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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कथोपकथन ।।

 

 

वे चाहें तो मेरा पद्मभूषण छीन लें गोपीचंद नारंग


अरुण आदित्य

 

वे साहित्य अकादेमी के संभवत: सबसे विवादित अध्यक्ष रहे हैं। विरोधी उन्हें मीडियाकर कहते हैं लेकिन अब तक अनेक पुस्तकें लिख चुके गोपीचंद नारंग मानते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में अकादेमी को नई गति और दिशा दी है। पद्मभूषण से सम्मानित नारंग ने बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी को भारी अंतर से हराकर साहित्यिक हलकों में सनसनी फैला दी थी। प्रस्तुत है कवि और पत्रकार अरुण आदित्य द्वारा लिया गया गरमागरम साक्षात्कार - सं.

 

-नारंग कहते हैं 'मेरे कार्यकाल में ही पहली बार भारतीय भाषाओं के सर्वश्रेष्ठ लेखकों को वृहत्तर सदस्यता दी गई, जिनमें विजयदान देथा, यू आर अनंतमूर्ति, शंख घोष, निर्मल वर्मा, अमृता प्रीतम, विष्णु प्रभाकर जैसे नाम शामिल हैं। इनमें वामपंथी भी हैं। मैंने जब कार्यभार संभाला तो केवल चीन से कल्चरल एक्सचेंज का कार्यक्रम था, जब मैंने छोड़ा तो क्स्त्र देशों से कल्चरल एक्सचेंज का रिश्ता बन चुका था।' -

शुरुआत बलूचिस्तान के उस पहाड़ी इलाके से करते हैं जहाँ आपका जन्म हुआ...

 

मेरा जन्म 11 फरवरी 1931 को बलूचिस्तान के पहाड़ी इलाके में हुआ। पिताजी स्व. धर्मचंद नारंग बलूचिस्तान सर्विस में अफसर-ए-खजाना थे। उनका तबादला हर तीन साल में हो जाता था। मेरी पैदाइश दुक्की में हुई लेकिन जब मैंने होश संभाला तो वह वूसाखैल आ चुके थे। यहीं चार-पाँच साल की उम्र में मैंने पढ़ना शुरू किया।

 

उस दौर की कुछ यादें...

 

बचपन की दो तीन यादें खास हैं। एक तो तहसील परिसर और वहाँ का बड़ी-बड़ी कीलें जड़ा हुआ लकड़ी का निहायत ऊँचा दरवाज़ा, जिसके अंदर बीचोबीच ख़जाने का बड़ा हॉल था। पूरी तहसील में टेलिफ़ोन सिर्फ़ पिता जी के पास था। यहीं अख़बार और रिसाले भी आते थे। यहीं से मुझे पढ़ने के संस्कार मिले। दूसरी याद है पठान सरदारों का जिरगा, जो दूसरे-तीसरे महीने होता था। इसमें अँगरेज़ पॉलिटिकल एजेंट हैट लगाए अपनी नीली फ़ोर्ड गाड़ी में आता था और थैलियाँ भर-भर कर रुपए वडेरों को दिए जाते थे। सैकड़ों पठान कंधे पर बंदूकें लटकाए पेड़ों के नीचे दरियाँ बिछाए जिरगा लगाते थे और अपने झगड़े निपटाते थे। तीसरी याद अपने घर के पिछवाड़े के बगीचे की है, जहाँ पॉलिटिकल एजेंट को ठहराया जाता था। निहायत हरा-भरा, अँगूर की बेलों से लदा।

 

अगर उर्दू को देवनागरी लिपि में लिखा जाए तो ...

 

ये सवाल अकसर दोहराया जाता है। भाषाएं या उनकी लिपियाँ किसी के बनाए या किसी के बदले नहीं बदला करती हैं, बल्कि सदियों का इतिहास उनको ये रूप देता है जो हमारे सामने है। भारत में बीस-बाइस भाषाएं बोली जाती हैं। हर प्रांत में दूसरे प्रांत की भाषाएं अल्पसंख्यक लोग बोलते हैं। सबकी लिपियाँ अलग-अलग हैं। बांग्ला, उड़िया, हिंदी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती, मराठी, सिंधी सब आर्य भाषाएं हैं। तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ द्रविड़ भाषाएं हैं। उत्तर भारत की आर्यभाषाओं की लिपियाँ अधिकतर देवनागरी का बदला हुआ रूप हैं। भाषाओं में बाहरी आदेश से कोई चीज़ नहीं बदला करती। जब गुजराती, मराठी, पंजाबी, बांगला सबको अपनी लिपि के बरतने का अधिकार है तो यह अधिकार उर्दू को भी मिलना चाहिए। मत भूलिए कि जिस लिपि में उर्दू लिखी जाती है वह अरबी-फारसी से ली गई लेकिन उर्दू आर्य भाषा है। इसकी ध्वनियों के लिए हमने अरबी लिपि को इतना बदल दिया कि कोई अरब या ईरानी उर्दू लिपि में एक पृष्ठ भी सही-सही नहीं पढ़ सकेगा, ऐसा मेरा दावा है। उर्दू लिपि में इतना परिवर्तन हुआ है कि हम उसे लिपि का भारतीयकरण कह सकते हैं। हिंदी में चूँकि पाठक वर्ग का दायरा बहुत फैला हुआ है। इनमें से बहुत से उर्दू के रसिक भी हैं, जो गालिब, फ़ैज, फिराक, कृष्णचंद्र बेदी, इस्मत चुगताई को देवनागरी में पढ़ना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में ये पाठकवर्ग की शक्ति, उसकी माँग और मार्केट की बात हुई। इसके कारण आज बहुत-सा उर्दू साहित्य बगैर किसी सरकारी दबाव के या बगैर किसी संस्था के आदेश के, अपने आप पाठक वर्ग की माँग पर देवनागरी में छप रहा है।

 

आप साहित्य अकादेमी से निवृत्त हो गए हैं लेकिन लोग कहते हैं कि अभी भी आप ही वहाँ के अघोषित अध्यक्ष हैं।

 

साहित्य अकादेमी का अपना संविधान है। उसके अनुसार हर पाँच साल में अध्यक्ष का चुनाव स्वतंत्र रूप से होता है। इस चुनाव में भारत की सभी भाषाओं के श्रेष्ठ लेखक सीक्रेट बैलेट से अपना मत देते हैं। पाँच साल पहले जब मैं चुना गया था तो तकरीबन दो तिहाई मत मुझे मिले थे और लगभग एक तिहाई महाश्वेता देवी को मिले थे। अध्यक्ष चुने जाने से पहले में पाँच साल तक उपाध्यक्ष रहा था। उस दौरान मैंने जमकर अकादेमी और सभी भाषाओं के लेखकों की सेवा की थी। मेरा काम देखकर ही लोगों ने मुझे चुना होगा।

 

कहा जाता है कि तब भाजपा ने आपकी मदद की थी।

 

सीक्रेट बैलेट में कोई राजनीतिक दल कैसे किसी की मदद कर सकता है।

 

उस समय अख़बारों में छपा था कि भाजपा नेता वेंकैया नायडू ने आपके पक्ष में वोट देने के लिए कोई अपील की थी।

 

बीजेपी की अपील पर वोट पड़ते तो इस बार सुनील गंगोपाध्याय कैसे जीत गए?

 

क्योंकि आप ने सुनील की मदद की...

 

सुनील गंगोपाध्याय और एमटी वासुदेवन नायर दोनों मेरे मित्र हैं। एमटी को हमने जनरल कौंसिल में लिया था क्योंकि उपाध्यक्ष जनरल कौंसिल से चुना जाता है। तीन महीने पहले ख़ुद एमटी ने कहा था कि वे उपाध्यक्ष रहना चाहेंगे और अध्यक्ष पद के लिए सुनील का समर्थन करेंगे। लेकिन बाद में ऐसा नहीं हुआ। दोनों ने मित्रों की तरह चुनाव लड़ा और सुनील चूंकि पाँच साल से उपाध्यक्ष थे, उनका संपर्क ज़्यादा जीवंत था, लिहाजा वो जीत गए।

 

नए अध्यक्ष आपसे सलाह तो लेते रहते होंगे?

 

अभी तक ऐसी कोई ज़रूरत पेश नहीं आई कि उन्हें मुझसे सलाह माँगने की नौबत आए।

 

ऐसी भाषाएं जिनमें कम लोग लिखते हैं, उनके लेखकों को जल्दी अकादेमी पुरस्कार मिल जाता है जबकि हिंदी में लिखने वालों की तादाद काफी अधिक होने के कारण अधिकांश लेखकों का नंबर बहुत देर से आता है और कुछ तो दिवंगत हो जाते हैं उनका नंबर ही नहीं आता। ऐसे में अकादमी को हिंदी के लिए कुछ विशेष प्रावधान नहीं रखना चाहिए?

 

हिंदी प्रांतों में मानक हिंदी के लिए विशेष बजट रखा जाना चाहिए। प्रांतीय स्तर की अकादमियों को सक्रिय किया जाना चाहिए। कई प्रांतीय अकादमियाँ साहित्य अकादेमी पुरस्कार से बड़ी राशि के पुरस्कार देती हैं। लेकिन लोगों में साहित्य अकादेमी पुरस्कार पाने की ललक रहती है, क्यों?

 

क्योंकि साहित्य अकादमी पुरस्कार की राशि भले ही कम हो, इसकी साख बड़ी है...

 

यहां ट्रांसपेरेंसी है इसलिए इसकी साख बड़ी है। प्रांतीय अकादमियों में राजनीतिक प्रभाव काफी रहता है, इसलिए उनके पुरस्कारों की वैसी साख नहीं बन पाती।

 

आप प्रांतीय अकादमियों की बात कर रहे हैं अशोक वाजपेयी जी तो साहित्य अकादेमी की गिरती साख को लेकर भी चिंतित हैं। उन्होंने अपने कालम में लिखा है कि अकादेमी के दो पूर्व अध्यक्षों गोपीचंद नारंग और रमाकांत रथ ने भारतीय साहित्य में किसी विशेष रुचि या गति का कोई प्रमाण कभी नहीं दिया...

 

अशोक जी एक बार साहित्य अकादेमी में हिंदी-संयोजक पद के लिए खड़े हुए थे। विष्णु प्रभाकर से हार गए थे। मैंने अकादेमी अध्यक्ष रहते हुए जो काम किया है वह सबके सामने है। मेरे कार्यकाल में ही पहली बार भारतीय भाषाओं के सर्वश्रेष्ठ लेखकों को वृहत्तर सदस्यता दी गई, जिनमें विजयदान देथा, यू आर अनंतमूर्ति, शंख घोष, निर्मल वर्मा, अमृता प्रीतम, विष्णु प्रभाकर, कर्तार सिंह दुग्गल जैसे नाम शामिल हैं। इनमें वामपंथी भी हैं। मैंने जब कार्यभार संभाला तो केवल चीन से कल्चरल एक्सचेंज का कार्यक्रम था, जब मैंने छोड़ा तो कई देशों से कल्चरल एक्सचेंज का रिश्ता बन चुका था। जब मैंने कार्यभार संभाला तो पुस्तकों की बिक्री का औसत त्त्स्त्र लाख सालाना था, मेरे कार्यकाल में यह फ् करोड़ सालाना से भी अधिक हो गया। अकादमी का पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर मैंने पहले से बेहतर हाल में छोड़ा है।

 

आपकी वेबसाइट पर टाइटल लिखा हुआ है: पद्मभूषण गोपी चंद नारंग। विरोधियों के लिए यह भी एक मौका है आप पर हमला करने के लिए। वो कहते हैं कि नाम के साथ पद्मभूषण को इस तरह जोड़ना...

 

उनसे कहो कि मेरा पद्मभूषण छीन लें। मेरी वेब साइट मैंने नहीं बनाई है। टेक्निकल एक्सपर्ट ने बनाई है। लोगों को आलोचना करने के लिए कुछ न कुछ मुद्दा चाहिए होता है।

 

मुझे लगा कि उनसे पूछूँ कि क्या इस तकनीकी त्रुटि को वे जल्दी ही ठीक करवा लेंगे। लेकिन मैंने पूछा नहीं। एक तो देर काफी हो चुकी थी और दूसरे मुझे यह भी लगा कि कुछ सवाल न पूछकर भी पूछ लिए जाते हैं। इसी अनपूछे सवाल के साथ हमने नारंग साहब से विदा ली। (अमर उजाला से साभार)

   अरुण आदित्य

अमर उजाला, नोएडा,

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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