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युएसए
का प्रवासी साहित्य
दो कविताएँ
डॉ. कमल
किशोर सिंह
चेहरे की लकीरें
कुंठित नहीं मैं देख कर,
सब स्वेत केश कपाल पर,
आँखों पर आए आइना,
उभरी लकीरें गाल पर।
भय है मुझे कि भविष्य में
ये धमनियाँ न धीमी न हों,
स्मृति-पटल धुमिल न हों,
साँस ये बोझिल न हो,
पाँव ये शिथिल न हो।
देख चेहरे की लकीरें,
चिन्ता नहीं बेकार कर,
तन-त्रुटियाँ अंदर न आयें,
निवारक नित नये उपचार कर,
सन्तुलित अल्पाहार कर,
तू स्वयं का ऋंगार कर,
शिथिल परे हर तन्तु में,
नव शक्ति का संचार कर,
अरे! राह लम्बी है अभी,
धीमी नहीं रफ़्तार कर।
आ जाओ मेरे पास प्रिये
दुर्दिन में दूरी दुसहनीय,
आ जाओ मेरे पास प्रिये।
ये भवन भयावह लगता है,
उपवन करता उपहास प्रिये।
घनघोर घटा गर्जन तडपन,
ज्यों टूट रहा आकाश प्रिये,
तोड-फ़ोड झक्झोर मचाता,
आता झंझावात प्रिये।
हड्डी तक हिलने लगती,
जब होती है हिमपात प्रिये.
बंदी बन बैठा हूँ घर में,
लिपटे हुये लिहाफ़ प्रिये।
मन सूनापन दूर न करते,
दुर्दर्शन,
दुर्भास
प्रिये।
संग तुम्हारे सह लूँगा सब,
मौसम के उत्पात प्रिये।
पास तुम्हारे प्रलय का पल,
भी लगता मधुमास प्रिये.
दुर्दिन मेन दुरी दुसहनीय,
आ जाओ मेरे पास प्रिये।
डॉ. कमल किशोर सिंहं
रिवर्हेड,
न्युयोर्क,यू.एस.ए
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