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गणिका
गणिका
कोई और नहीं
औरत का ही स्वरूप है
दासी-प्रथा का उपसंहार है औरत
जो होती है हर सूरत में
किसी न किसी की
माँ-बहन या बेटी
वह तिरस्कृत-बहिष्कृत
दुर्जन या उपेक्षित नहीं
अपितु आदमी के हरामीपन का
नतीजा है - गणिका
तहजीब की क़िताब है
जो शरीफ़ों के घर नहीं
बल्कि कोठे पर मिलती है
घर की ज़ीनत न सही
किन्तु महफ़िल की रौनक है
वह होती है - विवश
हमेशा सहारे के अभाव में
इतिहास गवाह है
गणिका के साथ
स्वेच्छा नहीं
मज़बूरी शब्द जुड़ा है सदैव
से
और मज़बूरी मन से नहीं - तन
से होती है
क्योंकि हर आदमी खाना चाहता
है - माँस
लेकिन नहीं बाँधना चाहता है
गले में हड्डी
जिसका दुष्परिणाम है - गणिका
फिर भी देश के भड़वों से
बेहतर है
गणिका....
सुरेश उजाला
108, तकरोही,
प. दीनदयाल पुरम मार्ग
इंदिरा नगर, लखनऊ, उ.प्र.
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