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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। कहानी ।।

 

 

माँ पढ़ती है


एस.आर.हरनोट

ई महीनों बाद गाँव आया हूँ माँ वहाँ अकेली रहती है। आज घर का दरवाज़ा खुला है। वरना ऐन तड़के दरवाज़ा ओट कर माँ बाहर का काम निपटाने चली जाती है। सुबह का सारा व़क्त गोशाला में बीतता है। पशुओं को घास-पत्ती देते। गाय दूहते। गोबर फेंकते।

 

इस समय भी माँ भीतर नहीं हैं। मैं उनके कमरे में चला आया हूँ। सूरज निकलते ही पहली किरन उनके कमरे में पड़ती है। आज किरनों के साथ मैं हूँ। कमरा जितना अपना लगता है उतना ही अकेला भी है। तरह-तरह की चीज़ों से भरा हुआ। उसी तरह जैसे उजास भीतर भर जाया करता है। ऊपर लकड़ी की छत में जगह-जगह मकड़ी के जाले हैं। नीचे की ओर झूलते। उनमें कई मरी हुई मक्खिया उलझी-फसी है। यही हाल दीवारों का भी है। कई जगह जालों पर कीरा जमा हुआ है।

 

जगह-जगह सामान बिखरा पड़ा है। एक भी चीज़ तरतीब से नहीं है। दरवाज़े से भीतर आते दाईं ओर दूध बिलाने का घड़ा रखा है। और उस पर एक मैला-सा कपड़ा है। माँ जब चूल्हें के पास से दूध बिला के फारिग होती हैं तो इसे यहाँ ले आती है। बांई तरफ़ एक टोकरा है। उसमें भेड़ की अनकती ऊन भरी है। उसकी तहों के ऊपर कुछ थींगे हुए ऊन के फाहे हैं। एक किनारे तकली रखी है। एक कोने में खजूर की पत्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। बीच में कई बुनी हुई खजूर की पट्टिया हैं। दूसरे कोने में छोटी-सी पुरानी मेज। उस पर टेलीवीजन रखा है। सिरहाने के साथ मैले से कपड़े में ढका एक कनस्तर जिस पर टेलीफ़ून है। बिजली के बल्ब का रंग बदरंग हो गया है। उस पर कीरे ने पूरी तरह अधिकार जमा लिया है। उसका रंग बदरंग हो गया है।

 

माँ के सिरहाने ऊपर की ओर भीत पर एक कील में लकड़ी का चकौटा टंगा है। उस पर ढिबरी रखी है। छत तक धुए ने एक लम्बी लकीर बना दी है। बिजली चली जाने पर माँ इसे जला लिया करती होंगी। कमरे में बीड़ी की बास पसरी है। चारपाई के नीचे देखता हूँ तो वहाँ भी कई-कुछ चीज़ें बिखरी हैं। अधबुझी बीड़ी के टुकड़े। दियासिलाई की जली तिल्लिया। एक खजूर के पटड़े पर सूखा अनारदाना। कुछ आंवले। आठ-दस अखरोट। पाच अनछीली पकी हुई मक्किया। एक दूसरे में उनके सिरे एक डोरी से बन्धे हैं। नई फसल की मक्किया देवता के लिए रखी होगी। दो-चार गठड़ियां जिनमें कई किस्म की दालें हैं। .......इतनी चीज़ें माँ के साथ रहती हैं। उनसे जुड़ी हैं। उनकी साथी-संगी हैं। लेकिन मैं इन सब के बीच उस कमरे में पखला सा अकेला बैठा हूँ। वे जैसे मुझे पहचानने का प्रयास कर रही हों। कभी लगता है कि वे सभी मेरा उपहास उड़ा रही हों।

 

माँ....घर.....आँगन....द्वार......खेत.....खलिहान.....ज़मीन.....जायदाद.....सब मेरे ह पर मैं आज इनसे कितना दूर चला गया हूँ.......?

 

सूरज घर की छत के कोने से कुछ आगे सरक गया है। किरणें सिमटती हुई आँगन में चली गई हैं। कमरे के उजाले को अपने साथ लेती हुई....सुबह की बेला में ही अंधकार का एहसास होने लगा है। यह अंधेरा बाहर से कहीं ज़्यादा मेरे भीतर पसरा है। हालाकि मैं माँ के कमरे में हूँ। उनके बिस्तर पर बैठा स्नेह की गंध में भीग गया हू, लेकिन बरसों घर से बाहर रहने का एहसास उस स्नेह को मन तक नहीं पहुचने देता।

 

याद ही नहीं रहा कि मेरे हाथों में किताबों का एक पैकिट भी है। इन नई पुस्तकों को मैं माँ को भेंट करने लाया हूँ। आज तक एक भी पुस्तक छपने के बाद उन्हें नहीं दे पाया। न ही उन्हें कभी पुस्तक विमोचन समारोहों में ही बुला पाया। जब भी कोई किताब आयी है मैंने उसे राज्यपाल या मुख्यमन्त्री से ही रलीज करवाया है। यह जानते हुए भी कि उन लोगों का साहित्य से कुछ लेना-देना नहीं। बिल्कुल उसी तरह जैसे मंचों से गरीबी हटाने के नारे लगाने वालों का गरीबों से कोई लेना देना नहीं होता। क़ागजों पर गाँव और उसके परिवेश की सौंधी खुशबू बिखेरने वाले हम लेखकों का जैसे वहाँ की गोबर-मिट्टी से कोई वास्ता नहीं होता। यानी पल भर के लिए एक औपचारिक-सा छलावा। एक दिखावा भर। इससे ज़्यादा और कुछ नहीं।

 · 

 

ऐसा भी न था कि माँ को बुलाना नहीं चाहता था या उनकी यादें उस समय मेरे साथ न होतीं। लेकिन कई डर मन में घर किए रहते। सोचा करता कि आज का माहौल बिल्कुल अलग तरह का है। माँ कैसे इन बड़े लोगों के बीच अपने को एडजैस्ट कर पाएगी।

 

सबसे पहले तो उनका बस में बैठना ही किसी मुसीबत से कम नहीं। बैठते ही उनकी तबीयत खराब हो जाएगी। उल्टिया करने लगेगीं। थोड़ा आराम मिलेगा तो महज कनखियों से अधर-उधर देख झटपट जेब से बीड़ी-माचिस निकाल लेगी और शॉल की ओट में झटपट सुलगा कर पीने लग जाएगी। एक दो दम लेते ही खासी ऐसे शुरू होगी कि प्राण अभी गए कि अभी।

 

जैसे-कैसे समारोह में पहुचेगीं तो लोगों की नज़रें उन पर बराबर लगी रहेंगी। बिना प्रस किए कपड़े, प्लास्टिक के जूते उपहास का सबब बनने लगेंगे। फिर उनके मुँह से बीड़ी की बास आती रहेगी। उनके बाल भी ठीक तरह से नहीं होंगे। हालाकि शॉल सिर पर ओढ़ी होंगी पर काले-सफेद बालों की आपस में उलझी लड़िया नीचे तक लटकी दिखाई देती रहेंगी। उनमें घास के तिनके और सूखी पत्तियाँ सी नज़र आएंगी हीं। जैसे ही लोगों को मालूम होगा कि मेरी माँ आई हैं तो वे बार-बार उनके पास बधाई देने जाएगे। उनसे बातें करना चाहेंगे। कई कुछ पूछने लगेंगे। लेखक और पत्रकार बन्धु तो अपनी जिज्ञासु बातों से माँ को कुरेदेंगे भी। फिर पता नहीं माँ उनसे किस तरह बतियाएगी। क्या-कुछ उल्टा-सीधा बोल देंगी। बातें करते-करते उन्हें खाँसी आ गई तो सब कुछ किरकिरा जाएगा। और अगर कहीं उन्हें बीड़ी की तलब हो आई तो झट से सुलगा कर वहीं पीनी शुरू कर देंगी।....... जलपान शुरू होगा तो छुरी-काटे से तो माँ खा नहीं सकेगी। खाएगी भी तो सभी का ध्यान उनके हाथों पर अवश्य जाएगा। गाँव में घास पत्ती काटते, गोबर फैंकते, दूध बिलोते, लकड़ियां काटते, चूल्हें में रोटी सेंकते, हाथ बवाईयों से भरे होंगे.....उनसे गोबर-मिट्टी की बास आएगी.....भले ही लोग मुँह पर कुछ न बोलें पर बाते तो बनाएगे ही.....कि इतने बड़े लेखक की माँ ऐसी है। निपट गंवार...। यह सब कुछ सहन भी कर लूंगा फिर बच्चों की खरी-खोटी सुनने पड़ेगी।

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इन स्मृतियों में खोए-खोए माँ के बिस्तर पर लेट जाता हूँ। ऐसा लगता है कि मेरा बचपन लौट आया है। उस चारपाई पर मुझे यू लगने लगा है जैसे माँ की गोदी में सोया हूँ।.......पलने में माँ मुझे झुला रही है.....यह सुख और स्नेह बरसों बाद मिला है। मन कर रहा है कि यहीं सोया रहूँ......कभी उठू ही नहीं।

 

अपने ऊपर आश्चर्य हो रहा है कि मेरी रचनाओं में गाँव हैं, वहाँ का पूरा अंचल है। गरीब लोग हैं। खेत-खलिहान हैं। माँ हैं। उनका स्नेह हैं....लेकिन उन वास्तविकताओं से ख़ुद कितना दूर चला गया हूँ....कोसों दूर...। माँ के बिस्तर पर लेटा अपने भीतर के लेखक को ढूढने लगता हूँ....पर वह कहीं नहीं हैं। उसके कई चेहरे हैं। या उन चेहरों पर कई तरह के मुखौटों की तहें चिपकी पड़ी है । अपने को उस शहरी परिवेश और अलीट सोसाईटी में ऊचा दिखाई देने के लिए। नाम, प्रतिष्ठा कमाने के लिए......लोगों की वाह....वाह लूटने के लिए......पर उस उत्कर्ष का सही मायनों में मेरे भीतर के आदमी से जैसे कोई सम्बन्ध ही न रहा हो। अनायास फिर एक ओर रखी अपनी किताबों पर हाथ जाता है। उनका स्पर्श पुन: उसी उत्कर्ष पर ले जाता है। क्या हुआ माँ को नहीं बुलाया तो.....? चलता है, सब कुछ चलता है। हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं, फिर क्यों उन रूढ़ियों का बोझ अपने कन्धो पर ढोए चलें। गाँव-पहाड़, गोबर-मिट्टी, खेत-खलिहान क़ागजों की पीठ पर उगते अच्छे लगते हैं, पर वास्तविक जीवन में तो नरक हैं...नरक....?......फिर मैं तो माँ का सम्मान करने ही आया हूँ, इधर तो ऐसे भी लेखक हैं जो या तो माँ-बाप से अलग हो गए हैं या उन्होंने उन्हें किसी वृध्दाश्रम के हवाले कर दिया है।...मैं माँ के चरणों में इन पुस्तकों को रख कर उनसे आशीर्वाद लूगा....पश्चाताप करूगा......वे खुश होंगी कि उनका बेटा कितना बड़ा आदमी बन गया है। लेखक है।...वे पुस्तकें जैसे मेरे अंह को और भी भव्य बनाए जा रही ह

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यही सब सोचते-विचारते सहसा माँ के सिरहाने पर हाथ जाता है। कुछ चुभता हुआ सा महसूस होता है। मैं लेटे-लेटे दाया हाथ पीछे करके सिरहाने के नीचे डालता हूँ। चौंक जाता हूँ। हड़बड़ी में उठता हूँ और सिरहाने को एक तरफ़ हटा देता हूँ। कोई किताब है। बाहर खींचता हूँ तो स्तब्ध रह जाता हूँ। आखें उसके आवरण पर धसती चली जाती है। मेरी सास रुकने लगी है। जिस्म का सारा खून जैसे शिराओं में जम गया है।.....यह मेरी ही नई पुस्तक है। पागलों की तरह सिरहाने की तरफ़ के खिंदड़ों की तहों को हटाता हूँ और उसके नीचे पड़ी सभी किताबों को बाहर खींच लेता हूँ........सभी मेरी हैं।....भ्रम होता है कि कहीं अतीत में विचरते हुए कहीं मैंने ही अपना पैकिट वहाँ तो नहीं रख दिया था। पर वह पूर्ववत था। मेरे ही पास पड़ा हुआ। उसे खोलता हूँ। जो पुस्तकें मैं लाया हूँ वे सभी उसी में हैं। माँ के सिरहाने तो उसकी दूसरी प्रतिया हैं। (आगे.....) 

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