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युएसए
का प्रवासी साहित्य
पुनर्जन्म
रचना श्रीवास्तव
जब भी मैं आइना देखती हूँ
चेहरे पर
वक़्त
की छाया देखती हूँ
गालों की इन लकीरों में छुपी
समय
की गर्द को धीरे से छूती
हूँ
उसे हटाने की नाकाम कोशिश करती हूँ
और बहुत दुखी होती हूँ
उम्र से
लड़ते लड़ते मै हार गई
और सिलवटें चेहरे पर अपना घर बना गई
कुमारी से श्रीमती
और श्रीमती से माँ की
सफ़र
में
मैं तो कहीं खो गई
अचानक
माँ माँ की आवाज़
से सोच टूटी मेरी
बेटी जो घुटनों तक आती थी
आज ऊँगली पकड़ बुलाती थी
मेरी
यह जो व़क्त
चेहरे पर झुर्रियाँ बना रहा
था
वही मेरे
ज़िगर
के टुकडों की
उमर भी बढ़ा रहा था
नन्ही हथेलियाँ अपनी लकीरें बना रहा थी
पर एक माँ के माथे
पर गर्व की एक और गाथा भी गा रही थी
इन्हे बड़ा होते देखने में जो खुशियाँ
हैं
माँ के लिए तो वही उसकी सारी दुनिया है
नन्ही आखों के आईने में अपने खोये
समय को देखती हूँ
छोटी होती हूँ,
जवान होती हूँ और उमर दराज़ हो जाती हूँ
फिर
से आइना देखती हूँ चेहरे की इन लकीरों को देखती हूँ
पर
अब में खुश
होती
हूँ
क्योंकि इन रेखाओं में अपने जीवन
अपनी आत्मा,
अपने बच्चों को बड़ा
होती
देखती हूँ
Rachana
srivatav
5201 PAR Drive, Denton, TX
USA-76208
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