vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। गीत ।।

 

 

स्वप्न मृगी के पीछे-पीछे

 

स्वप्न मृगी के पीछे-पीछे

उमर बावली कितनी दौड़ी

और हताशा की बेला में

साँसों की भी प्याली तोड़ी ।

 

चादर छोटी देह बड़ी थी

सो आपस में आन पड़ी थी

तार-तार हो गयी चदरिया

अब पछताए देह निगोड़ी ।

 

आकुल-व्याकुल मन की मैना

बहुत अँधेरी शीतल रैना

निर्जन वन मे इतना भटकी

उसने भोर की आस न छोड़ी ।

 

हँसती रही स्वप्न-सी माया

मूरख को कितना भरमाया

छोड़ चली संग काया छाया

हाथ लगी न माया कौड़ी ।

    मीरा शलभ

243, सेक्टर-1, चिरंजीव विहार

गाजियाबाद - 201002

 ◙◙◙

गीतकार

- जगत प्रकाश चतुर्वेदी

- डॉ. जगदीश सलिल

- श्रीमती मीरा शलभ

- राम अधीर

- डॉ. अशोक गुलशन

 

माह का गीतकार

- राकेश खंडेलवाल

....नाम तुम्हारा

....किसके चित्र बनाती

....वक्त की हवायें

....लड़खड़ाने लगी बाग में

....एक विधेयक-आँखों ने

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google