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सृजनगाथा
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वागर्थ प्रतिपत्तये
वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008
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।। गीत ।।
गैया खूब रँभाती है
मेरे बाबा आओ न
मुझको गले लगाओ न
याद तुम्हारी आती है
मुझको बहुत सताती है
आके
दरस दिखाओ न
दादी-अम्मा रोती है
आँचल खूब भिगोती है
ढाँढस
उन्हें बँधाओ न
बछड़ा नही पिलाती है
उसको
कुछ समझाओ न
टॉमी मुँह बिचकाता है
भैया मुझ चिढ़ाता है
इनको
डाँट पिलाओ न
डॉ. अशोक गुलशन
कानूनगोपुरा, उत्तरी, बहराइच, उत्तरप्रदेश
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गीतकार
- जगत प्रकाश चतुर्वेदी
- डॉ. जगदीश सलिल
- श्रीमती मीरा शलभ
- राम अधीर
- डॉ. अशोक गुलशन
माह का गीतकार
- राकेश खंडेलवाल
....नाम तुम्हारा
....किसके चित्र बनाती
....वक्त की हवायें
....लड़खड़ाने लगी बाग में
....एक विधेयक-आँखों ने
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
तकनीकः प्रशांत रथ