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प्रत्थर की पूजा से ऊब गया मन
पत्थर की पूजा से
ऊब गया मन
कितनी ही आकृतियाँ, कितने ही रंग
कितनी ही छैनी ने अपनाये ढंग
किन्तु मौन पत्थर को मिले नहीं शब्द
जीवन-स्थापन के स्वप्न हुए भंग
पत्थर से टकराकर आज सृजन हार गया
अंदर निर्गंध और माथे पर चन्दन
चंदा ने पाहन को बहलाया खूब
बरखा ने पानी को नहलाया खूब
सूरज की गरमी ने सुलगाई आग
हारे सब, पत्थर पर खिल न सकी दूब
मूरत को भूले से बाँहों में भर बैठा
धड़कन का नाम नहीं, छार हुआ तन
तुम चाहो जो चूमो पत्थर का माथ
छालों से भर डालों तुम अपना गात
जड़ता की मांग भरो कुंकुम से चाहे
जड़ता का गति के संग बोलो क्या साथ
जिस पर से आवाज़ें टकराकर लौट गयीं
ऐसे मनहीनों का कैसा अभिनन्दन ।
डॉ. जगदीश सलिल
आलोकन,
दानाओली, लश्कर,
ग्वालियर,
म.प्र. - 474001
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