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वृक्ष हैं किनारों के
और हम दो-चार दिन मिल लें
वृक्ष हैं हम
अब किनारों के
!
बंद होंगी जब,
हवाओं के लिए भी सीढ़ियाँ
क्या हमें पहचान लेंगी,
कल सुबह की पीढ़ियाँ
डाल पर कुछ और हम खिल लें
फूल हम
अंतिम बहारों के
!
आ रही डोली,
दिखाई दे रहे मस्तूल
आज की मीनार है यह,
सिर्फ़ कल की धूल
पास आती आहटें सुन लें
चल पड़े हैं
पग कहारों के
!
साथ थे हम जिस तरह, पंखुरी
गुलाबों की
थी यही तस्वीर, अपने चंद
ख्वाबों की
एक पल सपने वही बुन लें
हम दिये
बुझते सितारों के
!
जगत प्रकाश
चतुर्वेदी
देवाश्रय,
आश्रम रोड, मैनपुरी, उ.प्र.
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