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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

मूर्तवत

 

कोई कविता सिर्फ़

एक बार वज़ूद में आती है

और कवि पर नहीं

परिस्थितियों पर निर्भर करती है

 

रेशमी शब्द मिलकर

बुनते रहते हैं कोमल कठोर कविताएँ

शब्द जानते हैं पड़ावों को

बिसात पर मोहरों को

रखना भी जानते हैं

 

जो घटता है हम देखकर भी

उसे अनदेखा करते रहते हैं

हमारी हठधर्मिता ने

मूर्तवत बना दिया है हमें

इतना मूर्तवत कि हम गर्दन न घुमा कर

इधर-उधर आगे-पीछे

कुछ भी अब देख नहीं सकते

और हमारा अपना बादशाह

सारे मोहरों के रहते

शह पर शह खाते-खाते

मात खा जाता है

    सुरेन्द्र काले

नवाब काटेज

पुर्दिलपुर, गोरखपुर, उ.प्र.

 ◙◙◙

 

कवि

- सुरेन्द्र काले

- स्वप्निल श्रीवास्तव

- अरुण शाद्वल

- स्वर्ण ज्योति

- सुरेश उजाला

- माँझी अनन्त

- निलय उपाध्याय

नई कलम

- तेजपाल सिंह हंसपाल

 

 

 

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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