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वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008
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।। कविता ।।
राह के दरख्त
काश.....
राह पर खड़े दरख़्त
कुछ बोल पाते
अपनी ज़ुबानी अपनी गवाही दे पाते तो
कितने किस्से कह पाते
काश...यह कुछ बोल पाते........
पंथी को साया
राही को छाया
भूलों को राहें
भटकों को बाँहें
देकर भी ये हैं
कितने....अकेले
हरियाली के मेले
हैं कितने अलबेले
आँव में अपनी
नन्हें नीडों को पालें
पर हैं अकेले
तन्हाई का दुःख झेंलें
काश.....ये कुछ बोल पातें
तो अपनी व्यथा-कथा
अपनी दर्द बाँट पाते
काश....राह के दरख़्त कुछ बोल पाते
स्वर्ण ज्योति
नं २२ ९वाँ क्रॉस
राजाजी नगर, पाँडिचेरी
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