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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। हलचल ।।

 

 

कौन कुटिल खल कामी’ का लोकार्पण
 

व्यंग्य

दिल्ली। लेखन एक बहुत कठिन कर्म है जिसमें अपने को छिपाने की चतुराई नहीं चलती है। व्यंग्य लेखन और आत्मकथा लेखन में चतुराई नहीं चलती है। आप व्यंग्य के माध्यम से ऐसी मार करते हैं जो मार हो और लगे भी नहीं। प्रेम जनमेजय अपने लेखन के द्वारा ऐसा ही कठिन कर्म कर रहे हैं।’ ये उद्‌गार प्रसिद्ध आलोचिका निर्मला जैन ने प्रेम जनमेजय के, ’अक्षरम्‌’ द्वारा हिंदी भवन दिल्ली में आयोजित, ’ग्रंथ अकादमी’ द्वारा सद्यः प्रकाशित व्यंग्य संकलन ’कौन कुटिल खल कामी’ का लोकार्पण करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने सबसे पहले लेखक को बधाई दी कि वह रचना के अकाल से बाहर निकल आया है। उन्होंने लेखक की इस बात की भी प्रशंसा की कि उसमें ईमानदारी ज़िंदा है और इसी ईमानदारी के तहत उसने भूमिका में अपने रचना-अकाल से संघर्ष करने में रवींद्र कालिया और ज्ञान चतुर्वेदी के सहयोग को रेखांकित किया है। प्रेम जनमेजय के व्यंग्य अपने प्रहार में निष्ठुर हैं पर उनमें मानवीयता निरंतर बनी हुई है। निर्मला जैन ने प्रेम जनमेजय के लेखकीय फक्कड़पन की प्रशंसा भी की।

मुख्य अतिथि डॉ. कन्हैयालाल नंदन ने कहा कि प्रेम जनमेजय जैसे ’खतरनाक’ रचनाकारों से सावधान रहना चाहिए क्योंकि इनकी दृष्टि बहुत पैनी है। इनकी कलम ईमानदार कलम है जो अपनी विसंगतियों पर भी बेहिचक प्रहार करती है। वे दिशायुक्त प्रहार करते हैं और निरर्थक बहकते नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कुटिल खल कामी के गर्मागर्म बाज़ार में कौन नंगई कर रहा है और कौन इस सबमें उजला दिख रहा है इसका ज्ञान यह संकलन देता है। ज्ञान चतुर्वेदी ने कहा कि मैं इस संकलन को एक उपन्यास की तरह, बहुत सारे काम छोड़कर, एक ही सिटिंग में पढ़ गया, यह किताब की ताकत को बताता है। प्रेम जनमेजय ने इस किताब के द्वारा नई ज़मीन तोड़ी है। प्रेम ने रेत में बीज डालने का काम किया है। उन्होंने अपनी सोच को तोड़कर बाहर आने का प्रयास किया है। प्रदीप पंत ने प्रेम जनमेजय की मुहावरेदार भाषा और विषय वैविध्य की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि प्रेम जनमेजय उन गिने चुने व्यंग्य लेखकों में हैं जो तात्कालिक घटनाओं पर मात्र व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ नहीं करते हैं अपितु दूर तक मार करने वाली रचना का सृजन करते हैं। और यही कारण है उनकी रचनाओं में नेताओं पर व्यंग्य कम हैं। हरीश नवल ने कहा कि प्रेम का व्यंग्य प्रयोजनीय व्यंग्य है। प्रेम ने भूमिका में अपने जिस अकाल की चर्चा की है, वो अकाल नहीं है बहुत दिनों से जिस जमीन पर कोई फसल नहीं उस जमीन के अधिक उर्वर होने की प्रक्रिया है। ये परती के बाद की परती-कथा है। प्रेम जनमेजय जैसा भाषिक प्रयोग हमारे समय के व्यंग्यकारों में बहुत कम है। दिविक रमेश ने कहा कि प्रेम जनमेजय उन गिने चुने व्यंग्यकारों में से हैं जिन्होंने व्यंग्य को फूहड़ होने से बचाया है। भाषा पर इनकी पकड़ बहुत गहरी है। प्रेम जनमेजय की रचनाओं में एक तरह की महाकाव्यात्मकता है। ये खतरा मोल लेते हुए व्यंग्य करते हैं और स्वयं को भी कटघरे में रखते हैं। प्रेम की रचनाओं में हास्य की कमी है और ये व्यंग्य के साथ हास्य का घलमेल कम ही पसंद करते हैं और यही कारण है इनका हास्य भी चुटीला होता है।

 

इस अवसर पर गद्य व्यंग्य पाठ का भी आयोजन किया गया जिसमें विष्णु नागर, ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेम जनमेजय, प्रदीप पंत, हरीश नवल, राजेश कुमार ने अपनी रचनाएँ पढ़ीं। कार्यक्रम का संचालन राजेश कुमार ने किया और धन्यवाद ज्ञापन अध्यक्ष अनिल जोशी ने किया। कार्यक्रम में प्रभाकर श्रोत्रिय, बालस्वरूप राही, शेरजंग गर्ग, अनूप श्रीवास्तव, प्रताप सहगल, प्रभात, नरेश शांडिल्य, वीरेंद्र सक्सेना, जगदीश चंद्रिकेश, सुभाष चंदर, मनोहर पुरी, पुष्पा राही, के.पी. सक्सेना(दूसरे), ललित लालित्य समेत शताधिक साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

 प्रवीण शुक्ल, कार्यक्रम संयोजक ’अक्षरम्‌’, दिल्ली की रिपोर्ट)

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