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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। पुस्तकायन ।।

 

 

साधारण सांसारिक जीवन का सोंदर्य


जयप्रकाश मानस

 

मैं जैसे-जैसे इस संग्रह की रचनाओं से गुज़रता चला गया मुझे कविता के शिल्प और कथ्य आदि तमाम अवधारणाओं की कई मानक घेरते चले गये । अंत में एक ही कथन या यूँ कहें कि सिद्धांत पर मैं जा टिका – अपनी संपूर्ण विश्वास के साथ; वह यह कि -

 “सांसारिक जीवन का कला से बड़ा गहरा और सजीव संबंध है ।...... किसी कल्पित सौंदर्य की उपासना कला नहीं करती । इसी जीवन, इसी संसार के नित्य उजागर होते सौंदर्य की उपासना कलाकार करता है ताकि जीवन के सौंदर्य को उजागर होने में साहित्य और कला जीवन की सहायता करें ।  

 

अपने समय के महान् हस्ताक्षर फ़िराक गोरखपुरी की उपरोक्त पंक्तियों को मैं नथमल झँवर के गीतों के मर्म तक पहुँचने का प्रवेश-द्वार मानता हूँ । इस संग्रह की रचनायें मनुष्य के साधारण सांसारिक जीवन के सौंदर्य का प्रत्यक्षीकरण ही हैं । साधारण जीवन का मतलब केवल प्रगतिशील काव्य-संकेतों से सुझायी और दिखायी गयी असाधारणता ही, अपितु वह विचारकों, चिंतकों के घोर विमर्श के बाद भी उस साधारण मनुष्य का साधारण जीवन ही है जिसका बाह्य भले ही तब्दील दिखाई देता है, उसका अंतः तो वही होता है जिसमें उसकी असाधारणता निरंतर बची रहती है ।

 

साधारण सासांरिक जीवन को एक सांस्कारिक मन-मूल्य से ओत-प्रोत व्यक्ति के जीवन के शर्तों पर भी समझा जा सकता है जो अपनी सांस्कृतिक आस्थाओं के प्रभावों में ही कला को समझता है या उस कला में अपने सौंदर्य को विन्यस्त करता है । नथमल की रचनाओं का आस्वाद की सुविधा के लिए इन्हीं आदर्श संकेतों को अपनी मनीषा में पैठ दिलाना कठिन न होगा । किसी महान कलाकार की दिव्यतम् रचना की पूर्वाग्रह या मानसिक दबाब से यहाँ यहाँ गुजरते वक्त हो सकता है कि निराशा का सामना करना पड़े । रचनाशीलता में चिरनवीनता पर भी प्रश्नचिन्ह लगे । पर वस्तुतः ऐसा है नहीं । ऐसा बहुधा नहीं होता कि किसी रचनाकार की समस्त कृतियाँ चकाचौंध लाती हैं पर ऐसा बहुधा होता है कि हर रचनाकार की एकाध रचनाएँ हर तरह के पाठकों के लिए और हर समय के लिए चकाचौंध भी हुआ करती हैं । और सच तो यह भी है कि किसी कलाकृति के संपूर्ण आस्वाद की आवश्यक शर्त कलाकार के मन की भूमि तक पैठना भी है । एक सच यह भी है कि हर रचनाकार का अपना काव्य-वैभव होता है, जिसे उसकी दृष्टि से ही देखा जा सकता है । केवल अपने मन या रटे-रटाये काव्य आस्वाद के शर्तों के साथ कदापि नहीं । और यही रसास्वाद का असली मंत्र भी है । कलाकार के संपूर्ण मनग्रथियों को जाने बिना आस्वाद की अनुभूति वैसी ही होती है जैसे अक्सर गंगा का ऊपरी जलस्तर मटमैला दिखाई देता है किन्तु उसकी पवित्रता इससे खंडित नहीं होती ।

 

नथमल झँवर के इन गीतों में साधारण-सी दिखाई देने वाली काव्य-पंक्तियाँ कई स्तरों पर धोखा भी दे सकती हैं कि इनके केंद्र में जाने-पहचाने शब्द-शिल्प और साधारण भावों की पुनर्सर्जना के अलावा कुछ भी नहीं है । इसे ऐसी मान्यताओं के साथ स्वांतः सुखाय की कविता कह बैठना लगभग अन्याय भी होगा । इन रचनाओं में कवि का मनुष्य और समाज के प्रति गहरी संपृक्ति भी है । साधारण में भी अपनी सृजनात्मकता के स्तर पर असाधारण तक ले पहुँचाना कम चुनौती भरा नहीं है । झँवर का कवि कथ्य और शिल्प दोनों के स्तर पर साधारण से असाधारण की पहुँच रखता है। कहें कैसे ? साहित्य में आज अध्यात्म और ईश्वर से बातचीत या संसार की नश्वरता की चर्चा लगभग बेमानी घोषित कर दी गई है । ऐसे शास्वत मन-भावों को भक्तिकाल की वापसी कहकर खिल्ली उड़ायी जाती है । आधुनिकता और अब इधर उत्तर आधुनिक दर्शन अनुप्राणित कथित साहित्य-शिल्पियों और साहित्य-मर्मज्ञों में तो धर्म, ईश्वर और मन के मूल्यों के प्रति सर्वथा नकार-सा दिखाई देता है । ठीक ऐसे समय में साधारण मनुष्य के मन की शाश्वत भावों को कविता में लाना एक तरह से मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने की बड़ी रचनात्मक चेष्टा भी है । इस स्तर पर झँवर के गीतों की स्वीकृति बढ़ जाती है ।

 

झँवर की रचनाओं को पढ़ना केवल एक धार्मिक मन के भाव सरणियों में तैरना मात्र नहीं है, अपने विशिष्ट अस्मिता में मनुष्य होने की कला को पाना भी है । साधारण मनुष्य होने की कठिन कला और साधारण कला से भी मनुष्य होने की असाधारणता को बचाने के लिए इस जटिल समय में झँवर के सयाने गीतों का कम से कम मैं तो स्वागत करता हूँ । स्वागत इसलिए कि वे शिल्पगत विविधाओं के भी आग्रही हैं । वे किसी बंधनकारिता के गुलाम नहीं है जैसा कि नई कवितावादियों आरोप लगाते फिरते हैं कि गीत मनुष्य की मुक्ति की बाधक विधा है। छंद रचनाओं की बहुलता के साथ इस संग्रह में मुक्त छंद की संलग्नता को रचनाकार के मुक्त रचनात्मकता के विश्वासों के साथ देखा जाना चाहिए, क्योंकि वे केवल गीतों के गायक ही नहीं अच्छी कविताओं के पाठकर्ता भी हैं । केवल यह नहीं कि उनके पास छांदस रचनाओं का अभाव है ।

 

एक बात और - जीवन इतिहासमुक्त हो ही नहीं सकता । वह इतिहास से भी अपने सौष्ठव के लिए रस लेता है । जीवन से ही इतिहास बनता है और इतिहास से भी जीवन बनता है । भले ही आज जीवन की शाश्वत सौंदर्य से हारने या उबने वाला पश्चिम इतिहास को मार डारने का पाठ पढ़ाने उद्यत है, पर वह क्या कभी संभव है ? रचनाकार की निष्ठा को भी मैं ऐसे दर्शन ही के साथ देखता हूँ कि शीर्षक चुनते वक्त बड़े विश्वास के साथ कहता है – जीवन का इतिहास यही है”, मैं उनकी ही पंक्तियों को यहाँ गुनगुनाना चाहता हूँ और कदाचित् आप भी मेरे साथ गुनगुना उठे –

अपने मंदिर की देहरी पर

आशाओं के दीप जलाओ

जीवन से जो हार चुके हैं

उन्हें विजय का घूँट पिलाओ ।

जयप्रकाश मानस

रायपुर, छत्तीसगढ़

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पुस्तक

जीवन का इतिहास यही है

लेखक

नथमल झँवर

पृष्ठ

96

मूल्य

100 रुपये

प्रकाशक

वैभव प्रकाशन, रायपुर, छत्तीसगढ़

समीक्षक

जयप्रकाश मानस

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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