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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। व्यंग्य ।।

 

 मारीशस से

ऐसे भी माँगे, वैसे भी माँगें


रामदेव धुरंधर

 

पन ने दूसरे शहर से आकर इस गाँव में बीच-बीच ज़मीन खरीदी, घर बनाया और घर के आगे एक सुंदर बगिया खिलायी। गेंदा फूल, गुलाब फूल...फूल-ही-फूल। इतने फूलों के नाम जानना यहाँ के लोगों के लिये कठिन था। नाम समझाये तो सपन ही, अन्यथा नाम अनजाने रह जायें। ऐसा नहीं कि यहाँ के लोग फूलों से अनजान थे, लेकिन ऐसा जरूर कि फूल से दूर होते गये थे। पहले आँगन लंबे-चौड़े होते थे, आंगन की कसौटी पर फूलों के मामले में खरे उतरना एक खास शोभा होती थी। सत्युग, त्रेता, द्वापर दूर होते हैं, केवल कलियुग चौखट पर विराजमान है। लोगों के जीवन की परिभाषा भी कुछ ऐसी ही थी। कल सत्य बोलने से काम चल सकता था, आज नहीं। कल त्रेता युग के राम की तरह आज्ञाकारी पुत्र बनने में आन-बान थी, आज घरवाली लात मारकर कहेगी कि खूसट बाप के पांव सहलाने की अपेक्षा मेरी शरण में आ जाओ, तुम्हें प्यार भी दूँगी और तुम्हारे बच्चों की माँ भी बनूँगी। रहा द्वापर, वह तो युद्ध का ही भंडार था, कलियुग केवल उसका पोषण कर रहा है।
 

आज सत्य न बोल सकें, राम न बन सकें, केवल द्वापर की खिचड़ी कलियुग में खाये, इसी बिना पर यह भी कि कल फूल पास थे, आज फूल दूर हैं। लोगों ने कभी फूल बोकर अंजाम देख लिया था। परिवार जंगल की बाँस की तरह बढ़-बढ़ आते थे। पहले तो घर में ऊपर जोड़ा, फिर पीछे और जब आगे जोड़ने की नौबत आयी तो जमीन संकीर्ण होने से फूल कांटे की तरह नजर आये। फूल होते तो रास्ते दे देते, लेकिन कांटे थे तभी तो आगाह किया कि मेरी छाती पर चढ़कर घर फैलाने की मत सोच। वह तो कलजुगी शक्ति थी कि फूल रूपी काँटों को रौंदना बायें हाथ का कमाल बना। इस तरह घर आगे बढ़ते गये और सामने में सरकारी रास्ते का तकाजा न होता तो विस्तार का मारा इन्सान होने से वहाँ भी घर नाम की नाभि गाड़ देते।
 

सपन ने विस्तृत परिवार लेकर कहीं और से यहाँ के लिये कूच किया था। घर नीचे, ऊपर, पीछे आगे बनाया और यह सब छोटी जमीन में ही तो किया, किंतु फिर भी फूलों की बगिया लहलहाने के लिये ज़मीन का अभयदान तो उसे मिल ही गया। लोगों ने रास्ते आते, रास्ते जाते और रास्ते ठहरते यहाँ के फूलों का अध्ययन किया। अपने आँगन के फूल तो काँटों में बदल गये थे, जबकि यहाँ कांटे थे भी तो फूलों के रंग में नज़र आये। दूर के ढोल सुहावने होते होंगे, यहाँ तो अनुभव बना कि पास के ढोल सुहावने होने के साथ नचाने की भी क्षमता रखते हैं। केवल मर्द ही नहीं, बल्कि औरतें भी इस अनुभव की हकदार हुई थीं। अपने आँगन से फूलों को जाते देखकर औरतों ने संतोष किया था कि फूल की जगह घर चौड़े हो रहे हैं। अब सपन के आँगन में बगिया देखकर घर को कसे रखने के साथ फूलों को कसने की भी इच्छा हुई। पूजा के वक्त फूलों के अभाव में मर्दों से झगड़ना पड़ता था, लेकिन एक मुँह झगड़ा किया तो दूसरे मुँह मान लिया कि घर तो फूलों की अपेक्षा फिर भी अच्छा है। बाज़ार से फूल लाये जा सकते हैं, घर तो नहीं। बस, इधर पूजा की तैयारी शुरू हुई उधर मरद से कहा कि फूल खरीद लाओ। परंतु सपन ने तो मानो घर, आँगन फूल और बाज़ार के चौकोण को कुरसी बनाकर अपना नितंब उस पर आसीन कर लिया था। ऐसे आदमी से घोर ईर्ष्या बाद के लिये रख लें, पहले प्रेम से ही काम चलायें।
 

औरतों ने सपन की औरत से प्रेम जोड़ा और मर्दों ने सपन से। बच्चों को भी सपन की बगिया अच्छी लगती थी, इसलिये सपन ने बच्चों में उनका प्रेम उमड़-घुमड़ करने आया। जिधर से भी बच्चे थे या किधर से भी स्त्री अथवा पुरुष प्रेम के आदान-प्रदान में इतने स्वस्थ स्वच्छ और निर्मल थे कि मीठे-से-मीठे का ही प्रवाह उमड़ता था। गले से गला मिलाने और मीठे को मीठा लौटाने की प्रक्रिया में एक आदमी ने एक रोज सपन से कहा, ‘‘भैया, मुझे तो लगता है आप हाथों में जादू लेकर आये हैं। यहाँ की ज़मीन पर फूल कहाँ होते थे, यूँ कहूँ कि फूल बोना यहाँ अँधेरे में तीर चलाने जैसा था। हम जानते थे कि फूल बोना गधाई करने से अधिक कुछ नहीं लेकिन मन को कैसे समझायें ! फूल का मामला होने से अँगुलियाँ अपने आप थिरकने लगती थीं। ऐसी हालत में फूल कैसे न बोते ! हम फूल बोते थे तो समझिये अपनी औरत के लिए। बाहर में किसी से भी दुश्मनी कर लें, लेकिन अपनी औरत और अपने शरीर के किसी अंग से भूले से भी दुश्मनी ठानने की न सोचें। औरत हो तो टेटुआँ या कुछ और दबाकर हाय-माय की हालत में पहुँचा दे। अपना अंग हो तो विद्रोही होकर शरीर के दूसरे अंगों का क्रिया-करम कर डाले। अब कहो न, कलाई थिरकना छोड़े तो बाँह बेचारी क्या कर पाएगी ? गला पानी पीना न चाहे तो पेशाब कैसे उतरे ? पेट खाना न पचाना चाहे तो जीभ कितना भी चटकारा लेकर खाये बदहजमी ही तो बढ़ेगी।’’
 

आदमी इतना न कहता तो भी समझा जा सकता था कि फूल के मामले में सपन यहाँ अवतारिक पुरुष था, अन्यथा यहाँ तो रेत उड़ती रह जाती। विशेष कर यहाँ फूल का मामला हो तो धरती और भी गूँगी-बहरी हो जाये अर्थात् धरती उस औरत की तरह हो जाये जो बच्चे को जन्म देने से कान-मुँह सब बन्द कर ले और इस भीषणता के लिये चाहे उसे अपनी पूरी वासना मार कर पलंग पर निपट अकेले सोना पड़े।
 

परंतु आदमी ने तो झूठ कहा था कि यहाँ फूल महज़ एक सपना था। जितने लोगों ने उस आदमी को सपन से यह कहते सुना उन्हें अपने यहाँ फूल न होने से पहले रोना आया, तत्पश्चात् क्रोध उमड़ा, इसके बाद एक अजीब-सी शांति की अनुभूति हुई। शांति तक आते-आते उन्हें समझ में आ गया था कि सपन को पेड़ पर चढ़ाने, या पालने में झुलाने का यही मीठा व्यवहार अत्युत्तम है। अब लोगों को फूल के लिये बाज़ार दूर लगता था, क्योंकि अपने पड़ोस में एक बगिया झूम रही थी, गा रही थी और अपनी सुंगधि बिखेर रही थी। वैसे, बगिया के झूमने, गाने और सुंगधि लुटाने से तो अपना कोई मतलब नहीं होता लेकिन फूलों से जरूर मतलब होता। लोग यहाँ भी होते थे, अब प्रायः यही बात होती थी कि समझ में नहीं आता अपनी पत्नी को पूजा करने की जल्दी क्यों नहीं रही। फूल के लिये पति को मीलों दौड़ाना उसकी सबसे बड़ी खुजली होती थी। अब फूलों की बगिया सामने हैं तो शायद साली की खुजली रफू-चक्कर हो गयी।
 

ऐसा नहीं कि पूजा नहीं होती, पूजा तो हुई। व्रत भी रखे गये, जन्म-दिन भी मनाये गये। अन्त्येष्टि क्रिया भी पूरी की गयी। स्कूली, उत्सव, राजनीतिक उत्सव, विवाहोत्सव, सुहागरातोत्सव, अर्थात् उत्सव, व्रत, मरण, जीवन, पूजन सब में फूल ही इस हाथ आये तथा उस हाथ उछले। इन सारी माँगों का निबटारा तो पहले-पहल सपन की बगिया ने ही किया, लेकिन फिर बैंक में भारी कमी पड़ने लगी। फूलों को तो शोभा बनाकर आंगन में रखना था, इसलिये फूल तोड़ते वक्त सपन को लगता था कि साक्षात् अपना कलेजा तोड़कर लोगों की हथेली पर रखा है। बड़ों को फूल देते वक्त तो अपने को उदार बताना ही ठीक होता था, अन्यथा मीठेपन में कीड़े पड़ते देर ही कितनी लगती। बच्चे फूल माँगने आये तो उसने जरूर थोड़ी खूँखारी की। कहा कि आज ले जाओ, लेकिन कल मत आना क्योंकि हम घर पर नहीं रहेंगे। परंतु यह बहाना काम कहाँ आया। अगले रोज़ दरवाज़े पर दस्तक पड़ी तो सोचा दूर गाँव का अपना मामू आया होगा या पत्नी का भैया। दरवाजा खोला तो वही बालक सामने था, जिसे घर न रहने का पाठ पढ़ाकर बरगलाया था।
 

माँगने वाले तो माँगने आते रहे। देते-देते हाथ दुखने लगे तो सपन ने एक युक्ति लड़ायी। खुद चला नमक माँगने और पत्नी को दौड़ाया आटे की लिये। बेटे को सिखाकर भेजा कि तेल माँग लाओ तो बेटी से कहा पापा के लिए साबुन माँगने भागो। उसने माँग-चाँग की इतनी जबरदस्त झड़ी लगायी कि फूलों के लिए इधर आने वालों की तमाम नानियाँ एक साथ मरतीं तो भी अरथी पर चढ़ाने के लिए इधर फूल माँगने नहीं आते।

  रामदेव धुरंधर

कारो लीन बेल-एर
मोरिशस

 

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