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रूसी कविता
आ गई है समझ-बूझ
कुल्यीन कुल्यीयेव
मैं भी जिन दिनों मेरी कच्ची उम्र थी
बेफ़िक्र गीत गुनगुनाता था बेपरवाह
अंतहीन ख़ुशियों से भरी है ये ज़िंदगी
नहीं वजह खेद करे और भरें आह
यूँ ही ताकता था नीले आसमान का नूर
झरनों का पानी पिया मैंने कई बार
पपड़ाई रोटी मेरे स्वाद से थी दूर
ताज़ा रोटी के लिए नहीं था आभार
अब तो मेरे भीतर भी आ गई है समझ-बूझ
छूट चुके रास्तों पर लौटता हूँ बार-बार
अरे कैसी हो सुबह लेता हूँ रोज पूछ
ओ झरने के निर्मल जल तुम्हें मेरा
नमस्कार
आकाश,
हरे खेत और पैड़ी शुभकामना
सुप्रभात ओ ख़रीदी हुई हमारी पावरोटी
जानता हूँ कभी-कभी है ये संभावना
कि हो सकती हो तुम दुर्लभ और बहुत सूखी
भी
मैंने समझबूझ पाई जीकर ये लम्बा जीवन
गरिमा से फिर कहता हूँ शुभकामना
मेरे विवेक की जगह लेगा जिनका यौवन
उन नौजवानों को जो छुएँगे आसमान
अँगरेज़ी
से अनुवाद:
संगम पांडेय
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