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सत्तू
जहाँ भीर
दिखायी पड़ता है सत्तू
उभर आती है तस्वीर एक बिहारी
की
जो इसे अपने गमछे में बाँध
सदियों पहले
निकल पड़ा था अपना ठाँव छोड़,
बिदेशिया बन
कितने कल-कारखाने, कितनी
अट्टालिकाएँ गगनचुंबी
खड़ी कर दीं इस सत्तू ने अपने
दम पर
क्यों सच है न भिखारी ठाकुर
अब क्या बाँधेगा तुम्हारा
बिदेशिया अपनी पोटली में
अब कहाँ से नसीब होगा सत्तू
इसे
डॉक्टरों ने बता दिया है
मुफ़ीद इसे
गैस की बीमारी के लिए दिल की
बीमारी के लिए
अब तो समा जाता है वो सारा
सत्तू
उन मोटे-मोटे उदरों में उन
दिलों को बचाने की ख़ातिर
जहाँ नहीं है दिल
तुम्हें कम से कम सत्तू
पेटेंट तो ही करा
लेना चाहिए था भिखारी ठाकुर
!
अरुण शाद्वल
बी-304,
पुष्पांजलि, एनक्लेव
उत्तरी
मंदिरी, पटना - 800001
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