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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 युएसए का प्रवासी साहित्य

पुनर्जन्म


रचना श्रीवास्तव

जब भी मैं आइना देखती हूँ
चेहरे पर वक़्त की छाया देखती हूँ
गालों की इन लकीरों में छुपी
समय  की गर्द को धीरे से छूती हूँ
उसे हटाने की नाकाम कोशिश करती हूँ
और बहुत दुखी होती हूँ
उम्र से लड़ते लड़ते मै हार गई 
और सिलवटें चेहरे पर अपना घर बना गई
कुमारी से श्रीमती और श्रीमती से माँ क सफर में
मैं तो कहीं खो गई
अचानक
माँ माँ की आवाज़ से सोच टूटी मेरी
बेटी जो घुटनों तक आती थी
आज ऊँगली पकड़ बुलाती थी मेरी
यह जो वक्त चेहरे पर झुर्रियाँ बना रहा  था
वही मेरे ज़िगर के टुकडों की उमर भी बढ़ा रहा था
नन्ही हथेलियाँ अपनी लकीरें बना रहा थी
पर एक माँ के माथे पर गर्व की एक और गाथा भी गा रही थी
इन्हे बड़ा होते देखने में जो खुशियाँ  हैं
माँ के लिए तो वही उसकी सारी दुनिया है
नन्ही आखों के आईने में अपने खोये समय को देखती हूँ
छोटी होती हूँ, जवान होती हूँ और उमर दराज़ हो जाती हूँ
फिर से आइना देखती हूँ चेहरे की इन लकीरों को देखती हूँ
अब में खुश होती हूँ
क्योंकि इन रेखाओं में अपने जीवन

अपनी आत्मा, अपने बच्चों को बड़ा होती देखती हूँ

   Rachana srivatav
5201 PAR Drive, Denton, TX
USA-76208

 

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