|
मैं
आंबेडकरवाद जैसी किसी अवधारणा में विश्वास नहीं करता
मोहनदास नैमिषराय
से जयप्रकाश मानस की बातचीत
मानस –
नैमिषराय जी, फिलहाल क्या लिख-पढ़ रहे हैं
?
नैमिषराय जी –
इन दिनों बहुत कुछ लेखन चल रहा है। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान
के तहत दलित थिएटर पर शोध कार्य के साथ
“हमारे
जख्म”
उपन्यास को अंतिम रूप देना है। आपकी जानकारी के लिए बतला दूँ
कि यह गुजरात में हुए दंगों पर केंद्रित है। कुछ कहानियाँ
अधूरी पड़ी हैं, इन्हें पूरा कर रहा हूँ। साथ में बयान पत्रिका
भी चलानी होती है।
मानस –
आपकी कृति ‘अपने-अपने
पिंजड़े’
नामक आत्मकथा से यह मान्यता जाती रही कि हिंदी में सशक्त दलित
आत्मकथाएँ नहीं हैं। आखिर कैसे यह हुआ
?
नैमिषराय जी –
देखिए, इसके पीछे मैं दो-तीन तथ्यों को महत्वपूर्ण मानता हूँ।
एक तो मेरठ की स्थितियाँ, गतिविधियों और मेरी निजी जीवन। यह तो
सबसे बड़ा कारण रहा कि मेरठ में बाक़ायदा जलसे होते थे, भाषण
होते थे। दूसरा उस समय मैं
‘बामसेफ’
में सक्रिय था। बहुजन समाज पार्टी से पहले यह बामसेफ संस्था
नाम से जानी जाती थी। तो वहाँ से पत्र-पत्रिकाओं में लिखना
शुरू किया। तीसरे कारण में मैं अपने मुंबई जाने को मानता हूँ।
जहाँ मैंने मराठी लिखना शुरू किया। वहाँ दया पवार की रचानएँ
खासकर बहुत पढ़ीं। उनसे निरंतर मुलाकात भी होती थी। दादा साहब
रूपवते, जस्टिस आर.आर. भोले आदि से मेरे बहुत अच्छे संबंध थे।
गणेश मंत्री जी जो कि समाजवादी पार्टी में सक्रिय रहे, से भी
मेरे आत्मीय संबंध रहे। दलित समाज साहित्य और इतिहास और
विशेषकर महिलाओं की अस्मिता के सवाल खड़े हो गए। मेरी बेचैनी
बढ़ने लगी। महाराष्ट्र में आत्मकथाएँ आने लगीं। एक दूसरी बात
हम लोगों ने सोचा कि हमारे दक्षिण भारत में भी ऐसी स्थितियाँ
रही हैं। मैंने लिखने का प्रयास किया। लिखने की स्थितियाँ बहुत
दुखद थीं। सच मानिए, जब आत्मकथा छपी तो कुछ लोग मुझ पर नाराज
हो गए। उस पर मैंने तीन पन्ने का आर्टिकल लिखा कि आत्मकथा
लिखना कठिन है। जहाँ तक आत्मकथआ को ही चुनने का सवाल है उसके
भी कारण हैं। आत्मकथा में पाठक को दलित समाज का इतिहास,
साहित्य, आंदोलन सब की जानकारी मिलती है, क्योंकि मेरी जो
आत्मकथा है उसमें एक बड़े समाज की आत्मकथा, मेरठ के चौराहे
हैं, सड़कें हैं, गलियाँ हैं, उनसे इतिहास खुलता है, मंदिरों
में किस प्रकार का व्यवहार होता है वह खुलता है।
मानस –
निश्चित रूप से इस आत्मकथा ने आपको बुलंदियों पर बिठाया है।
क्या मैं पारिवारिक पृष्ठभूमि और साहित्यक संस्कार को और
विस्तार से जान सकता हूँ
?
नैमिषराय जी –
वाह, क्यों नहीं भाई साहब। मेरे जीवन का दूसरा नाम अभाव था। हम
मेरठ में रहते थे। मिट्टी का घर था। कच्चा था। मेरठ में पानी
नहीं था, पानी बहर से लाना पड़ता था मुझे ख़ुद ही। विशेष कपड़े
भी उस समय पहनने के लिए नहीं थे। बिना चप्पल या जूते के भी
आना-जाना पड़ता था। अभी भी मुझे उसकी याद आती है। पाँव में
छाले पड़ जाते थे। मेरी दादी माँ नीम के वृक्ष के नीचे केवल
चटनी बनाती थी और हम उसके साथ रोटी खाते थे। मुझे अब भी याद
आता है कि प्याज के साथ रोटी खाता था। लाल मिर्च की जो चटनी है
उसके साथ रोटी खाना या जैसे हमारे यहाँ शादियाँ होती तो लंबे
समय तक एक-एक हफ्ते तक जो शादी में चटनी अतिरिक्त चीज़ों के
साथ बनाई जाती थी। वह हम बर्तन में ले आते थे। उसके एक-एक
सप्ताह कर यानी सब्जी न खाके चटनी ही रोज खाते थे। जब तक ख़त्म
नहीं होती थी। शादियाँ बस्तियों में होती थीं और वहाँ से हम यह
चटनी लाया करते थे। हरी मिर्च, चटनी खाते थे। आज भी प्याज के
साथ रोटी खानका मुझे अच्छा लगता है, इससे मुझे मेरा अतीत याद
आता है।
पिताजी आरंभ में सामाजिक कार्यकर्ता रहे। वे डिप्रेस्ड लीग के
चेयरमेन रहे और जब उन्होंने हायस्कूल किया तो वे पूरे जिले में
हायस्कूल करने वाले दूसरे व्यक्ति थे। पिताजी नाटकों में
भूमिका भी करते थे। मेरठ में कुमार आश्रम था, जहाँ दलितों को
शिक्षा दी जाती थी। लाला लाजपतराय ने शायद उसी के लिए (आश्रम)
बनवाया था। वैसे मेरी पढ़ाई शुरू नहीं हुई। मैं शहर की बस्ती
में पढ़ा। पर इन आश्रमों में पिताजी आते-जाते थे। मेरे भाई
बहुत पढ़ते थे। उपन्यास पढ़ने की प्रेरणा मुझे उनसे ही मिली।
एक बार मेरठ में बाबासाहब आंबेडकर का भाषण हुआ। मैं तो उस समय
बहुत छोटा था। उन्होंने हमारे सामने भाषण दिया। मेरठ से एक भीम
सैनिक अखबार निकलता था, जिसको पी.एस मौर्य नाम के व्यक्ति
निकालते थे। तो वह आदमी इतना गरीब था कि जिसकी मेरठ शहर में
घंटा घर के पास किराणे की दुकान थी। उसके अंदर थोड़ी-सी चेतना
जाग उठी। वह एक अख़बार निकलता था और उसे वह अच्छा चलाता था। जब
मैं लगभग छठवीं-सातवीं में पढ़ता था तो मैं उनके साथ गाँव जाता
था। वहाँ मुझे थोड़ी-सी राह मिली। मेरठ शहर में उपन्यास लिखने
की श्रृंखला बहुत पहले शुरू हो गई थी और ब्लिट्ज तो मैं पहले
से ही पढ़ता रहा। मेरे घर से बहुत दूर पुस्तकालय था, पर मैं
वहाँ शाम को नियमित रूप से जाता था।
मानस –
साहित्य और वाद परस्पर विरोधाभासी अवधारणा प्रतीत होते हैं।
ऐसे में दलितवादी साहित्य को आप कैसे सिद्ध करना चाहेंगे?
नैमिषराय जी - साहित्य और वाद परस्पर विरोधी अवधारणा हैं। आपकी
बात का मैं समर्थन करता हूँ अभी पिछले दस-बारह दिन पूर्व शवाजी
विश्वविद्यालय, कोल्हापुर में एम.ए. एम फिल के विद्यार्थियों
को संबोधित करते हुए मैंने कहा था कि मैं डॉ. आंबेडकर का
सम्मान करता हूँ लेकिन आंबेडकरवाद जैसी किसी अवधारणा में
विश्वास नहीं करता। मेरी राय में साहित्य को किसी भी वाद से
मुक्त करना चाहिए। वह दलित साहित्य क्यों न हो।
मानस –
क्या दलित लेखन राजनीतिक विचार का सांस्कृतिक क़दम नहीं है
?
नैमिषराय जी –
दलित साहित्य का उद्भव समता और सम्मान के आंदोलन के गर्भ से
हुआ है। यह बात सभी साहित्यकारों, समीक्षकों तथा कार्यकर्ताओं
को जाननी चाहिए। आरंभ से ही इसमें राजनैतिक विचार नहीं था। इस
मत या विचार की जाँच के लिए आप बहुत से दलित साहित्यकारों के
आलेख पढ़ सकते हैं, जिन्होंने स्वयं दलित राजनीतिज्ञों की दलित
साहित्य में भूमिका को नकारते हुए उनकी तीखी आलोचना की है।
मानस –
दलित लेखन या दलितवादी साहित्य में गाँधी या दलितों के पक्ष
में सक्रिय अन्य किसी नायकों को किस हद तक आप प्रवेश देना
चाहेंगे ?
नैमिषराय जी –
दलित लेखन में गाँधी या अन्य किसी भी ऐसे सक्रिय नायकों के
प्रवेश का स्वागत है, जिन्होंने जीवन के किसी मोड़ पर ईमानदारी
और प्रतिबद्धता से दलितों के पक्ष में उनके अस्तित्व को ध्यान
में रख कर कुछ कहा, लिखा या किया हो। दलित साहित्य में किसी का
प्रवेश निषेध नहीं है। कम से कम मैं तो सकारात्मक सोच को ही
मानता हूँ।
मानस –
इधर गैर दलित या सवर्ण भी दलित लेखन में आ रहे हैं, यह क्या
फैशन है ?
क्या यह भावुक श्रद्धा है
?
क्या यह भविष्य में सवर्णों को आप दलित लेखक मानेंगे, स्वीकार
सकेंगे ?
प्रेमचंद कितने दलित लेखक थे
?
नैमिषराय जी –
वह दिन और समय भी हमें याद है जब दलित साहित्य को गटर का
साहित्य कहा जाता था। उस पर अश्लीलता का आरोप भी सवर्ण
साहित्यकार, समीक्षक लगाते थे। फिर वह समय भी आ गया जब सवर्ण
कथाकार दलित साहित्य लिखने के लिए लालायित हैं। हालांकि इनमें
से कुछ मात्र दिखावटी हैं। कुछ नकाब लगाए हुए हैं और कुछ आपके
शब्दों में फैशन के रूप में ही आना चाहते हैं या आ रहे हैं।
सवर्ण अगर बेहतर लिख सकते हैं तो उन्हें दलित साहित्य में लेने
में कोई हर्ज नहीं है
?
प्रेमचंद देश में प्रथम साहित्यकार हैं, जिन्होंने दलितों की
पीडा़ को वाणी देने का प्रयास किया। हाँ, एक बात मैं यह भी
कहना चाहूँगा कि मैंने जो साहित्य पढ़ा है उसमें एक-दो चीजें
दर्शन में आती हैं
–
1. जब हम दलित साहित्य की बात करते हैं तो उसके साथ डॉ. बाबा
साहेब आंबेडकर का चिंतन और दलित साहित्य वह पहली मान्यता है।
2. भाग्य, भगवान आदि शब्दों का हम विश्वास नहीं करते। 3. इन
दलित पात्रों के ज़रिए इसका चित्रण करते हैं या नहीं। तीन
चीज़ें मैंने बताई। तीन चीज़ें गैर दलित लेखक साहित्यकार की
रचनाओं में लगभग नहीं है। मेरी यह भी मान्यता रही है कि अगर
दलित समाज का लेखक लिख रहा है और उसमें भी यह तीन चीज़ें नहीं
हैं तो वह भी दलित साहित्य नहीं है।
मानस –
फिर जो प्रेमचंद को लेकर विरोध हुआ, जगह-जगह... उनकी रचना जलाई
गई...
नैमिषराय जी –
प्रेमचंद की रचना जलाना सही बात नहीं है। मैं इसका पूरी तरह से
विरोधी रहा हूँ, क्योंकि रचना माने शाश्वत कैरेक्टर हर रचना
माने विचार, बात और उसे जलाना गलत बात है। उस पर बहस चला सकते
हैं। प्रेमचंद निश्चित रूप से मानवीय संवेदनाओं के कथाकार हैं
और उन्होंने हजारों बरस से मानव-मानव के बीच भेदभाव की दीवार
को गिराने का प्रयास साहित्य सर्जन से किया।
मानस –
इधर धर्मवीर, नए आलोचक हैं, वे तो कहते हैं कि प्रेमचंद
सामंतों के मुंशी हैं
?
आप क्या कहते हैं ?
नैमिषराय जी –
मानस - जी, धर्मवीर नई शत्ब्दी के दलित चिंतक हैं और धर्मवीर
तथा प्रेमचंद में 80-90 सालों का अंतराल है। एक 19वीं शताब्दी,
उसमें बहुत सी परंपराएँ दिखाई देती हैं और उससे गुज़रकर ये आए
और प्रेमचंद जी ने अपने समय में जो लिखा वह माने दलित चित्रण
किया। उसको हम कदापि पूरी तरह से अस्वीकार नहीं करते, उसको
स्वीकार करना ही चाहिए। लेकिन इसके बीच जो फांक रहा...
मानस –
आप मतभेद... की बात कर रहे हैं....?
नैमिषराय जी –
मतभेद तब आते हैं जब परिस्थितियाँ बदलती हैं, क्योंकि व्यक्ति
समाज में रहता है और समाज में नई तरह की स्थितियाँ आती रहती
हैं। सवाल यह है कि प्रेमचंद के अनुयायी या प्रेमचंद को आगे
बढ़ाने वाले मठाधीश, मठाधीश शब्द को इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूँ
कि प्रेमचंद जिनके पाठक, प्रशंसक, समीक्षक दिखाई देते हैं, वह
प्रेमचंद जी के अलावा दूसरे को स्वीकार नहीं करते या स्वीकार
करने की स्थिति में नहीं हैं। तो यहाँ पर नई तरह की बात करता
हूँ और दलित साहित्य आने लगा तो यह बात बार-बार दोहराई गई कि
प्रेमचंद जी पहले दलित साहित्यकार हैं। यह अपने आप में सही बात
है। प्रेमचंद पहले दलितोन्मुखी कथाकार हैं। जब तक कि प्रेमचंद
जी के पहले अगर मुझे अन्य लेखक नहीं मिलते। अगर शोध से
प्रेमचंद से पहले का लिखा हुआ मिलता है तो अगर वह प्रेमचंद से
बेहतर लिखा हुआ है तो मैं उसे मानूँगा, प्रेमचंद जी को नहीं
मानूँगा।
मानस –
राजेन्द्र यादव बार-बार कहते हैं कि दलित प्रेमचंद से अच्छा
लिखकर दिखाएँ... आप क्या सोचते हैं इस पर
?
नैमिषराय जी –
देखिए मानस - जी, आप स्वयं स्वीकारेंगे कि हमारे औसतन विचार
हमारी अपनी-अपनी जातियों, परिवारों, वर्गों और उनसे बने
संस्कारों से प्रभावित होते हैं। मैं भी अक्सर कहता हूँ कि
सवर्ण दलितों से अधिक अनुभव, पीड़ा, वेदना आधारित साहित्य
सर्जन करें। और दलितों से बेहतर दलित साहित्य लिखकर दिखलाएँ।
◙◙◙
|