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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। शोध ।।

 

 

धारावाहिक-1

दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता


 डॉ. सी. जय शंकर बाबु

 

यह युवा और लगनशील साहित्यकार डॉ. सी. जयशंकर बाबू की शोधवृत्ति का ही परिणाम है कि दक्षिण में हिंदी पत्रकारिता ने जो दिशा तय की उसका सम्यक मूल्याँकन संभव हो सका । श्री बाबु के इस कठिन और चुनौती भरे उद्यम से पूर्व में किये गये शोधों, रचे गये ग्रंथों की मान्यताओं को नया विस्तार मिला है । यह अब तक का सबसे महत्वपूर्ण और विश्वसनीय शोध कृत्ति इसलिए भी कहा जाना चाहिए क्योंकि अब से पहले लिखे गये किताबों में जाने-अनजाने कई हिंदी सेवियों की पत्रकारिता तक पहुँच संभव न हो सका था । कृति दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता के नये और चौंकाने वाले तथ्यों का प्रामाणिक दस्तावेज है कि दक्षिण की हिंदी भक्ति कहीं भी उत्तर भारत से कम नहीं । दक्षिणवासी होकर भी डॉ. बाबु युगमानस जैसी हिंदी लघु-पत्रिका के संपादक के रूप में हिंदी और दक्षिण भारतीय भाषाओं के एक युवा सेतु के रूप में चर्चित हैं । उनका यह शोध कार्य वैश्विक स्तर पर सभी पाठकों के लिए पहली बार सृजनगाथा में धारावाहिक प्रकाशित की जायेगी । ऐसी उदार सहमति के लिए साधुवाद के साथ प्रस्तुत है प्रथम भाग के रूप में भूमिका - संपादक

 

इतिहास – प्रसंग, दक्षिण भारत, हिंदी और पत्रकारिता      

दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता के उद्गम और विकास का इतिहास वास्तव में दक्षिण में हिंदी भाषाई चेतना के उदय और विकास का इतिहास है ।  सामान्यतः पत्रकारिता संबंधी कोई भी अध्ययन पत्रकारिता के उद्गम और विकास संबंधी आयामों पर केंद्रित होता है ।  किंतु भारतीय परिवेश में पत्रकारिता संबंधी किसी भी अध्ययन में मूलतः राष्ट्र की लोकतांत्रिक संस्कृति की चेतना के विकास का अनुशीलन भी शामिल हो जाता है ।  दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता के अध्ययन के द्वारा वस्तुतः दक्षिण में हिंदी भाषाई चेतना के विकास का समग्र-चित्रण प्रस्तुत होने के साथ-साथ एक सीमा तक दक्षिण में जनतांत्रिक चेतना के विकास का अनुशीलन भी संभव है ।

      

हिंदी के साथ दक्षिण भारत की जनता का संबंध व्यापक अर्थों में आत्मीयता, त्याग, तप, निष्ठा एवं सद्भावना का संबंध रहा है ।  भारत की बहु-भाषाई परिवेश में, राष्ट्र की समूची जनता के बीच ऐसे उदात्त तत्वों के विकास से निश्चय ही भावात्मक एकता सुदृढ़ बन सकती है ।  भावात्मक एकता के साथ जीना ही लोकतांत्रिक जीवन-संस्कृति (Democratic way of life) की सच्ची परिभाषा है ।  भारतीय परिवेश में ऐसी संस्कृति की रक्षा ही राष्ट्र की समग्रता का मूल मंत्र है ।

      

समूचे विश्व का जायजा लेने पर यह तथ्य उजागर हो जाता है कि सबसे अनूठी लोकतांत्रिक व्यवस्था भारत में ही पनप रही है ।  लोकतंत्र की चेतना को निर्धारित करने में जनभाषा का जितना महत्व होता है, लोकतंत्र की रक्षा को सुनिश्चित करने में पत्रकारिता का भी उतना ही महत्व होता है ।  भारतीय संविधान की प्रस्ताविका में अक्षरबद्ध न्याय, स्वतंत्रता, समानता एवं भाईचारे के साथ जीवन आदि पहलुओं के धरातल पर उतरना भारतवासियों के लिए तभी संभव हो पाएगा, जबकि विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के निष्ठापूर्वक कार्यनिष्पादन के साथ-साथ लोकतंत्र की रक्षा करने वाली पत्रकारिता का भी सार्थक अस्तित्व हो । जनभाषा निश्चय ही जनता के हृदयांतराल की आत्मीय भावनाओं की वाणी होती है, जिसमें हृदयों को जोड़ने की विस्मयकारी शक्ति होती है ।  ऐसी भाषा ही जनतांत्रिक चेतना की मूलवाणी बन सकती है । भारत में विभिन्न राज्यों में ऐसी अलग-अलग लगभग दो दर्जन भाषाएँ होने के बावजूद, राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी भाषा का स्थान निश्चय ही हिंदी को प्राप्त है ।  राष्ट्रभाषा और पत्रकारिता – ये दोनों एक राष्ट्र में मानव-समाज के हित संपादन करने वाले तत्व अथवा तंत्र हैं, यह सर्वमान्य सिद्धांत-वाक्य है ।

      

दक्षिण भारती की संज्ञा भारत के दक्षिणी भू-भाग को दी जाती है ।  केरल, कर्नाटक, आंध्र, तमिलनाडु राज्य तथा संघ शासित प्रदेश पांडिच्चेरी शामिल दक्षिणी भू-भाग को समग्र रूप से दक्षिण भारत की संज्ञा से अभिहित किया जाता है ।  केरल में मलयालम, कर्नाटक में कन्नड, आंध्र में तेलुगु तथा तमिलनाडु और पुदुच्चेरी(पांडिच्चेरी) में तमिल अधिक प्रचलित भाषाएँ हैं ।  ये चारों द्रविड़ परिवार की भाषाएँ मानी जाती हैं । इन चारों भाषा-भाषियों की संख्या भारत की आबादी में लगभग पच्चीस प्रतिशत है । संख्यात्मक दृष्टि से इन चारों में तेलुगु अत्यधिक प्रचलित भाषा है । तमिल विशुद्ध एवं प्राचीनतम द्रविड़ भाषा है । कन्नड़ भी प्राचीन भाषा है, जिसका स्वतंत्र विकास हुआ है । मलयालम अन्य तीनों की तुलना में आधुनिक है और संख्यात्मक दृष्टि से चौथे स्थान पर है । दक्षिण की इन चारों भाषाओं की अपनी-अपनी विशिष्ट लिपियाँ, सुसमृद्ध शब्द-भंडार, व्याकरण तथा समृद्ध साहित्यिक परंपरा है। कर्नाटक के दो-चार दक्षिणी जीलों में तुळु बोली प्रचलित है । यह अल्प प्रचलित बोली है, इसकी कोई लिपि अथवा साहित्य नहीं है ।  तुळु सहित उक्त चारों भाषाओं को पंचद्रविड़ भाषाओं की संज्ञा रूढ़ बन चुकी है । अपने-अपने प्रदेश विशेष की भाषा के प्रति लगाव के बावजूद अन्य प्रदेशों की भाषाओं के प्रति यहाँ की जनता में निस्संदेह आत्मीयता की भावना है ।  अतः यह बात स्वतः स्पष्ट है कि दक्षिण भारत भाषाई सद्भावना के लिए उर्वर भूमि है । यहाँ की जनता ने हिंदी के प्रति त्याग एवं समर्पण-निष्ठा का परिचय दिया है, यह तथ्य निश्चय ही भारत के सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनने का गौरव रखता है ।

      

धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी दक्षिण भारत की एक सुसमृद्ध परंपरा हम देख सकते हैं ।  शंकराचार्य, मध्वाचार्य, रामानुजाचार्य जैसे ख्यात् धर्म प्रवर्तक एवं दार्शनिक आचार्यों का जन्म दक्षिण में ही हुआ था ।  इन प्रवर्तकों ने अपने प्रतिपादित धार्मिक, आध्यात्मिक सिद्धांतों की धारा को संस्कृत भाषा के माध्यम से उत्तर भारत में भी प्रवाहित की थी ।  दक्षिण में संत परंपरा के कई महात्माओं का भी जन्म हुआ था, जिन्होंने आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चिंतन, मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना तथा समाज-सुधार हेतु आजीवन कार्य किया ।  देश की एकता व अखंडता की विशिष्ट परंपरा को बनाए रखने, सामाजिक एवं मानवीय चेतना के विकास में इन दार्शनिक आचार्यों, संत-महात्माओं ने निश्चय ही अप्रतिम योग दिया है ।

      

धार्मिक, व्यापारिक और राजनीतिक कारणों से उत्तर भारत के वासियों का दक्षिण में आने-जाने की परंपरा शुरू होने के साथ ही दक्षिण के धार्मिक, व्यापारिक केंद्रों में आम बोली के रूप में हिंदी व्यवहृत होती थी ।  दक्षिणी भू-भाग पर मुसलमान शासकों के आगमन और इस प्रदेश पर उनके शासन के दौर में एक भाषा विशेष के रूप में दक्खिनी का प्रचलन चौदहवीं से अठारहवीं सदी के बीच हुआ, जिसे दक्खिनी हिंदी की संज्ञा भी दी जाती है ।  दक्खिनी हिंदी में प्रचुर मात्रा में साहित्य का सृजन भी हुआ है, जिसे हिंदी साहित्य की एक कड़ी मानने की आवश्यकता पर सोचने की प्रासंगिकता है ।  क्योंकि अमीर खुसरो की सर्जना को जब हम हिंदी साहित्यिक निधि मानते हैं, तो खुसरो के बाद उत्तर की तुलना में दक्षिण में अधिक विकसित दक्खिनी हिंदी के साहित्य को हिंदी साहित्य का अंग मानना समीचीन होगा ।  बहमनी, कुतुबशाही, आदिलशाही आदि शासकों के दौर में बीजापुर, गोलकोंडा, गुलबर्गा, बीदर आदि प्रदेशों में दक्खिनी का चतुर्दिक विकास हुआ था ।  शताब्दियों पूर्व ही दक्षिण में हिंदी भाषा के प्रचलन के संबंध में एक और तथ्यात्मक उदाहरण केरल प्रांत से मिलता है ।  स्वाति तिरुनाल के नाम से सुविख्यात तिरुवितांकूर राजवंश के राजा रामवर्मा (1813-1846) न केवल हिंदी में निष्णात् साबित हुए थे बल्कि स्वयं उन्होंने हिंदी में कई पद रचे थे ।  इन तमाम तथ्यों के विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं भावनात्मक दृष्टि से राष्ट्रीय एकता, भाषाई सद्भावना की परंपरा दक्षिण भारत में सदियों से पनप रही है ।  14 वीं शताब्दी से ही किसी न किसी रूप में हिंदी का दक्षिण में प्रचलन रहा, जिसका इस प्रांत ने आत्मीयतापूर्वक आत्मसात किया था ।  उन्नीसवीं शताब्दी तक की बातों का यह संक्षिप्त आकलन है ।  इन सभी महत्वपूर्ण तथ्यों की ओर हिंदी साहित्य के तथाकथित इतिहासकारों, अन्वेषी-अध्येताओं को गौर करने की आवश्यकता है ।

 

राष्ट्रीय एकता का प्रश्न और हिंदी      

अठारहवीं शती से ही भारतीय भू-भाग पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य शुरू हो गया था और उन्नीसवीं शताब्दी में भारत अंग्रेज़ों का उपनिवेश बन गया ।  अधिकांश भू-भाग पर अंग्रेज़ों का सीधा शासन था, दक्षिणी भू-भाग में जितने भी देशी रियासतें थीं, उन रियासतों के शासकों ने आरंभ में अंग्रेज़ों का डटकर विरोध किया था, किंतु इन रियासतों के बीच आपसी राजनीतिक एकता की कमी के कारण आखिर वे अंग्रेज़ों के आधिपत्य को मानने के मज़बूर हो गए थे ।  गोरे शासकों का स्वार्थ और उनकी दमन नीति के विरोध में भारतीय जन मानस में उत्पन्न चेतना की चिनगारी चारों ओर की अनुकूल भावनाओं रूपी हवाओं से सुलगते हुए स्वाधीनता संग्राम का रूप लिया था ।  देश में 1857 का जो ग़दर हुआ, वह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है ।  शायद राजनीतिक एकता के अभाव के कारण संग्राम में सफलता नहीं मिली थी ।  इस संग्राम की विफलता के परिणामस्वरूप एक ओर भारत में ब्रिटिश राज की नींव सुदृढ़ होने लगी, दूसरी ओर भारतीय जन मानस में अंग्रेज़ों के विरुद्ध भावभूमि भी तैयार होने     लगी ।  भारत में ब्रिटिश राज की सुदृढ़ नींव को हिलाने, उनकी तानाशाही की भावना को जिंदा जलाकर उन्हें इस देश से लौटने के लिए विवश करने हेतु भारतवासियों को एक होकर भड़क उठने की आवश्यकता थी ।  इस दृष्टि से राजनीतिक एकता की चेतना का बीजारोपन भी इसी दौर में हुआ ।

      

राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रनेताओं ने भी यही महसूस किया था कि समूचे भारतवासियों में एकता की भावना के पनपने तथा एक जुट होकर लड़ने से ही स्वाधीनता की संकल्पना साकार पो पाएगी ।  बहु भाषाई भारत में भावात्मक एकता स्थापित करने के लिए एक सामान्य संपर्क भाषा की आवश्यकता महसूस होने पर भारतीय मूल की भाषा हिंदी का विकल्प अनायास ही चुना गया था ।  इसका कारण यह था कि भारत के अधिकांश भू-भाग पर हिंदी बोली और समझी जाती है ।  राष्ट्रीय पुनर्निर्माण में संलग्न राजा राममोहन राय, आचार्य केशवचंद्र सेन, महर्षि दयानंद सरस्वती आदि समाज-सुधारकों ने हिंदी के महत्व को उजागर करते हुए उसे भारतीय भावनाओं की वाणी बनाने की संकल्पना की थी ।  स्वाधीनता आंदोलन के प्रत्येक सक्रिय नेता ने राष्ट्रीय एकता की वाणी' के रूप में हिंदी का पक्ष-समर्थन किया था ।

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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