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तरकीब
तेजेन्द्र शर्मा
"तुम मुझे तलाक़ क्यों नहीं दे देते?....
अब हम दोनों के बीच बचा ही क्या है?... मैं तुम्हारी बेहूदगियाँ अब और बरदाश्त नहीं कर सकती
!"
समीना के यह शब्द अदनान के दिमाग़ पर लगातार बजते जा रहे थे।
उसकी हर बात सह लेने वाली समीना में इतनी हिम्मत कहाँ से आ गयी? वैसे यह सच भी था कि अब समीना और उसके सम्बन्धों में कोई गरमी
नहीं बची थी। वैसे कहने को इसी साल जनवरी में दोनों ने अपने
निकाह की रजत जयंती मनाई थी।.... पच्चीस वर्ष इकट्ठे बिताने के
बाद ... लगता है सब कुछ अचानक बिखर गया है।
लेकिन क्या सचमुच अचानक बिखरा है सब!
.... नहीं... ज़रूर ही यह प्रक्रिया बहुत पहले से शुरू हो गई
होगी। ... दरअसल समीना पहले कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करती
थी –
आँसू, हिचकियाँ, सुबकना... बस यही उसका जीवन था।... फिर अचानक
ये क्या हो गया? सब कुछ कैसे बदल गया?
अदनान जानता है कि लंदन में तलाक़ का अर्थ होगा कि समीना को
तगड़ा मुआवज़ा देना होगा। यह घर, दूसरी प्रॉपर्टी, कारें, बैंक
बैलेंस – इस सब में से समीना को उसका हिस्सा देना होगा।.... जब रिश्ते
में कुछ बचा ही नहीं तो क्यों अपने गाढ़े पसीने की कमाई समीना
को दे दे?.... निकाह के व़क्त तो काज़ी साहब ने सिर्फ़ पच्चीस हज़ार
रुपये की बात कही थी,
"अदनान
रिज़वी, तुम्हारा निकाह समीना ज़ैदी वल्द आफ़ताब ज़ैदी के साथ
सिक्का ए मुल्क पच्चीस हज़ार रुपये में तय हुआ है। क्या
तुम्हें यह निकाह मंज़ूर है?
....हाँ कहते वक्त उसने कहाँ सोचा था कि यह पच्चीस हज़ार रुपये
एक विकराल रूप धरने वाले हैं। पच्चीस ह़ार रुपये में तो उस
मर्सिडीज़ कार के टायर भी नहीं आते जो उसे समीना को देनी
पड़ेगी।
समीना के पास भी अपने पति की यादों का जो ख़ज़ाना है उसमें
सिवाय ज़िल्लत, रुसवाई, क्रूरता और गालियों के कुछ भी तो नहीं।
हाँ केक पर आइसिंग के तौर पर चार पाँच बार लगे थप्पड़ ज़रूर
हैं।
समीना समझ चुकी है कि अदनान एक
'कंट्रोल
फ़्रीक'
है। वैसे अदनान का अपना बिज़नेस है
–
बिल्डर है वह। लोगों के घर बनाता है.... पर अपना घर आज तक बसा
नहीं पाया!
समीना को भारत जा कर ब्याह लाया था। ख़ुद लाहौर का रहने वाला।
उसने समीना की फ़ोटो देखी तो पंजाबी मन से एक ही आवाज़ निकली,
"ऐहो
कुड़ी लैणी है।..
" धुन का पक्का अदनान, उम्र में समीना से दस बारह साल बड़ा
– लेकिन चाहिये तो बस चाहिये!
जैसे किसी बच्चे को किसी भी खिलौने में बहुत कम समय तक रुचि
रहती है, फिर उसे एक नये खिलौने की तलाश की तलब होने लगती है।
अदनान का दिल भी समीना के दो बच्चों और तीन गर्भपातों के बाद
उससे भर गया। बीवी तो रोज़-रोज़ बदल नहीं सकता था। अब उसकी
सेक्रेटरी हर दो तीन सालों में बदल जाती। शनिवार रात का खाना
वो हमेशा अपनी सेक्रेटरी के साथ ही खाता।... कुछ रातें ऐसी भी
होतीं, जब भोजन के बाद वह सो भी वहीं जाता। .... समीना की
जवानी अपना निरादर सहती रहती और अदनान के दोनों बच्चों को
पालती रहती।
अपने बच्चों के लालन पालन में वैसे अदनान का परोक्ष हाथ अवश्य
था। हाथ कहाँ था ?
बस पैसा था। शायद बेटी हुमा को तो उसने दो एक बार गोद में उठा
भी लिया हो, लेकिन बेटा फ़रहान तो अपने अब्बू की तरफ़ जब भी
देखता है उसे सिवाय डाँट, फटकार और मार के अतिरिक्त कुछ और याद
नहीं आता। उसे बाल सुलभ ज़िद करने का हक़ भी कभी नहीं दिया
गया, "मैं
बिरयानी नहीं खाऊँगा। मेरा मन आज दाल चावल खाने का है। .. मैं
बस दाल चावल खाऊँगा।"
"राजा
बेटे, आज अब्बू ने ख़ास तौर पर मटन बिरयानी बनवाई है। आज खा
लो।... कल तुम्हारे लिये दाल चावल बनवा देंगे।" समीना का प्यार उमड़ा अपने पुत्र के लिये।
"नहीं,
नहीं, हम तो व्हाईट वाले चावल और दाल ही खायेंगे। आप अब्बू से
कहिये कि बिरयानी कल खा लें।" फ़रहान ज़िद पर अड़ गया। सफ़ेद चावल अचानक बालक फ़रहान के
लिये पूरे चाँद जैसा खिलौना बन गये थे। बालहठ के सामने माँ
कौशल्या क्या करे!
फ़रहान की रंगीन बिरयानी में कोई रूचि नहीं थी। ... अब्बू
चुपचाप अपनी प्लेट में बिरयानी और सालन डाल रहे थे लेकिन उनका
ध्यान फ़रहान और समीना की बहस में ही अटका हआ था। शायद कोशिश
कर रहे थे कि अपने आपको इनर्ट दिखा सकें।
अचानक फ़रहान ने डाइनिंग टेबल पर ज़ोर का हाथ मारा और
चिल्लाया,
"हम
खाना नहीं खायेंगे!...
बस हमें दाल चावल ही चाहिये।"
"तड़ाक!
"
एक ज़न्नाटेदार थप्पड़ फ़रहान की बाँयी गाल से टकराया!
समीना भौंचक थी। फ़रहान सहमा और चिल्लाया, दर्द के मारे
बिलबिलाया।
"हरामज़ादे!
ज़िद करता है?
तू क्या किसी हिन्दू की औलाद है जो दाल चावल खायेगा?
मुसलमान बच्चा है – गोश्त खा, बिरयानी खा। ... पता नहीं किसकी औलाद है। तुम्हारी
माँ के कैरेक्टर का भी तो कोई भरोसा नहीं। न जाने किस किस के
साथ दोस्तियाँ रही हैं मेम साब की!"
समीना तड़प कर रह गई। क्षुब्ध आँखों से पति की ओर देखा।
ग़ुस्सा चाहे किसी पर हो उँगलियाँ समीना के चरित्र पर उठ जाती
हैं।... प्लेटें समेटीं, और फ़रहान को साथ ले उसके कमरे में ले
गई। अदनान अकेले बैठे बिरयानी का आनंद लेते रहे। जूठी प्लेटें
डाइनिंग टेबल पर छोड़ कर रसोई में गये, मर्तबान से गुड़
निकाला, मुँह में डाला और अपने सोने के कमरे में चले गये।
... पिछले पच्चीस सालों से समीना एक ही तो काम करती आई है
– अदनान के कारनामों पर हैरान होती रही है। यह हैरानी अलग
क़िस्म की है। सोच रही है कि कैसा इन्सान है उसका पति। इन्सान
है भी या नहीं। क्या कोई अपने छोटे से पुत्र को सिर्फ़ इसलिये
थप्पड़ मार सकता है क्योंकि उसको दाल चावल खाने हैं?
वो उठ कर किचन में गई दाल चावल बनाने लगी। उबलती हुई दाल में
से पीले रंग का पानी बह कर गैस के चूल्हे पर फैल गया। समीना ने
पेपर टॉवल उठाया और गैस को पोंछना शुरू कर दिया। मन में एक
इच्छा उठ रही थी कि ठीक इसी तरह अपने जीवन में से अदनान के
वजूद के निशान भी मिटा दे। अपनी ज़िन्दगी एक बार फिर शुरू
करे...। लेकिन जीवन की क़िताब को रबर से मिटा कर दोबारा लिख
पाना कहाँ संभव है?
राईस कुकर में सफ़ेद रंग के चावल तैयार हो रहे हैं। दाल चावल
बनने में करीब पच्चीस मिनट लगे। आज पच्चीस साल हो गये। सोचती
है कि अदनान ने उसे जीवन में क्या नहीं दिया। एक घर दिया, दो
बच्चे, पैसे, ऐशो आराम, हवाई जहाज़ की सैर, मर्सीडीज़ गाड़ी
दी। लेकिन इस सब के बावजूद वह ख़ुश क्यों नहीं है?
दरअसल बात वही है
–
यह सब चीज़ें उसे प्यार या प्रेम के वशीभूत हो कर नहीं दी
गयीं। अदनान जब कभी कोई चीज़ समीना को ले कर देता है तो चाहता
है कि नौकरों की ही तरह समीना भी अहसानमन्द महसूस करे, अदनान
के पाँव दबाए। समीना उसके लिये सिर्फ़ एक औरत थी। पत्नी क्या
होती है, शायद अदनान ने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं। वह बस
एक ही बात समझता था कि पत्नी का काम है घर की देखभाल करना,
बच्चे पैदा करना, बच्चों की देखभाल करना, बिस्तर में पति को
सुख देना और हमेशा अपने पति का अहसानमंद रहना कि वो उसका ध्यान
रखता है। वह स्थूल बातों को महत्व देता था, सूक्ष्म की न तो
उसको पहचान थी न समझ।
दाल चावल बन गये। वह प्लेट में डाल कर कमरे में पहुँची। तब तक
फ़रहान रोते-रोते, हिचकियाँ भरते सो गया था। आज फिर उसे छोटे
बेडरूम में अकेले सोना पड़ेगा। जब तक घर के मालिक अदनान साहब
समीना से नाराज़ रहेंगे तब तक उसे अपनी ख़्वाबगाह में दाखिला
नहीं देंगे। ... दो तीन दिन अबोला चलेगा। फिर समीना माफ़ी
माँगेगी। फिर बड़ी फ़राख़दिली से बादशाह सलामत समीना को माफ़
कर देंगे। तब कहीं जा कर वापस बड़े पलंग पर सोना नसीब हो
पायेगा।... आज समीना सोच रही है कि आख़िर क्यों वह बादशाह
सलामत के कमरे में वापस जाने को लालायित रहती है। पाँच साल हो
गये दोनों को एक ही बिस्तर पर सोने के बावजूद हमबिस्तर हुए।
अदनान के मन में अब समीना को देख कर कुछ नहीं होता। बल्कि यदि
उसे सेक्स की उत्तेजना भी हो रही हो तो समीना को देखते ही
ठण्डी पड़ जाती है।
समीना को अपनी सुहागरात की दरिंदगी और वहशीपन आज तक याद है।
अदनान की रुचि बस इस बात में थी कि वह इस बात की पुष्टि करले
कि समीना कुँवारी है
–
वह बस सफ़ेद चादर पर लहू के निशान देख कर अपने पौरुष को
संतुष्ट कर लेना चाहता था। उसे इस बात का ज़रा भी ध्यान नहीं
था कि उससे दस बारह साल छोटी लड़की संभोग के लिये तैयार है कि
नहीं। उसको हमेशा यही बताया गया था, समझाया गया था कि औरत का
काम है मर्द को बिस्तर में सुख देना। यह कहीं भी न तो लिखा गया
था और न ही वह जानता था कि मर्द के लिये भी औरत को सुख देना
कितना ज़रूरी है। समीना का जिस्म अभी गर्म भी नहीं हो पाता था
कि अदनान अपने आप को संतुष्ट करके गहरी नींद के गोते लगाने
लगता। जिस समाज में उसका लालन पालन हुआ था वहाँ यह नहीं बताया
जाता था कि औरत को भी संभोग में ऑरगैज़्म होता है। जिन मौलवी
साहब की हर बात अदनान के लिये पत्थर की लकीर होती थी, यह बात
शायद उनको भी नहीं मालूम होगी। अन्यथा वे अवश्य ही अदनान को यह
बात समझा देते। उनकी अपनी पत्नी सात बच्चे जनने के बाद नहीं
जानती कि महिला ऑरगैज़्म क्या होता है।
समीना को एक बार इस सुख की पराकाष्ठा का अहसास अन्जाने में हो
गया। वह बेचारी अब प्रतीक्षा करती रहती कि कभी उस प्रकार की
अनुभूति संभोग के दौरान हो जाये। किन्तु न यह होना था और न ही
हुआ। जब अदनान का उद्देश्य केवल स्वयं को सुख पहुँचाना था तो
भला वह समीना को सुख कैसे देता। समीना का जीवन अब एक ऐसे मोड़
पर पहुँच गया था जहाँ उसे अपने साथी से अपेक्षा रहती थी कि वह
उसके नख़रे उठाये, उससे बातचीत करे। अदनान और उसके बीच की
बातचीत तभी शुरू होती जब अदनान चाहता और उतनी ही देर चलती जब
तक अदनान चाहता। ऊँचे सुर में डाँट कब शुरू हो जायेगी, इस बात
का अन्दाज़ लगाना आसान नहीं।
अदनान को अपने बचपन में पढ़ने लिखने का शौक कभी नहीं रहा था।
... फिर भला बच्चों की पढ़ाई में उसे क्या रुचि होती। यदि
कभी-कभार फ़रहान अपनी पढ़ाई के बारे में कोई बात पूछ भी लेता
तो अदनान उबासियाँ लेने लगता,
"साहबज़ादे,
यह जो तुम्हारी अम्मी साहिबा हैं न, इन्होंने कॉलेज और
यूनिवर्सिटी की डिग्री ले रखी है।... अब पता नहीं पढ़ाई लिखाई
की है या बस डिग्री ख़रीदी हुई है!...
हे..हे...हे....भाई मेरे, आप पढ़ाई की बातें इनसे ही पूछा
करिये।.... देखो मियां, हम हैं ईंट ग़ारे वाले इन्सान.... हमने
इन्हीं चीज़ों में ऑनर्स की है.... हा.. हा..हा...
"
और बस, अदनान एक खोखली-सी हँसी हँस देता। बात चाहे किसी की भी
हो कटाक्ष बेचारी समीना पर ही होता।
वैसे अदनान दिन-ब-दिन मज़हबी होता जा रहा है। इलाक़े के इमाम
साहब से भी दोस्ती गढ़ ली है। जुम्मे की नमाज़ के बाद इमाम
साहब के साथ गुफ़्तगू भी चलती रहती है। कुछ अरसे के लिये तो
अदनान ने बिना मूँछ वाली बेतरतीब दाढ़ी भी बढ़ा ली थी। ... कुछ
दोस्त तो मज़ाक तक उड़ाने लगे थे।.... अचानक उसने महसूस किया
कि दाढ़ी बढ़ाने के बाद से केवल मुसलमान लोग ही उससे काम
करवाते हैं। अँगरेज़ और दूसरी जातियों के लोग उससे कन्नी काटने
लगे हैं। और फिर आ गया 11 सितम्बर
– अब तो पुलिस हर दूसरे दिन उसे सड़क पर रोक कर चेकिंग करने
लगी। इमाम साहब ने हौसला बढ़ाया,
"देखिये
अदनान मियां, इन्सान का इम्तहान तो मुश्किल हालात में ही होता
है। आप बिल्कुल फ़िक्र न करें। अल्लाहताला सब ठीक कर देंगे। आप
अपने मज़हब पर डटे रहें।"
लेकिन अदनान ठहरा बिज़नेसमैन। न तो उसके पास पुलिस की तहकीक़ात
के लिये समय था और न ही अपने ग्राहक खोने की हिम्मत। चेहरा
सफ़ाचट्ट हो गया। ज़बान में फिर से अँगरेज़ी के शब्द वापिस आने
लगे। फिर भी ब्रिटेन की पुलिस के विरुद्ध बुड़बुड़ाहट तो होनी
ही थी, "ये
साले गोरे अपने आपको समझते क्या हैं?..
यह भी कोई डेमोक्रेसी हुई?...
बातें ऊँची-ऊँची करते हैं, लेकिन अन्दर से साले सभी एक ही
हैं।..... इस देश में मुसलमान होने का मतलब है कि आप हो गये
आतंकवादी!
यह भी कोई तरीक़ा हुआ?
"
अदनान के दोस्त इमाम साहब भी हर जुम्मे को नमाज़ के बाद टोनी
ब्लेयर और जॉर्ज बुश के ख़िलाफ़ आग उगलते। अदनान के लिये इमाम
साहब के शब्द जैसे अल्लाह के फ़रमान से कम नहीं थे। अदनान चाह
कर भी 'फ़िंचले'
की मस्जिद नहीं जा पाता था। एक तो मस्जिद दूर और दूसरे वहाँ के
इमाम से बातचीत तक नहीं थी। मौलवी साहब के साथ निजी दोस्ती उसे
स्थानीय मस्जिद से दूर नहीं जाने देती थी।
अदनान का कम पढ़ा लिखा होना मौलवी साहब के पक्ष में होता है।
अदनान कभी सवाल नहीं खड़े करता, बस सुनता है और सच मान लेता
है। उन्हें दिक्कत होती है समीना बेग़म से बात करने में। समीना
उनकी हर बात पर सवाल करती है,
"मौलवी
साहब, आप मुसलमान युवकों को यह सलाह क्यों नहीं देते कि जिस
मुल्क में रह रहे हैं, जहाँ का खा रहे हैं, उसे अपना मुल्क
समझें। पढ़ाई लिखाई करें और यहाँ की पॉलिटिक्स में हिस्सा लें।
आप हमारे बच्चों को मा़डर्न शिक्षा के लिये
'एनकरेज
'
क्यों नहीं करते?
"
समीना का सामना करने से मौलवी साहब घबराते भी थे और बचते भी
थे। दरअसल उन्हे आदत पड़ चुकी थी कि लोग उनके सामने झुकें और
उनकी बातों और बयानों पर कोई सवाल न करें। मुश्किल सवाल मौलवी
साहब को परेशान कर देते थे।
मुश्किल में तो इस समय अदनान है। समीना से छुटकारा पाये तो
कैसे?..
लेकिन छुटकारा पाना क्यों चाहता है?
समीना कुछ अधिक अपेक्षाएं भी नहीं रखती। उससे सवाल तक नहीं
पूछती। फिर ऐसा क्यों है कि समीना का चेहरा देखते ही अदनान के
भीतर की कठोरता शब्दों के माध्यम से बाहर आ जाती है। वह स्वयं
यह समझ नहीं पाता। किन्तु समीना की अनुपस्थिति में वह अपने
आपको अधिक ख़ुश पाता है। वह चाहता है कि समीना स्वयं ही तलाक़
की माँग करे और उसे छोड़ कर चली जाए। किन्तु क्या चाह लेने भर
से सब हो जाता है?
समीना का किसी के साथ चक्कर भी तो नहीं चलता। अगर उसको किसी से
इश्क हो जाए तो शायद उसे छोड़ कर चली जाए। यद्यपि वह हमेशा ही
समीना पर इल्ज़ाम लगाता रहता है। मन ही मन जानता है कि समीना
ने शारीरिक तौर पर कभी भी घर की दहलीज़ के बाहर कदम नहीं रखा।
पिछले बारह पन्द्रह सालों में उसने समीना के बदन को छुआ तक
नहीं। उसके जीवन में कम से कम पन्द्रह बीस लड़कियाँ तो इस
दौरान अवश्य ही आई होंगी। लेकिन समीना ने कभी इस बारे में कभी
कुछ नहीं कहा। क्या
'फ़्रिजिड
'
हो गई है?
कई बार तो जब किसी की घर में कुछ बिल्डिंग का काम करने जाता है
तो वहीं किसी अँगरेज़ औरत से संबन्ध बना चुका है। फिर समीना से
शिकायत क्यों है।... एक ही कारण सोच पाता है। नाशुक्री है
समीना। कभी भी अदनान का शुक्रिया अदा नहीं करती कि उसे इतना
बड़ा घर, कार, नौकर सब इस लंदन शहर में मुहैया करवाता है।
ज़लील तो बहुत करता है।
ज़लील महसूस करती है समीना जब अदनान उसे नौकरों के साथ खड़ा
करके टिप देता है। घर में जब कभी भी कोई पार्टी होती है, समीना
अपनी ख़ानसामा शबाना को मीनू लिखवाती है, सामान ख़रीद कर लाती
है, गोश्त, चिकन, मछली आदि आदि लाती है। डाइनिंग टेबल सजवाती
है। शायद इसी लिये पार्टी के बाद अदनान जब सभी काम करने वालों
को टिप देता है तो समीना को भी देता है। उसे अपनी जगह याद
करवाता रहता है। समीना ने वो सभी टिप आज तक जोड़ कर रखे हैं।
ख़र्च नहीं करती। सोचती है अगर अदनान के साथ रही तो फ़रहान और
हिना के काम आ जाएँगे। अगर अलग हो गई तो मुसीबत में काम आएँगे।
मन-ही-मन सोचती तो कई बार है कि अदनान से अलग हो जाए लेकिन
उसकी परवरिश उसे इस बात की अनुमति नहीं देती। फिर सोचती है कि
अब इस उम्र में क्या नयी ज़िन्दगी शुरू करनी। वैसे एक दो बार
अपनी हिना से मज़ाक- मज़ाक में कह चुकी है
–
अपने हिसाब से पूछ चुकी है
–
कि अगर उसे कोई दूसरा आदमी पसन्द आ जाये तो क्या करे ?
और बिटिया ने भी अपनी अम्मी का दिल रखते हुए कह दिया है कि उसे
अपनी माँ का दूसरा निकाह मंज़ूर है।
हिना की शादी हो चुकी है। फ़रहान अभी तय नहीं कर पाया है कि कब
विवाह करेगा। अकेले समय काटना बहुत कठिन कला होती है। समीना ने
पाकिस्तान से आई उन महिलाओं के हक़ की लड़ाई शुरू कर दी जिनके
पति और ससुराल उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं। अदनान को लगता
है कि समीना जान बूझ कर ब्रिटेन में बसे पाकिस्तानियों का नाम
ख़राब कर रही है, "न
मुझे यह समझ नहीं आता कि तुम पाकिस्तानी परिवारों के पीछे
क्यों पड़ गयी हो
?
अपने मुल्क के लोगों को इस परदेस में बदनाम करके तुमको हासिल
क्या होता है
? "
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