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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-29, अक्टूबर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

अपने ही घर की बात

 

हमने छुपा के रखी थी सबसे जिगर की बात
सुनते हैं फिर भी गैरों से, अपने ही घर की बात 

छोटी-सी बात से ही तो बुनियाद हिल गयी 
मज़बूत हैं कहते रहे, दीवार ओ दर की बात

बनना सफ़ेदपोश तो कालिख लगाना सीख 
उंगली उठाना बन गया अब तो हुनर की बात 

बातें फक़त बनाने में न जाए ये उमर 
लाओ अगर अमल में तो होगी असर की बात 

जज़्बात दिल के मैंने, जो बेबाक लिख दिए 
कुछ लोग कहे रहे हैं के होगी कहर की बात 

वादे के इंतेज़ार में, जब रात ढल गयी 
महफ़िल में तब से हो रही अश्क़ भर की बात 

जब भी मिली है मंज़िल, रस्ता बदल लिया 
हमको तो शौक़ श्रद्धा करते सफ़र की बात

श्रद्धा जैन

सिंगापुर

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