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अतिरेक और
समाधान
प्रो.
महावीर शरन जैन
अतिरेक
भौतिकवादी प्रगति एवं विकास के बावजूद मनुष्य सुखी नहीं है। वह
मकान तो आलीशान बना पा रहा है मगर घर नहीं बसा पा रहा है।
परिवार के सदस्यों के बीच प्यार एवं विश्वास की कमी होती जा
रही है। दुराग्रहों के कारण व्यक्ति की चेतना क्षणिक,
संशयपूर्ण एवं तात्कालिकता में केन्द्रित होती
जा रही है। सम्पूर्ण भौतिक सुखों को अकेला ही भोगने की दिशा
में व्यग्र मनुष्य अन्तत: अतृप्ति का अनुभव कर रहा है।
आज के संत्रस्त मनुष्य को आशा एवं विश्वास की
आलोकशिखा थमानी है। व्यक्ति परम्परागत मूल्यों पर विश्वास नहीं
कर पा रहा है क्योंकि वे अविश्वसनीय एवं अप्रासंगिक हो गये
हैं। नये युग को नये जीवन-मूल्य चाहिए। वैज्ञानिक विकास के
कारण हमने जिस शक्ति का संग्रह किया है,
उसका उपयोग किस प्रकार हो;
प्राप्त गति एवं ऊर्जा का नियोजन किस प्रकार
हो - यह आज के युग की जटिल समस्या है। विज्ञान ने हमें शक्ति,
गति एवं ऊर्जा प्रदान की है। लक्ष्य हमें धर्म
एवं दर्शन से प्राप्त करने हैं।
धर्म ही ऐसा तत्व है जो मानव मन की असीम
कामनाओं को सीमित करने की क्षमता रखता है। धर्म मानवीय दृष्टि
को व्यापक बनाता है। धर्म मानव मन में उदारता,
सहिष्णुता एवं प्रेम की भावना का विकास करता
है। समाज की व्यवस्था, शांति तथा समाज
के सदस्यों में परस्पर प्रेम, सद्भाव
एवं विश्वासपूर्ण व्यवहार के लिए धर्म का आचरण एक अनिवार्य
शर्त है। मन की कामनाओं को नियंत्रित किये बिना समाज रचना संभव
नहीं है। ज़िंदगी में संयम की लगाम आवश्यक है। धर्म की आड़
में अपने स्वार्थों की सिद्धि करने वाले धर्म के दलालों ने
अध्यात्म-सत्य को भौतिकवादी आवरण से ढकने का प्रयास करते हैं।
धर्म के ऐसे व्याख्याता प्रत्येक क्रिया-कलाप को ईश्वर की
इच्छा मानते हैं तथा मनुष्य को ईश्वर के हाथों की कठपुतली के
रूप में स्वीकार करते हैं।
आज के युग ने यह चेतना प्रदान की है कि विकास
का रास्ता हमें स्वयं बनाना है। किसी समाज या देश की समस्याओं
का समाधान कर्म-कौशल,
व्यवस्था-परिवर्तन, वैज्ञानिक तथा
तकनीकी विकास, परिश्रम तथा निष्ठा से
सम्भव है। इस कारण व्यक्ति, समाज तथा
देश अपनी समस्याओं के समाधान करने के लिए तत्पर हैं,
ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए प्रयत्नशील
हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति एवं विकास की ललक बढ़
रही है। वह दिव्यताओं को अपनी ही धरती पर उतार लाने के प्रयास
में लगा हुआ है। वह पृथ्वी को ही स्वर्ग बना देने के लिए बेताब
है।
विज्ञान ने दुनिया को समझने और जानने का
वैज्ञानिक मार्ग प्रतिपादित किया है। विज्ञान ने स्पष्ट किया
है कि यह विश्व किसी की इच्छा का परिणाम नहीं है। सभी पदार्थ
कारण-कार्य भाव से बद्ध हैं। भौतिक विज्ञान ने सिद्ध किया है
कि किसी पदार्थ का कभी विनाश नहीं होता,
उसका केवल रूपांतर होता है। विज्ञान ने शक्ति के संरक्षण के
सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। पदार्थ के अविनाशिता के
सिद्धान्त की पुष्टि की है। समकालीन अस्तित्ववादी दर्शन ने भी
ईश्वर का निषेध किया है। आधुनिकता का मूल प्रस्थान-बिन्दु यह
विचार है कि ईश्वर मनुष्य का स्रष्टा नहीं है अपितु मनुष्य ही
ईश्वर का स्रष्टा है।
मध्ययुगीन चेतना के केन्द्र में ईश्वर प्रतिष्ठित था। आज की
चेतना के केन्द्र में मनुष्य प्रतिष्ठित है। मनुष्य ही सारे
मूल्यों का स्रोत है। वही सारे मूल्यों का उपादान है।
विज्ञान द्वारा प्रतिपादित अवधारणाओं में,
साम्यवादी दर्शन में तथा अस्तित्ववादी दर्शन
में कुछ विचार-प्रत्यय समान हैं - तीनों ने ईश्वर का निषेध
किया है तथा ईश्वर के स्थान पर मनुष्य की स्थापना की है। तीनों
भाग्यवादी नहीं हैं, कर्मवादी तथा
पुरुषार्थवादी हैं। तीनों में मनुष्य की ज़िंदगी को सुखी
बनाने का संकल्प है। अस्तित्ववादी दर्शन ने वैयक्तिक
स्वतन्त्रता की चेतना प्रदान की है। साम्यवादी दर्शन ने
सामाजिक समता पर बल दिया है। विज्ञान,
मार्क्सवाद, अर्स्तित्ववादी-दर्शन
तीनों की सीमाएँ भी हैं।
विज्ञान बुद्धि एवं तर्क मात्र के आश्रित है।
मानवीयता एवं सामाजिकता केवल तर्क एवं बुद्धि से संगठित नहीं
होते। उनके संगठन में तर्क एवं बुद्धि के अतिरिक्त कल्पना,
मनोभाव एवं संवेगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका
होती है। जीवन में केवल बुद्धिजगत के ही नहीं अपितु भावजगत के
तत्व भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं।
मार्क्सवाद वर्ग संघर्ष पर आधारित है।
साम्यवादी विचारधारा मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के
सम्बन्ध में अत्यन्त निर्मम तथा कठोर है। वर्ग संघर्ष एवं
द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी चिन्तन के कारण वह समाज को बाँटती है।
गतिशील पदार्थों की विरोधी शक्तियों के संघर्ष या द्वन्द्व को
जीवन की भौतिकवादी व्यवस्था के मूल में मानने के कारण सतत
संघर्ष की भूमिका प्रदान करती है। मानव जाति को परस्पर अनुराग
एवं एकत्व की आधारभूमि प्रदान नहीं करती। मार्क्सवाद हिंसात्मक
क्रांति में विश्वास करता है। जिस देश में हिंसात्मक क्रांति
होती है; वह प्रतिक्रिया में मानसिक
उत्पीड़न को जन्म देती है।अस्तित्ववादी दर्शन यह मानता है कि
मनुष्य का स्रष्टा ईश्वर नहीं है और मानव-स्वभाव,
उसका विकास, उसका
भविष्य भी निश्चित एवं पूर्व मीमांसित नहीं है। मनुष्य वह है
जो अपने आपको बनाता है। मानव को महत्व देते हुए भी
अस्तित्वववादी-दर्शन समाज के धरातल पर अत्यन्त अव्यवहारिक है।
वह यह मानता है कि चेतनाओं के पारस्परिक सम्बन्धों की आधार
भूमि सामंजस्य नहीं अपितु विरोध है। व्यक्तियों के अस्तित्व
वृत्तों के मध्य संघर्ष, भय,
घृणा आदि भाव हैं। इस प्रकार अस्तित्ववादी
दर्शन व्यक्ति और व्यक्ति के मध्य संघर्ष एवं अविश्वास की
भूमिका मानता है।
आज के धार्मिक एवं दार्शनिक मनीषियों को वह
मार्ग खोजना है जिससे मानव अपनी बहिर्मुखता के साथ-साथ
अन्तर्मुखता का भी विकास कर सके। पारलौकिक चिन्तन व्यक्ति के
आत्म विकास में चाहे कितना भी सहायक हो किन्तु उससे सामाजिक
संबंधों की सम्बद्धता, समरसता एवं
समस्याओं के समाधान में अधिक सहायता नहीं मिलती है। आज के
भौतिकवादी युग में केवल वैराग्य से काम चलने वाला नहीं है।
भौतिकवाद का अतिरेक भी मनुष्य को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है।
आज हमें मानव की भौतिकवादी एवं आध्यात्मिक दृष्टियों में
संतुलन स्थापित करना होगा, भौतिक
स्वार्थपरक इच्छाओं को संयमित करना होगा,
स्वार्थ की कामनाओं में परार्थ का रंग मिलाना
होगा। आज मानव को न तो इस प्रकार का दर्शन शांति दे सकता है कि
केवल ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है
तथा न केवल भौतिक तत्वों की ही सत्ता को सत्य मानने वाला
दृष्टिकोण जीवन के उन्न्यन में सहायक हो सकता है।
परम्परागत
धर्म मानव8के विज्ञानसम्मत विवेक को
संतुष्ट नहीं कर पा रहा है। पाश्चात्य समाज ऐसे किसी धर्म की
कल्पना नहीं कर पा रहा है जिसका स्वरूप ईश्वर के कर्तृत्व के
बिना विवेचित किया जा सके। अध्यात्म एवं विज्ञान के बीच
सामरस्य का मार्ग स्थापित करने के लिए परम्परागत धर्म की इस
मान्यता को छोड़ना होगा कि यह संसार ईश्वर की इच्छा की परिणति
है। हमें विज्ञान की इस दृष्टि को स्वीकार करना होगा कि सृष्टि
रचना के व्यापार में ईश्वर के कर्तृत्व की भूमिका नहीं है।
सृष्टि रचना व्यापार में प्रकृति के नियमों को स्वीकार करना
होगा। विज्ञान को भी अपनी भौतिकवादी सीमाओं का अतिक्रमण करना
होगा। विज्ञान विशुद्ध रूप से भौतिकवादी रहा है। विश्व कमूल
में पदार्थ एवं शक्ति को ही अधिष्ठित देखता आया है। विज्ञान ने
अभी तक सत्ता के भौतिक क्षितिज मात्र का ही स्पर्श किया है।
उसे भविष्य में भौतिक क्षितिज के पार की अपार्थिव चिन्मय सत्ता
का भी संस्पर्श करना होगा। भविष्य के विज्ञान को अपना यह आग्रह
भी छोड़ना होगा कि जड़ पदार्थ से चेतना का आविर्भाव होता है।
विज्ञान की अध्ययन-सीमा जड़ पदार्थ है। यदि वह अपनी अध्ययन-सीमा
जड़ पदार्थ तक सीमित रखता है तो यह संगत है मगर जड़ पदार्थ से
चेतना का भी आविर्भाव होता है - यह मानना विज्ञान का दुराग्रह
है।
'जानना'
चेतना का व्यवच्देदक गुण है। जो जानता है,
वह चेतना है; जो नहीं
जानता, वह अचेतना है। स्मृति एवं
बुद्धि तथा मस्तिष्क के समस्त व्यापार 'चेतना'
नहीं हैं। पदार्थ के रूपांतर से स्मृति एवं
बुद्धि के गुणों को उत्पन्न किया जा सकता है मगर चेतना उत्पन्न
नहीं की जा सकती। चेतना का अध्ययन अध्यात्म का विषय है।
आग्रह एवं अतिरेक से ग्रसित मानव के पुरुषार्थ एवं विवेक को
जाग्रत करना है,
उसके मन में सृष्टि के समस्त जीवों के प्रति
अपनत्व भाव जगाना है। मनुष्य और मनुष्य के बीच आत्मतुल्यता की
ज्योति जगानी है जिससे परस्पर समझदारी,
प्रेम तथा विश्वास उत्पन्न हो सके।
महावीर शरन जैन
दिल्ली
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