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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। हस्ताक्षर ।।

 

 

नोबेल - २००७ से अलंकृत डोरिस लेसिंग

 

खिरकार ८७ वर्ष की आयु में ब्रिटिश उपन्यासकार डोरिस लेसिंग को साहित्य के लिए वर्ष २००७ के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा जब ११ अक्टूबर २००७ को की गई तो यह अदम्य मानवीय जीवन की अद्भुत एवम् आह्लादकारी कामयाबी की सर्वोच्च तसदीक ही है। उम्र के इस पडाव तक आते-आते जब कर्मेन्द्रियाँ एवम् ज्ञानेन्द्रियाँ शिथिलतर होने लगती हैं डोरिस लेसिंग का रचनाकार तीव्रतम सघन संवेदनाओं एवम् अनुभूतियों से जूझता नज़र आता है। उनके लेखन की गति मन्द नहीं पडी है।

 

जुलाई २००७ में प्रकाशित उनका उपन्यास श्जीम ब्समजिश् इसका ज्वलंत प्रमाण है। आधी शताब्दी से भी अधिक के लेखनकाल में ५० से अधिक उपन्यास, कई कहानी संग्रह एवम् संस्मरण उनके नाम दर्ज हो चुके हैं। अभी भी उनकी रचनात्मक ऊर्जा यथावत जागृत है। निस्संदेह उनका रचना संसार बडा व्यापक है। निश्चय ही नारी अनुभवशीलता को महाकाव्यात्मक अभिव्यक्ति एवम् नारी संघर्ष को बौद्धिक विमर्श के केन्द्र में स्थापित करने वाली वे महानतम् नारी सरोकारों वाली महान् लेखिका हैं। अपने लेखन के माध्यम से डोरिस ने विभक्त संस्कृतियों की गहन छानबीन को मुख्य प्रवृत्ति के रूप में विकसित किया।


 

२२ अक्टूबर १९१९ में ईरान (तत्कालीन पर्शिया) में जन्मी डोरिस का व्यक्तिगत जीवन लम्बे संघर्षों की लोमहर्षक दास्तान है। एकान्तिक बाल्यकाल एवम् मानव की स्वतंत्र चेतना को आहत करने वाले थोपे गये विचारों एवम् तज्जन्य संस्कारों का उनकी रचनात्मकता पर गहन प्रभाव पडा। पुस्तकों के प्रति उसे अपार अनुराग था और पुस्तकों के अध्ययन, मनन और अनुशीलन से वह एक विदुषी और जागरूक लेखिका के रूप में ख्याति अर्जित कर सकीं। वे जीवन के प्रारम्भिक दौर में मार्क्सवाद की ओर उन्मुख बनीं तथा कुछ वर्ष रोडेशिया में कम्यूनिस्ट पार्टी की सक्रिय सदस्य भी रहीं। इस दौर की झलक उसकी पुस्तक श्। त्पचचसम थ्तवउ जीम जैवतउश् (१९५८) में मिलती है। डोरिस को मार्क्सवाद की ओर उनके अनुभवों तथा स्व-अनुभूति ने प्रवृत्त किया। जिम्बाब्वे के अपने कार्यकाल में डोरिस लेसिंग ने नस्लवाद, उपनिवेशवादी जकडनों तथा शोषण प्रभावशाली लोगों के हाथों में सत्ता, सुख और समृद्धि के केन्द्रीकरण से व्युत्पन्न घिनौना नखलिस्तान भी महसूस किया। इन दोनों ही आत्यंतिक ध्रुवों के बीच समतामूलक विश्व जो मानवीय गरिमा के ऊर्ध्वतम शिखर पर मंडित हो, से प्रेरित विचार-सरणियाँ उनके लेखन की अन्तर्धाराएँ बन गईं। यही वे घटक रहे कि उनके उपन्यासों, कहानियों और निबन्धों में नस्लीय कूटनीति, अफ्रीकी आंदोलन, लैंगिक विभेदकारी नीतियों, नारीवादी स्वर तथा समाज में परिवार और इन सबसे सर्वोच्चव्यक्ति की भूमिका जैसे यक्ष - प्रश्न केन्द्र में बने रहे। वे जीवन और लेखन में यथास्थितिवादी नहीं बनी तथा वृहत्तर बदलाव के स्वप्न सँजोए रहीं।

 

१९४९ में वे लन्दन आ गई और उनका पहला उपन्यास द ग्रास इज सिंगिंग प्रकाशित हुआ जो कि गोरे उपनिवेशवादियों के समाज के खोखलेपन की परतें खोलता है।  उपन्यास लेखन के उपरान्त लेसिंग ने कविताएँ, नाट्य-कृतियाँ और विज्ञान सम्बन्धी कल्पना प्रधान उपन्यास थ्ंदजंबपमेद्ध भी लिखी हैं। द गोल्डन नोट बुक उसका ऐसा उपन्यास है जो सर्वाधिक पढा और अनूदित हुआ है। यह उपन्यास की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। १९६२ में प्रकाशित यह उपन्यास गोया एक नवीन अभियान का सूत्रपात करता है। नारीवादी लेखन को प्रश्रय देने में उनके इस उपन्यास की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। १९६२ में प्रकाशित यह उपन्यास आत्मकथ्यात्मक एवम् स्वानुभवजन्य है। लेसिंग नारीवाद को इन्सानियत की वृहत्तर मुक्ति से ही जोडकर देखती हैं। द गोल्डन नोट बुक इसी संश्लिष्ट किस्म की नैसर्गिक मुक्ति का प्रतिपादन करता है। द गोल्डन नोट बुक में अपने साहसिक कथानुभव में डोरिस ने अपने उपन्यास की महानायिका मार्था क्वैस्ट में समसामयिक नारी के बहुमुखी व्यक्तित्व को आश्चर्यजनक गहराई एवम् बारीकी से व्यक्त किया है। उपन्यास में अन्ना वुल्फ स्वयं लेखिका लेसिंग की ही भाँति क्रूर प्रामाणिकता के लिए संघर्षरत है क्योंकि उसका उद्देश्य अव्यवस्था, जज्बाती जडता और आडम्बर को उखाड फेंकना है जो उसकी पीढी को बुरी तरह संक्रमित कर रहे थे। व्यक्तिगत और रचनात्मक संकट से घिरी अन्ना वुल्फ अंततः मानसिक आघात का शिकार हो जाती है। इस बिखराव से अन्ना को समग्रता का नवीन जीवन दर्शन मिलता है।

 

उनके लेखकीय जीवन को मुख्य तौर पर - वामपंथी, सूफी आध्यात्मिक - मनोवैज्ञानिक एवम् विज्ञान कथात्मक शीर्षकों में जाना जा सकता है या इन केन्द्रीय प्रवृत्तियों के अन्तर्गत उनका समग्र लेखन समाहित किया जा सकता है। नोबेल अकादमी ने प्रशस्ति में उन्हें स्त्री अनुभव के महाकाव्य का रचयिता कहा है। अपने राजनैतिक विचारों और नस्लीय सरोकारों के कारण दक्षिण अफ्रीका से अतीत में निष्कासित लेखिका का चार दशक बाद १९९५ में उसी मुल्क में हुई अभूतपूर्व जय-जयकार को समय की विडम्बना तो कहा ही जा सकता है परन्तु यह उस जीवन-दृष्टि की भी जय-जयकार है जिसके लिए डोरिस लेसिंग आधी शताब्दी से अधिक अपने लेखन में संघर्षरत रहीं। विश्व साहित्य के उच्चतम शिखर पर अलंकृत डोरिस लेसिंग निश्चय ही बधाई एवम् श्लाघा की पात्र हैं।

  ( मधुमती से साभार)

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