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सृजनगाथा
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वर्ष-3, अंक-29, अक्टूबर, 2008
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।। गीत ।।
अपने ही घर की बात
हमने छुपा के रखी थी सबसे जिगर की बात सुनते हैं फिर भी गैरों से, अपने ही घर की बात छोटी-सी बात से ही तो बुनियाद हिल गयी मज़बूत हैं कहते रहे, दीवार ओ दर की बात बनना सफ़ेदपोश तो कालिख लगाना सीख उंगली उठाना बन गया अब तो हुनर की बात बातें फक़त बनाने में न जाए ये उमर लाओ अगर अमल में तो होगी असर की बात जज़्बात दिल के मैंने, जो बेबाक लिख दिए कुछ लोग कहे रहे हैं के होगी कहर की बात वादे के इंतेज़ार में, जब रात ढल गयी महफ़िल में तब से हो रही अश्क़ भर की बात जब भी मिली है मंज़िल, रस्ता बदल लिया हमको तो शौक़ “श्रद्धा” करते सफ़र की बात
श्रद्धा जैन
सिंगापुर
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छांदस रचनाएँ
माह का छंदकार
डॉ. हरिप्रकाशजैन 'हरि' - गीतकार
... गाकर ही तुम शिव बन सकोगे
... बस कुछ न बोलना
... अनबूछे प्रश्न लिये
... शुभकामना के पंख
... अलस भरी पलक लिये
गीत
योगेन्द्रनाथ शर्मा
गोपालकृष्ण सक्सेना 'पंकज'
डॉ. बृजेन्द्र वैद्य
दिनेश प्रभात
ग़ज़ल
बेकल उत्साही
बलबीर राठी
चाँद 'शेरी'
ज़ाफ़र रज़ा
हरिप्रकाश वत्स
दोहे
[डॉ. विनय कुमार मिश्र
मुक्तक
चंदसेन विराट
प्रवासी ग़ज़लकार
श्रद्धा जैन, सिंगापुर
अजय गाथा
हर दिन
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