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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

गणिका

 

गणिका

कोई और नहीं

औरत का ही स्वरूप है

दासी-प्रथा का उपसंहार है औरत

 

जो होती है हर सूरत में

किसी न किसी की

माँ-बहन या बेटी

 

वह तिरस्कृत-बहिष्कृत

दुर्जन या उपेक्षित नहीं

अपितु आदमी के हरामीपन का

नतीजा है - गणिका

 

तहजीब की क़िताब है

जो शरीफ़ों के घर नहीं

बल्कि कोठे पर मिलती है

घर की ज़ीनत न सही

किन्तु महफ़िल की रौनक है

 

वह होती है - विवश

हमेशा सहारे के अभाव में

 

इतिहास गवाह है

गणिका के साथ

स्वेच्छा नहीं

मज़बूरी शब्द जुड़ा है सदैव से

और मज़बूरी मन से नहीं - तन से होती है

क्योंकि हर आदमी खाना चाहता है - माँस

लेकिन नहीं बाँधना चाहता है गले में हड्डी

जिसका दुष्परिणाम है - गणिका

फिर भी देश के भड़वों से बेहतर है

गणिका....

  सुरेश उजाला

108, तकरोही, प. दीनदयाल पुरम मार्ग

इंदिरा नगर, लखनऊ, उ.प्र.

 ◙◙◙

 

कवि

- सुरेन्द्र काले

- स्वप्निल श्रीवास्तव 

- अरुण शाद्वल

- स्वर्ण ज्योति

- सुरेश उजाला

- माँझी अनन्त

- निलय उपाध्याय

नई कलम

- तेजपाल सिंह हंसपाल

 

 

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