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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। कविता ।।

 

 युएसए का प्रवासी साहित्य

समय


शकुन्तला बहादुर

 

समय

 

ये. समय का काफिला बढ़ता गया,

और हम भी साथ में चलते गये।

एक पल को भी नहीं थकता समय,

एक पल को भी नहीं रुकता समय।

हो सुखी चाहें दुखी कोई कहीं

समय पर कुछ भी असर होता नहीं।

बात अचरज की मुझे लगती सदा,

एक ही गति से समय चलता सदा।

फिर खुशी में क्यों समय

लगता है जैसे भागता।

और संकट की घड़ी में

समय जैसे रुक गया।

क्यों परीक्षा में समय की ये घड़ी,

तीब्र गति से बागती है सर्वदा।

और प्रतीक्षा की घड़ी  लम्बी गले,

ये समय थककर हो जैसे सो गया।

जन्म से ले मृत्यु तक का फासला,

बालपन तरूणाई और वार्धक्य बन।

कब, कहाँ, कैसे फिसलता ये रहा,

और हमें प्रतिफल ये छलता सा रहा।

ज़िन्दगी ये बीत जाएगी मगर,

समय को इसकी कहाँ होगी खबर।

समय का हर एक पल बहुमूल्य है,

यदि इसे मोती समज हम पिरो लें।

ज़िन्दगी में फिर पछताएँ कभी,

सफल होकर चैन की सब साँस लें।।

 

  शकुल्तला बहादुर

यू.एस.ए

 

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