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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। लघुकथा ।।

 

 युएसए का प्रवासी साहित्य

दो लघुकथाएं


देवी नागरानी 

रिश्ता

 

अमर अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। उच्च शिक्षा के लिए अमरिका जाकर पढने की इच्छा प्रकट की साथ में वादे भी किया कि वह पढ़ाई पूरी करते ही वापस आकर दोनों की देखभाल भी करेगा। दोनों बहुत खुश हुए ।

 

उन्होंने तमाम उम्र की जमा पूँजी लगाकर उसे रवाना कर दिया था ।

 

वहाँ जाकर अमर जल्दी-जल्दी ख़त लिखा करता था पर जल्द ही खतों की रफ़्तार ढीली पड़ गयी। एक दिन डाकिया एक बडा-सा लिफाफा उन्हें दे गया ख़त में कुछ फोटो भी थे। ये अमर की शादी के फोटो थे । उसने अंग्रेज़ लड़की के साथ शादी कर ली थी । ख़त में लिखा था - " पिताजी, हम दोनों आशीर्वाद लेने आ रहे हैं । फकत पाँच दिन के लिए । फिर घूमते हुए वापस लौटेंगे। एक निवेदन भी कि  अगर हमारे रहने का बंदोबस्त किसी होटल में हो जाये तो बेहतर होगा। और हाँ, पैसों की ज़रा भी चिंता न कीजियेगा......" 

 

दोनों को पहली बार महसूस हो रहा था कि उनकी उम्मीदें और अरमान तो कब के बिखर चुकें हैं ।

दूसरे दिन तार के ज़रिये बेटे को जवाब में लिखा - " तुम्हारे खत से हमें कितना धक्का लगा है कह नहीं सकते, उसी को कम करने के लिए हम कल ही तीर्थ के लिए रवाना हो रहे हैं,  लौटेंगे या नहीं कह नहीं सकते, अब हमें किसी का इंतज़ार भी तो नहीं । और हाँ, तुम पुराने रिश्तों को तो नहीं निभा पाये, आशा है, नये रिश्तों को जीवन-भर निभाने की कोशिश करोगे....


अहसास


       "
मैं केटी को ले जा सकती हूँ?"

सधी हुई आवाज़ कानों पर पड़ते ही सर उठाया। देखा सामने सुंदर सी तीखे नाक नक्श वाली ११-१२ साल की लड़की खड़ी थी ।

"आपका नाम ?" 

"मैं टीना हूँ, केटी की बहन। उसे लेने आई हूँ।" संक्षिप्त उत्तर के बाद वह चुप रही।

" हर रोज़ तो उसकी नानी उसे लेने आती है……

वो तो ठीक है, पर अचानक मेरे पिता का फ़ोन आया कि मुझे उसे स्कूल से पिकअप करना है।"

"आपकी नानी कहाँ है और वो क्यों नहीं आई।?"

"वो मेरी नहीं, केटी की नानी हैं। आज क्यों नहीं आई मुझे नहीं मालूम।"

 

जवाब से माथे पर सिलवटें पड़ने लगीं। ये कैसा रिश्ता है? वो केटी की नानी है पर टीना की नहीं!

 

"तुम केटी को कहाँ ले जाओगी?”

"इसके मम्मी-पापा के घर।" टीना का छोटा-सा उत्तर पाकर मैं फिर उलझ गई।

"और तुम कहाँ जाओगी?"

"अपने घर" सरलता से उसने मुस्कराकर जवाब दिया।

"तुम वहाँ क्यों नहीं जाओगी?"

"क्योंकि मैं अपनी मम्मी के पास रहती हूँ, और पापा केटी की मम्मी के साथ।"

 

ऐसे जवाब सुनकर कौन कहता है भावनाओं को ठेस नहीं लगती? कौन कहता है रिश्तों की ज़रूरत नहीं पड़ती? पर जो रिश्ते बेमतलब के हों, उनका न होना ही बेहत्तर है । मैं अपनी सोच की दुनिया में खोई थी, इस बात से बेखबर कि - केटी और टीना अभी तक वहीं मौजूद हैं।

 

"मैम क्या मैं केटी को ले जा सकती हूँ?" टीना की इस आवाज़ ने मुझे जगा दिया।
       "
हाँ! रजिस्टर में साइन करके उसे ले जा सकती हो।"

 

.....और मेरे आँखों के सामने स्वार्थ के सिंहासन पर बैठे  आदम और मासूमियत से मुस्कान छीनने वाले अपराधी चेहरे साफ-साफ नज़र आने लगे !

देवी नागरानी

न्यू जर्सी

 

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