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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

 

खैनी की डिबिया

 

यह कोई घटना नहीं थी

दुर्घटना तो कतई थी ही नहीं

महज संयोग था कि हम खड़े थे सड़क के किनारे

और हड़-हड़, खड़-खड़ करते सामने से

गुज़र गया ट्रैक्टर

 

ट्रैक्टर के गुज़रने में भी

आख़िर क्या हो सकता था हमारे लिए

वो तो ड्राइवर के पासवाली जगह से गिरी थी

प्लास्टिक की नन्हीं-सी डिबिया

और बावलेपन में दौड़ गई ट्रैक्टर के पीछे

 

हमें अच्छा लगा

डिबिया का ट्रैक्टर के पीछे दौड़ना

 

ट्रैक्टर

शहरके बाहर जब किसी भट्ठे पर रुकेगा

उतरेंगे मजूर और ईंटों की लदान के ठीक पहले

जब कोई मजूर

अपने कमर के फेंटे पर ले जाएगा हाथ

पछताएगा और हारकर निहारेगा अपने साथियों को....

 

उसे क्या पता

किस गति से उसका पीछा किया था

इस नन्हीं-सी जान ने, किस अधीरता से दी थी

उसे आवाज़

   निलय उपाध्याय

 ◙◙◙

 

कवि

- सुरेन्द्र काले

- स्वप्निल श्रीवास्तव 

- अरुण शाद्वल

- स्वर्ण ज्योति

- सुरेश उजाला

- माँझी अनन्त

- निलय उपाध्याय

नई कलम

- तेजपाल सिंह हंसपाल

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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