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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

 

असर

 

बड़े साहब को गरमी सताने लगी

छोटे साहबों से कैसे रहा जाता

उन्होंने फाईल आगे बढ़ाई, स्वीकृति ली

अब बड़े साहब के कमरे की खिड़की में

दो टन का एयरकंडीशन

अब बड़े आराम से चलने लगा

कमरे की ठंडक

और साहब की टेबल से फाईलें

साथ-साथ तेजी से सरकने लगी

बड़े साहब को भी गरमियों में

कश्मीर का आनंद आने लगा

 

उधऱ खिड़की के बाहर बैठा

साहब का चपरासी

आग लगाती गरमी और

एयरकंडीशन की गरम हवा से झुलसता रहता

क्या मजाल  

किसी से कुछ कह पाता वह

 

ऐसे ही बीत गए गरमियों के दो साल

हर गरमियों में ठंडी हवा खाते बड़े साहब

तीसरे साल चल बसे

चपरासी आज भी जिन्दा है

उस पर किसी हवा का

कोई असर नहीं पड़ा

   तेजपाल सिंह हंसपाल

चौथी गली, फाफाडीह नाका, रायपुर (छत्तीसगढ़)

 ◙◙◙

 

कवि

- सुरेन्द्र काले

- स्वप्निल श्रीवास्तव 

- अरुण शाद्वल

- स्वर्ण ज्योति

- सुरेश उजाला

- माँझी अनन्त

- निलय उपाध्याय

नई कलम

- तेजपाल सिंह हंसपाल

 

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