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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। पुस्तकायन ।।

 

 

सोच के लिए जमीन तैयार करती किताब


विश्वनाथ सचदेव

 

स्था, अस्मिता और अस्तित्व की चीर-हरण पर निस्पंद कृष्ण’, यह हिमांशु द्विवेदी की पुस्तक के एक लेख का शीर्षक है। मुझे लगता है, यह हमारे वर्तमान के समूचे चरित्र पर की गई कचोटनेवाली टिप्पणी भी हो सकती है। इस पुस्तक की पांडुलिपि पढ़ते समय यह शीर्षक लगातार मेरे सोच पर हावी रहा। हालाँकि यह शीर्षक एक विशेष संदर्भ में दिया गया है और कतई जरूरी नहीं कि इस चीर-हरण से सहमत हुआ ही जाए; लेकिन इस शीर्षक में जो पैनापन है, सटीकता है, एक ईमानदार प्रतिक्रिया व्यक्त करने की जो तड़प है, वह अनायास अपनी ओर आकर्षित करती है। पूरी पांडुलिपि पढ़ने के बाद यह अहसास बहुत दूर तक साथ रहा कि इसका लेखकर चीजों के मर्म को सिद्दत के साथ महसूस करता है और अपनी सोच को निर्भीकता के साथ व्यक्त करने में विश्वास करता है। यह शिद्दत और निर्भीकता किसी भी लेखन को महत्त्वपूर्ण बना देती है।

 

पत्रकारिता की बहुत सी परिभाषाओं में से एक यह भी है कि पत्रकारिता जल्दबाजी में लिखा गया साहित्य है। इसका अर्थ यह हुआ कि जो अपेक्षाएँ हम साहित्य से करते हैं, उनका कुछ अंश तो पत्रकारिता से भी अपेक्षित होता ही है। मेरा यह मानना है कि साहित्य क्रांति भले ही न कर सकता हो, बदलाव के लिए जमीन अवश्य तैयार करने का माध्यम है, होनी चाहिए। पत्रकारिता का उद्देश्य मात्र जानकारी देना ही नहीं, जानकारी को पूरे संदर्भ में प्रस्तुत करके समाज के सोच को गति और दिशा भी देना है। यह दायित्व है पत्रकारिता का और जब भी किसी पत्रकार के लेखन तौला जाए, एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ यह दायित्व भी होगा। इसी दायित्व का तकाजा है ताकि पत्रकारीय लेखन अनुभूति की गहराई और अभिव्यकित की ईमानदारी दोनों को प्रदर्शित करनेवाला हो। पत्रों में दैनिक अथवा साप्ताहिक स्तंभ भले ही त्वरित टिप्पणियों की परिभाषा के अंतर्गत आते हों, लेकिन इन टिप्पणियों को सार्थकता इसी बात में निहित है कि वे समय के सवालों को सिर्फ उछालें ही नहीं, उनके सार्थक हल खोजने की ईमानदार कोशिश भी करें। इसमें कोई शक नहीं कि इस कोशिश पर टिप्पणीकार के सोच और मान्यताओं का रंग चढ़ता है। स्वाभाविक है। यह एक हद तक जरूरी भी है। तभी वह पत्रकार निस्पंद कृष्ण की भूमिका से बाहर आता है, अपने ढंग से सवालों से जूझने की कोशिश करता है, स्थितियों में परिवर्तन लाने की प्रतिक्रिया में हस्तक्षेप किसी दुःशासन के चीर-हरण करते हाथ रोकने की प्रेरणा दे सकता है और कभी किसी निस्पंद कृष्ण को मदद का हाथ बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकता है।

 

हिमांशु के लेखन में मुझे ऐसे ही हस्तक्षेप की कोशिश दिखाई देती है। वे सिर्फ यह नहीं कहते कि एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’, वे आकाश में छेद करने की आवश्यकता भी प्रतिपादित करते हैं और यह अहसास भी देते हैं कि छेद करने की ईमानदार कोशिश भी रंग लाएगी। यहीं इस बात को रेखांकित किया जाना जरूरी है कि पत्रकारीय हस्तक्षेप उत्तेजित करने के लिए नहीं होता। वह ठोस वैचारिक आस्था एवं विवेकपूर्ण विश्लेषण पर आधारित होता है (या होना चाहिए)। इसलिए एक जिम्मेदारी का भाव इसमें अंतर्निहित होता ही हैसार्थक संवाद की स्थितियों के निर्माण की जिम्मेदारी। सवाल पत्रकार के सोच या विश्लेषण से सहमत होने का नहीं है, उससे प्रेरित होकर अपनी सोच को दिशा देने की कोशिश की प्रेरणा जगाने की है। यह काम इस पुस्तक में संगृहीत बहुत से लेख करते दिखाई देते हैं। मैं इसे संकलन की आवश्यक भी मानता हूँ और सफलता भी।

यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है कि संवाद की स्थितियाँ समाप्त होती जा रही हैं। अपनी-अपनी आस्था के नाम पर खेमेबंदी का शिकार होता जा रहा है समाज मे जबकि आवश्यकता इस बात की है कि वैकल्पिक आग्रहों के बावजूद विभिन्न सोचों-वर्गों में संवाद की स्थिति बना जाए। मुझे इस संकलन में इस आशय की कोशिश देखकर सुख मिला है। संकलन के अधिकांश लेख राजनीतिक गतिविधियों एवं व्यक्तित्वों से प्रेरित हैं, यह स्वाभाविक भी है। जनतांत्रिक व्यवस्था में अपने आस-पास घटती राजनीति के प्रति नागरिक की रुचि और प्रतिक्रिया एक जरूरी शर्त है इस व्यवस्था की सफलता की। यह पुस्तक इस दिशा में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैसोच के लिए जमीन तैयार करती है। लेखक इसके लिए बधाई का पात्र है। समय-समय पर लिखे गए लेखों का यह संकलन हमारी जरूरत को पूरा करता हैआस्था, अस्मिता और अस्तित्व के चीर-हरण से उत्पन्न स्थितियों को समझाने और उनसे जूझने की जरूरत। इस चीर-हरण की पीड़ा को जो महसूस करते हैं, उन्हें यह पुस्तक सोचने के लिए बाध्य कर सकती है। क्या इससे भी बड़ा कोई उद्देश्य हो सकता है लेखक है ?

विश्वनाथ सचदेव

संपादक, नवनीत, मुंबई

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पुस्तक

अलाव

लेखक

हिमांशु द्विवेदी

मूल्य

200 रुपये

पृष्ठ

179

प्रकाशक

प्रभात प्रकाशन, दिल्ली

समीक्षक

विश्वनाथ सचदेव

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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