सी घुट्टी

मेडम झील अकेली हर दिन, दफ़्तर में फ़ाइल निपटाये !

दिनेश प्रभात

56, सम्राट नगर, अशोका गार्डन,

भोपाल मध्यप्रदेश - 462023

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