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एस.आर.हरनोट
की कहानी
माँ
पढ़ती है
पूर्वांश...
पहली पुस्तक हाथ में लेता
हूँ।
उसे उलटता-पलटता
हूँ।
उसके भीतर पृष्ठों में जगह-जगह घास के तिनके और कुम्बर फंसे
हैं। पतझड़ का मौसम कमरे में समाने लगता है। सोचता
हूँ
कि
माँ
जब घास काटने घासणी में जाती होंगी तो
वहाँ
बैठकर उसके पन्नों को उल्टा-पल्टा करती होंगी। दूसरी पुस्तक
उठाता
हूँ।
उसे देखने लगता
हूँ।
उसके पन्नों से सरसों के फूलों की भीनी-भीनी खुशबू आने लगती
है।.......पन्नों को उलटता-पलटता
हूँ......कई
जगह नन्हें पीले फूलों की पंखुरियाँ
चिपकी हैं.....एक-आध गेहूँ
की बाली भी है। मेरा मन बसन्त हो जाता है।.........माँ
जब खेतों में साग चुगने जाती होंगी तो बैठ कर पहले बीड़ी
सुलगाकर अपनी थकान मिटाती होंगी और उसके बाद किताब के वर्कों
को देखती-बदलती रहती होंगी।
अब तीसरी किताब हाथ में लेता
हूँ।
यह मेरा उपन्यास है। उसके भीतर से रात की रानी की खुशबू आ रही
है और कमरे में फैलने लगी है। अनायास ही
नज़र आँगन
के उस पार चली जाती है।
वहाँ
रात की रानी का पौधा है। कितना बड़ा हो गया है। उसकी टहनियाँ
चारों
तरफ़
बिखरी हैं। मन बहुत पीछे चला जाता है। गर्मियों की रातें जब चाँदनी
से नहाई होती तो
माँ
अक्सर मुझे गोदी में लिए
यहाँ
बैठा करती। कई कहानियाँ
सुनाती।........किताब के पृष्ठों के बीच रात की रानी के फूल
पड़े हैं।
.....
माँ इस किताब को चांदनी रातों में वहाँ बैठकर देखा करती होंगी।
चौथी पुस्तक में आटे और लस्सी की सुगन्ध रची-बसी है। पृष्ठों
पर जगह-जगह आटे सने हाथों की उँगलियों
के निशान हैं। कहीं-कहीं मक्खन की चिल्हट ने अक्षरों को मिटा
दिया है।.......माँ
रोटियां पकाते या फिर दूध बिलोते इसे निहारती-अवलोकती रहती
होंगी।
पाँचवीं
कृति अब मेरे हाथ में हैं। उसके पन्नों से घने अन्धेरे की गंध
आने लगती है। उसमें बीड़ी की बास घुल-मिल गई है। पुस्तक के
वर्कों को देखता -पलटता
हूँ।
कई जगह अक्षर धुल गए हैं। बीच-बीच में जली हुई बीड़ी की राख भी
लगी है। एक जगह मरा हुआ जुगनू चिपक गया है।......शायद
उसे माँ घनी रात को बिस्तर पर हाथ में लिए वाँचती होगी॥ मेरी
याद आने पर रो लेती होंगी और फिर देर रात तक यूँ ही बैठी बीड़ी
पीती रहती होंगी।
अब छठी पुस्तक सिरहाने के नीचे से खींचता
हूँ।
मन अस्थिर होने लगा है। भीतर बौखलाहट होने लगी है। माथे से
पसीना चू रहा है। उस किताब के भीतर पिता की कई पुरानी तस्वीरें
हैं। उनमें कहीं
माँ
हैं तो कहीं मैं
हूँ।........माँ
अपने इस लेखक बेटे के वैभव और उत्कर्ष को पिता के साथ
स्मृतियों में बाँट लिया करती होंगी।
उसे किनारे रख कर सिरहाने में फिर कुछ ढूँढने
लगता
हूँ।
बिस्तर की तहों में एक और किताब मिलती है। उसे निकालता
हूँ।
वह सातवीं पुस्तक हैं। देखता
हूँ
तो आश्चर्य की सीमा नहीं रहती। यह नयी किताब है जिसका विमोचन
सप्ताह पूर्व ही हुआ है। उसके वर्कों से गोबर की गन्ध आ रही
है। बाहर-भीतर कई जगह गोबर सने हाथों के निशान पड़े हैं। एक दो
जगह भेड़ क़ी सफेद ऊन के रेशे भी चिपके हैं।.......माँ
उसे गोशाला के आँगन में पशुओं के बीच बैठ कर देख लिया करती
होंगी।
·
आँखों
से आसुओं की झड़ी लग गई हैं। याद नहीं आता कि अपने जीवन में कभी
इतना रोया होऊँ।
मेरे भीतर का समस्त वैभव,
उत्कर्ष, बड़े
बने रहने का दंभ, बूंद-बूंद
माँ
के बिस्तर पर झरने लगा है। मैं जैसे उस बिस्तर की तहों में
खटमल की तरह घुसता-धँसता
चला जा रहा
हूँ।
मेरा रोंआ-रोंआ
अचरज और शर्मिदंगी से भर गया है। सिर टाँगों
के बीच धँसता
जा रहा है। इस दीनता-हीनता की स्थिति के बावजूद उस रोने का कोई
सुख मुझे अधिक गिरने नहीं देता। ऐसा लगने लगता है कि
माँ
के कमरे की वे सभी
चीज़ें
मेरे अंतस में अगाध स्नेह और ममता का सागर उड़ेलती चली जा रही
हो। सामान्य और सहज होने में मेरी भरपूर मदद करती चली जा रही
हो। मैं अपने को संभालता
हूँ।
अचरज होता है कि मन अब हल्का हो गया है। बिल्कुल उसी तरह जैसे
बचपन में किसी जिद में रोते-रोते
माँ
की गोद में सो जाया करता और जब उठता तो बिल्कुल सहज होता।
तभी
किसी की आवाज़ भीतर
के सन्नाटे को तोड़ देती है।
''
दादी! दादी! ......अख़बार...।''
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एस. आर. हरनोट,
ओम भवन,
मोरले बैंक इस्टेट,
निगम विहार,
शिमला-171002
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