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चार
लघुकथायें
पाठक परदेशी
आत्म प्रेरणा का जादू
मेरी दूसरी संतान डेढ़ साल की हो ही रही थी कि मेरे पति पंचू को
संतति नियमन की बात सूझी। उसने मुझे अपने मन की बात कह सुनाई।
बात सुनते ही मेरा चेहरा प्रफुल्ल हो उठा। प्रफुल्लित मन से
मैंने कहा -
''जनाब
आपरेशन तो मुझे कराना चाहिए,
ताकि बड़े नाज से मैं अपनी सहेलियों को यह कह सकूं कि मैं सिर्फ
दो बच्चों की एक सुखी माँ हूँ और मेरा परिवार सीमित है।
इसे मेरी समझदारी तथा आत्मप्रेरणा मानकार वे झूम उठे और मुझे
आश्वस्त करते हुए कहा -
'ठीक
है,
ऑपरेशन तुम्हारा ही होगा।'
डाक्टर की सलाह पर ऑपरेशन की तिथि तय हुई। शुभचिंतकों ने दो ही
बच्चों (दोनों ही बेटी होते हुए भी) के बाद परिवार नियोजन की
हमारी प्रतिज्ञा पर हमें पुनर्विचार करने के लिए कहा और हमें
समझाने का हर संभव (अस्पताल प्रवेश तक) प्रयास किया। हमने उनकी
एक न सुनी क्योंकि इसमें हमारे भविष्य का सुखद पहलू जो
दृष्टिगोचर हो रहा था।
अस्पताल से छुट्टी मिली। सप्ताह भर में ही भली-चंगी जब मैं
अस्पताल से घर लौटी तो मेरी बहुत सी पढ़ी-लिखी सहेलियाँ मुझे
बधाई देने घर पर आई। बधाई स्वीकारते हुए मैंने अपने सहज,
सुलभ ऑपरेशन की कहानी उन्हें भी सुनाई। फिर क्या था,
बधाई देने आई सहेलियों मे से पच्चीस ने अपने परिवार को सीमित
करके स्वयं भी बधाई की पात्रा बनने की दृढ़ प्रतिज्ञा कर लीं।
इस पर पंचू आज भी कहता है -
'यह
सब मेरी पत्नी गमकी की आत्मपेरणा का ही जादू था।'
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दिखावा
अजी सुनते हो! जंगल बचाओ समिति का आज गांव में विधिवत् गठन
होने जा रहा है। हाय राम! अब क्या होगा?
हमारे इस आबाद परिवार का गुजारा कैसे चल पाएगा?
जंगलों से बेशकीमती पेड़ों को चोरी-चोरी काटकर और चोरी-चोरी
बेचकर ही तो हम मोटी रकम कमाते हैं।'
चिंतित पुनिया ने अपने पति से कहा। अपने इस बात का उस पर जरा
भी असर न पड़ता देख वह झल्लाई -
'कान
बहरा गया है क्या?'
'मेरे
दोनों ही कान सही काम कर रहे हैं,
भगवान। तुम नाहक ही चिन्ता मत करो। सब ठीक हो जाएगा। समिति गठन
की रूपरेखा पहले ही बना ली गई है। रही बात औपचारिकता निभाने की
तो वह भी आज निभा दी जायेगी। अरे पगली! आड़ में शिकार करने का
मजा ही कुछ और होगा।
'वो
कैसे?'
पत्नी ने पूछा।
लकडी चोर गिरोह का सरगना सरेखा सिंह ही उस समिति के सरंक्षक
होंगे। अध्यक्ष पद के लिए अघोर को मना लिया गया है और मैं उसका
सर्वमान्य उपाध्यक्ष होऊंगा। सचिव के रूप में सगनी का मनोनयन
तय ही है जो कि महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व करेंगी। शेष सभी
चोर बिरादर भी समिति के आजीवन सक्रिय सदस्य रहेंगे ही। समिति
गठन की बात तो मात्र दिखावा है। हमारे चोरहा कारोबार पर कोई
फर्क नहीं पड़ेगा।'
इतना सुनना था कि पुनिया की जान में जान आ गई।
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छुटकारा
फगनू आज ही तो देर रात को लौटा था। पूरे पच्चीस दिन इस गांव से
उस गांव घूमता रहा अपनी रूपवती,
गुणवती,
शीलवती बेटी सुमीती के हाथ पीले करने की आस में। एक सुपात्र वर
पाने की तलाश में। पर फिर भी विगत वर्षों की ही भांति नहीं मिल
सकी थी सफलता। खाली हाथ ही लौटना पड़ गया था। औकात से कहीं
ज्यादा दहेज की मांग ने उसे पूरी तरह तोड़कर रख दिया।
घर पहुंचकर,
खाट पर बैठा ही था कि उसे जोर का चक्कर आया और वह वहीं लुढ़क
गया। खुशखबरी सुनने की बाट जोहती बैठी सुरेखा की महतारी झटपट
वहाँ पहुंची। ढाढ़स के दो शब्द बोल भी नहीं पाई थी कि फगनू ने
लड़खड़ाते जुबान से यह कहा कि -
'हमारी
इकलौती दुलउरी बेटी की शादी की जिम्मेदारी अब से तुम्हारी
होगी........।'
बस फिर क्या था,
अपने बुढ़ानपे का एक मात्र सहारे की धड़कन शून्य छाती पर सिर
पटक-पटक कर वह बिलखने लगी।
अलहे सुबह,
अर्जुन वृक्ष की एक मोटी डाल पर सज्ञान सुरेखा की लाश लटकी
होने की खबर जंगल की आग की तरह सारे गांव में फैल गई। मौके पर
मिली स्यूसाईड नोट को लोगों ने पढ़ा -
'मेरी
शादी के लिए मॉगी गई दहेज की राशि न दे सक पाने की चिन्ता ने
मेरे देवता तुल्य गरीब पिता को ग्रास बना लिया। मैं नहीं चाहती
कि मेरी पीड़ित माता भी कल वैसा ही कुछ कर बैठे।'
दुख जताने के लिए आये लोग मृतका की मॉ फगनी से कहते - अब होनी
को कौन टाल सकता है भला......। वैसे एक प्रकार से अच्छा ही हुआ
जो उसे उसकी बोझ बनी जवानी से छुटकारा मिल गया।
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अंधविश्वास
अमरू एक अत्यंत गरीब अहीर था। रोज की तरह उस दिन भी तड़के वह
अपने मालिक के गोठे से गयों को निकाल चराने के लिए चारागाह को
ले जा रहा था कि बाएँ पैरे की एक ऊंगली में उसे कांटा चुभा।
शाम को घर लौटने पर वह कांटा निकलवाने हज्जाम के पास गया।
कांटा तो नहीं निकला,
परन्तु हज्जाम उस तेज औजार से घाव और गहरा हो गया। दर्द और भी
तेज होता गया,
पर उस दीन अहीर ने रोजी रोटी के लिए गायों का चराना बराबर जारी
रखा।
ऊंगली सूजती ही गई। गांव तथा आसपास के बैगों (झाड़ने फूंकने
वालो) ने उसे विश्वास दिलाया कि झाड़फूंक से ही वे उसे ठीक कर
देंगे। एक दिन एक बैगा ने अहीर से कहा -
'तुम्हारा
देवता तुमसे रूठ गया है। मेरी मानों तो देवता के नाम पर बड़ा सा
सुअर ले आओ और उसे मारकर उसकी सब्जी बनाकर लोगों को भोज दे दो,
देखना दर्द कैसे दूर होता है।'
मरता क्या न करता,
पर रूठा देवता तब भी न माना। आखिर एक बड़े अस्पताल में अहीर
अमरू को अपना पैर कटवाना पड़ा। डाक्टर ने अमरू से कहा था,
'बैगाओं
के चक्कर में न पड़कर अगर पहले ही यहॉ आए होते तो ऐसी हालत न
होती'।
अपाहिज अमरू घोर दुर्दिन काटता हुआ एक दिन असमय ही चल बसा।
मृत्यु की खबर पर लोगों ने कहा था-अंधविश्वास पर विश्वास करने
वालों का हश्र ऐसा ही होता है।'
पाठक परदेशी
शा.उ.मा.वि. पाण्डातराई
जिला-कबीरधाम (छ.ग.)
491559
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