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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-29, अक्टूबर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। भाषांतर ।।

 

 पंजाबी उपन्यास(धारावाहिक-11)

रेत


हरजीत अटवाल

अनुवादः सुभाष नीरव

 

आपने अब तक पढ़ा - भाग एक / भाग दो / तीन / चार/पाँच/छः/सात/आठ/नौ/दस ) अब आगे पढ़िए-संपादक

 

समय थोड़ा कुछ और आगे सरका तो बिन्नी के विवाह के बारे में सब सोचने लगे। डैडी चाहते थे कि बिन्नी का विवाह जल्दी हो जाये। मुझे हालांकि वह अभी छोकरा-सा ही लगता था, बच्चे-सा। मम्मी कहती, बाप की बीमारी और बहन के दु:ख ने मेरे बेटे को जल्दी बड़ा कर दिया। मम्मी की यह बात मुझे अच्छी न लगती।

 

हम इंडिया गये तो कितने ही रिश्तों वाले हमारे आगे-पीछे घूमते थे। लेकिन, डैडी की अस्थियाँ लेकर गये थे इसलिए हमने किसी से बात नहीं की। लड़की वाले भी समझते थे। हम बिन्नी से विवाह के बारे में पूछते कि उसे कैसी लड़की चाहिए थी इंडिया से हो या यहाँ की। प्रत्युत्तर में वह मुस्करा देता। कभी भी अधिक जवाब न देता। वह दूसरे लड़कों से कुछ हट कर था। वह पबों-क्लबों में भी अधिक न जाता। फुटबाल और फिल्मों का ही उसे शौक था। टेली और वीडियो उसके अपने कमरे में ही रखे हुए थे।

 

घर में तीन बैडरूम थे। एक बिन्नी के पास, एक हमारे पास और छोटा बॉक्स रूम मम्मी के पास। हमारा कमरा हमारे सामान से भरा पड़ा था। परी के पढ़ने का सामान ही जगह-जगह बिखरा पड़ा था। बिन्नी के कमरे में मैं कम ही जाती थी, मम्मी ही सफाई करती। लेकिन, जब कभी जाती तो देखती कि बिन्नी का कमरा भी बिन्नी के लिए छोटा था। नीचे वाले दोनों कमरे तो बैठक के रूप में ही इस्तेमाल किये जाते। मैं सोचने लगती कि बिन्नी का विवाह हो गया तो हम कैसे गुजारा करेंगे।

 

बिन्नी के विवाह के बारे में सोचते ही मुझे ख़याल आया कि मुझे इस घर में रहते बहुत समय हो चुका था। अब मुझे अपनी जगह चाहिए थी। अपना घर हो अथवा फ्लैट ही। जहाँ पर परी का अपना अलग कमरा हो। इसे आगे चलकर पूरे कमरे की ज़रूरत पड़ने वाली थी। मेरे मन में अपना घर खरीदने का ख़याल घूमने लगा। आर्च-वे वाला घर बिका तो उसमें से जितने पैसे निकले थे, वे सब मेरे पास जमा पड़े थे, परी के नाम पर। उसके बाद, मैंने जोड़े भी थे। घर में मेरा खर्च ही था या फिर मेरी कार का। कार मैं ज्यादा इस्तेमाल नहीं करती थी। कार शुरू से ही नई रखा करती थी। किस्तों पर ले लिया करती। किस्तें पूरी होतीं, तो उसे बेचकर दूसरी ले लेती।

 

बिन्नी सयानी बातें किया करता। दूसरे लड़कों वाले ऐब नहीं थे उसमें। घर की चिंता भी करता था। अधिक पढ़ न सकने के कारण उसको कोई ढंग का काम भी नहीं मिलता था। कभी कुछ महीने हीथ्रो एअरपोर्ट पर लगाता। फिर, दूर होने के कारण छोड़ देता। कभी किसी पेट्रोल पम्प पर जा लगता। कभी किसी फर्म की वैन चलाने लग पड़ता। मम्मी, उसके न पढ़ सकने के लिए डैडी की बीमारी को ही कसूरवार समझती। दबी जुबान में मेरा नाम भी ले लेती। एक दिन, मैंने मम्मी से कहा, मम्मी, मैं घर लेना चाहती हूँ।

क्यों ?

बिन्नी का विवाह करेंगे, बच्चे होंगे।

देख ले भाई।

मैं बिन्नी से कहने लगी, बिन्नी, आज काम पर से लौटते हुए एस्टेट एजेंट के पास होकर आना।

क्यों ?

मैं सोचती हूँ कि घर ले लूँ।

यह घर नहीं ?

है तो यह भी घर ही, पर तेरे विवाह के बाद छोटा पड़ जाएगा।

हम इसे बेचकर बड़ा ले लेंगे। तू फिक्र क्यों करती है ?

मुझे फिक्र तो यह है कि तेरी वाइफ आएगी, फैमिली बढ़ेगी।

जितनी फैमिली बढ़ेगी, उतना ही बड़ा घर लेते जाएँगे, पर रहेंगे इकट्ठे।

मैं उसकी बात पर हँसी और कहा, तेरी वाइफ क्या कहेगी ?

मैं उसको सब कुछ क्लियर कर दूँगा, अगर फिर भी कुछ कहेगी तो अपनी राह जाएगी।

तू मेरी खातिर घर में प्रॉब्लम खड़ी करेगा ?

सो व्हट !

अब तू बड़ा हो गया है, तुझे और तेरी वाइफ को प्राइवेसी की ज़रूरत पड़ेगी। और फिर, परी भी बड़ी हो रही है, इसे भी अपना रूम चाहिए, इसकी आगे की पढ़ाई भी सख्त होती जाएगी।

 

बिन्नी कुछ न बोला। उसने मुँह फुला लिया। उसे मेरी बातें अच्छी नहीं लगी थी।

मैंने परी के साथ घर खरीदने की बात की तो वह खुश-सी हो गयी। वह बोली, एक कमरे में मैं कम्प्यूटर रखूँगी, गेम्स और किताबें रखूँगी, एक में खिलौने और एक में मैं सोया करुँगी।

सोएगी तू मेरे साथ ही।

तुम तो कहती हो, मैं टांगें बहुत मारती हूँ।

कोई बात नहीं, है तो तू मेरी बेबी ही। कहकर मैंने उसे अपनी छाती से लगा लिया।

मैं घर की बात करके चुप हो गयी। कई दिन तक कोई बात नहीं की। परी मुझसे आये दिन पूछने लगी, मम्मी, अपने घर कब जाएँगे।

बिन्नी ने मुझे घरों की कीमतों के पेपर लाकर नहीं दिये। मैं काम पर आते-जाते या शॉपिंग पर जाते समय या फिर मम्मी के संग गुरुद्वारे जाते हुए, उन घरों को ध्यान से देखती जिनके आगे फॉर सेल के बोर्ड टंगे होते। मैंने बिन्नी को गुस्सा-सा होकर कहा, तूने दुबारा घरों की लिस्ट की बात क्यों नहीं की ?

पहले उसने मेरी ओर तिरछी नज़र से देखा, फिर बोला, घरों की कीमतें तू सुनेगी तो तेरे होश ठिकाने आ जाएँगे।

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क्रमशः आगे पढ़े...

 

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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