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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कहानी ।।

 

 युएसए का प्रवासी साहित्य

धूप


डॉ. सुदर्शन प्रियदर्शिनी

 

ब हम साथ नहीं रह सकते।

 रेखा नहीं जानती कि ये शब्द कैसे अपने आप आज निकले थे, जो विशाल तक पहुँचने से पहले उसके हाथ में पकड़े जाय के कप पर ठहर गये थे और चाय की ऊपरी सतह पर तैर रहे थे...। चाय के कप थी ...........पन बढ़ गई थी। शायद इस शब्दों का भारी पन सतह पर बैठ नही पा रहा था।

 

दोनों की नज़रें मिली जैसे खाली वोटर हों और जिनका सब कुछ बहुत पहले ही झर चुका हो।

 

विशाल की आँखें उस ओर उठी और फिर जैसे हताहत पक्षी की तरह नीचे बैठती गई...। सुबह-सुबह उसकी आवाज़ में जो अन्यथा भड़क और रोष होता था, वह वहीं झाग हो गया था। उसे लगा होगा कि वह शायद रोज़ कुछ ज़्यादा ही कहता था अटकता रहा है।

 

चाय का कप धीरे-धीरे होठों की सीमा तक पहुँचने से पहले ही थरथरा गया था और बिन आवाज़ किए बीच की टेबल पर ढेर हो गया था।

 

एक अजगर-सी चुप्पी दोनों के बीच पसर गई थी। रेखा जानती थी वह ऊँचा-ऊँचा बोलेगा, गालियाँ देगा और उस के सारे खानदान की खपचियाँ उधेड़गा। लेकिन विशाल ने कुछ भी नहीं किया रोज़-रोज़ की किचकिच का अगुआ आप बिल्कुल चुप्पी साध गया था।

 

वह उठी और पैटियों का (Patio) दरवाज़ा खोल कर बाहर घास पर चक्कर काटने लगी। विशाल ती सुन्न पड़ी आँखे उस के हाथ में ठिठकी-कांपती प्याली उसके साथ चली आई थी। वह चाहती थी इस समय वह उस से पूरी तरह कट कर-बाहर खुली हवा मे साँस ले सके लेकिन उस की साँस रुक रही थी। चाय की प्याली अभी भी डगमगा रही थी।

 

उसे स्वयं मालूम नहीं था कि बिना किसी योजना के ये शब्द कैसे आप अचानक उछल कर बाहर आ गए थे। पर वह जानती है कि ऊपरी तैयारी से ज़्यादा कही भीतरी तैयारी होती है जो अन्दर ही अन्दर कहीं पकती रही थी और बाहर ख़बर तक नहीं हुई शायद यह उसी का नतीज़ा था। अब उसे अन्दर की तैयारी के साथ-साथ बाहर की तैयारी भी करनी थी।

 

कुछ साल पहले के छोटू के शब्द आप को तलाक ले लेना चाहिए मम्मी हट, कह कर कैसे उस ने छोटू की झिझोंड़ दिया था। ख़वरदार । जो ये शब्द कभी भूल कर भी जबान पर लाया।

 

शायद उस दिन से कहीं अंदर की तैयारी का बीच पड़ गया था।

 

अब सुबह पूरी तरह से उठ चुकी थी। पिछवाड़े के झुटपुटों से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी और अलसाई-अलसाई धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

 

रेखा ने बीती रात को बहुत पहले ही अपने पर से उतार कर अलग कर लिया था। वह अक्सर उठते ही सब से पहले नाइट-सूट उतार कर-रात को अपने से परे धकेल देती थी। आज भी चाय बनाने से पहले, उसने यही किया था। पर लगा कि रात विशाल की जाली से अभी तक चिपकी पड़ी है और सारे घर को भी घेरे हुए है।

 

मालूम नहीं विशाल क्या कर रहा है। वहीं बैठा है या उठ गया है। उसे नहीं लगा कि उसे यह जानने की कोई ज़रुरत होनी चाहिए कि वह क्या कर रहा है। जब साथ नहीं रहना तो यह जानने की इच्छा भी छोड़नी पडे़गी। दो कटे हुए हिस्सों को क्या पड़ी है कि वे जानें कि दूसरा हिस्सा क्या कर रहा है।

 

जब से वे इस घर में आये हैं तभी से वह विशाल से कहती रही है कि लॉब के चारों तरफ लोहे की रेलिंग लगवा दें - प्राइवेसी रहती है। बच्चे खेलते हैं तो चिंता नहीं रहता । और स्वयं को भी कभी-कभी एकांत क्षणों की ज़रुरत पड़ती है । आज उस रेलिंग की सबसे ज़्यादा ज़रुरत है । पर वह वहीं नहीं है। बेरोक-टोक सामने वाला आज उस को अंदर झांक तक सकता है।

 

बहुत सी चीज़ें ऐसी रही हैं जिन्हें ज़िंदगी भर-करने या पाने की सोंचती रही है पर कभी हासिल नहीं कर पाई। बिना पाये की ज़िंदगी तो कट जाती है। कट गई। जैसे दूसरे की स्कीमों पर बने घरों में उम्र कट जाती है। अपनी मनपसंद की चौखट कभी मिल ही नहीं पाती। इसलिए दूसरों के बनाये हुए साँचों में ढले चले जाते हैं और अपना नाप-तोल भी भूल जाते हैं। इस घर में कई चीज़ें ऐसी थीं जो रेखा को शुरु से ही पसंद नहीं थी। घर में घुसते ही ड्राइंगरूम बिल्कुल खुला-सपाट-पूरीतरह उघडा हुआ-नंगा-फैलाव जैसे आते ही किसी को नंगा-पकड़ लिया है। कहते-कहते थक गई कि यहाँ एक सुन्दर सा-लकड़ी का जंगला लगवा दो ताकि रास्ते और ड्राइंग रूम को अलग किया जा-सके-पर विशाल सुनता ही कहाँ है....।

 

आज क्यों लग रहा है कि सब कुछ कहीं नियोजित था। वह कहती-तुम जानते हो कितने अमेरिकन हो गये हो।

अमेरिका में रहना है तो अमेरिका होने में क्या बुराई है।

 

अमेरिका में सब कुछ अच्छा नहीं है।

ऐसा बुरा भी कुछ नहीं है।

दोनों में इस विषय पर अक्सर-बहस होती रहती। विशेषता जब विशाल बच्चों पर स्कूल से पहले और स्कूल के बाद बाहर काम करने पर जोर देता। या कहीं रेस्टांरेंट में दोनों जाते और विशाल एक की बजाय दो अलग-अलग बिल मँगवाता। वह कहीं अंदर से टूट जाती और उसके मुँह का स्वाद कसैला हो जाता। उस का मन करता-उसी समय वहाँ से उठ कर चली जाए। कभी-कभी रेखा में हीनता की भावना इन बातों से इतनी गाढी हो जाती कि वह अपने-आप को कोसती - वही बोड़म है - अभी तक अपने संस्कारों की पकड़ में जकड़ी है। ज़माने के साथ बढ़ नहीं पा रही है। उसके अपने-अन्दर ये नोच-खसोट चलती रहती।

 

पर उसे लगता है धीरे-धीरे टूटते हैं तार....धीरे-धीरे ही टूटते हैं संबध -यह लुहार की ठोक से नहीं - सुनार की ठुक-ठुक से ही बनते और बिगड़ते हैं । भानुमति का कुनवा न एक दिन में बनता है और न एक दिन में टूटता है।

 

आज यह फैलता - जो अचानक एक ठोस निर्णय बन कर निकला-कहीं अंदर पल रहे इसी ज्वालामुखी का विस्फोट था । आज किसी ठोस ज़मीन-आधार या सहारे के बिना भी-यह निर्णय स्वयं डट कर उस के सामने खड़ा हो गया। अपने लिए या बच्चों की यदा-कदा सहायता करने के लिए उस के पास कुछ भी नहीं है। विशाल से किसी तरह की कोई अपेक्षा रखना दीवार में सिर फोड़ने वाली बात है। वह तो इतना स्वार्थी और स्वयंसेवी हो गयी है कि घर में बने चिकन की बोटिंया भी पहले अपनी प्लेट में बटोर लेता है और बच्चे देखते रह जाते हैं। पर उसे कोई फ़रक नहीं पड़ता । वह सड़ाप-सड़ाप बेशर्मी से खाता रहता है।

 

उस की इकलौती मैगज़ीन - जो उसने यहाँ आकर, अपनी संस्कृति को क़ायम रखने के लिए चला रखी है, नितांत लंगड़ी है। उस के अधिकतर विज्ञापनन भी विशाल ही लाता है और उन के पैसे बाहर-बाहर वसूल कर ख़र्च कर देता है। मैगज़ीन की कम्प्यूटर सेंटिग, छापा खाना, बांइडिग आदि के बिल, वहीं के वहीं खड़े रहते हैं। हर बार जब नये अंक की तैयारी होती तो सभी बिलों के लिए उसे तंग करते और हिक़ारत और अपमानित नज़रों से देखते । वह अपने में इतनी छोटी होती जाती दिन पर दिन। काफ़ी झिक-झिक के बाद-विशाल कुछ देता और आंशिक बिल देकर गाड़ी आगे ठिलती...। कई-कई दिन वह ऐसी ज़िल्लतें उठाती - और रातों को सो नहीं पाती।

 

विशाल पर उस सब का कोई असर नहीं। उसने अब अपने आप में यह निर्णय ले लिया था कि अलग होकर वह  इस मैगज़ीन को बंद कर देगी। अपने आप के कर्ज़ में और नहीं डुबो सकती। वह पढ़ी-लिखी है कहीं भी छोटी-मोटी नौकरी करके अपना पेट-पाल लेगी और उसे मालूम है, बच्चे बड़े कर्मठ और मेहनती हैं अपने बुते पर खड़े हो जायेंगे और हो रहे हैं। यों मैगज़ीन के माध्यम से वह राज्य के गर्वनर और अन्य बड़े ओहदे-वाले लोगों को जानती है। बड़े-बड़े अखबारों के एडीटर्स और सचिवों को पहचानती हैं, पर उनसे नौकरी नहीं माँग सकती । मैगज़ीन बंद हो गई तो अपने आप व्यक्तित्व का वह भव्य-पहलू तिरोहित हो जायेगा। उस पहलू ने आख़िर दिया भी क्या है....।

 

घूमते-घूमते वह घर के पिछवाड़े से सामने वाले लॉन में आ गई है। आसमान जैसे रात भर रोया है। सड़क धुली हुई-आर्द्र चुपचाप बिछी है लिथड़ने के लिए।

 

विलगता के अपने ध्रुव होते हैं, जिन्हें कभी तुम छू कर विगलित होते हो तो कभी निःसंग रह कर। दो धार की तलवार की तरह काटती है विलगता।

 

आँख में किरकिरी की तरह चुभते हैं वे बीते हुए दिन-साल-महीने । जिन सालों-महीनों पर अमेरिका आने से पहले रेखा ने ढेरों उमंगों के महल गाढ़ दिए थे। उन सब पर जैसे गाज गिर गई थी । उन सब अरमानों की जैसे किसी ने खटिया खड़ी कर दी थी।

 

 

सामने वाले घर की चिमनी का धुआँ थका-थका ऊपर उठ रहा था। बीच की बुर्जियों से आँख मिचौली खेलती धूप-धूएँ की उड़ान को चकमक कर रही थी। पर चिमनी की बुर्जी का धूँआ-रोशनी को घुटकने की कोशिश कर रहा था...।

 

उस का मन नहीं हो रहा था कि वह अंदर जाए-और विशाल का सामना करे...। ठहरे हुए जल में पत्थर मारने की उस की कोई इच्छा नहीं थी ...। अच्छा था बच्चे घर पर नहीं थे। वह धीरे-धीरे अपना भविष्य तय कर रहे थे - कोई कहीं - कोई कहीँ...।रेखा को इसी घड़ी का इंतजार था। पर दोहरा - विशाल के बदलने और न बदलने की उम्मीद का।

 

अनचाहे सवालों की बेतरतबियाँ उस के चारों ओर फैल गई थी । हाथ की लकीरें दिशाओं के बदल जाने से - बदल जाती होगी। ग्रह-नक्षत्रों को न मानने से वे अपना प्रभाव नहीं छोड़ देते...। पूर्व से पश्चिम में आ गए। इस पश्चिम का अपना पूर्व और अपना पश्चिम । जन्म-पत्रियां ही उल्टी हो गई थी...।

 

फिर भी अंदर तो जाना ही था। विशाल की प्रतिक्रिया जानना ज़रुरी था...। यह नहीं कि वह इस इंतजार में थी कि विशाल उसके समक्ष गिड़ागिड़ायेगा या माफ़ी माँगेगा । ऐसी कोई अपेक्षा उस के मन में नहीं थी। इस समय उस का निर्णय अटल था पर उस पर विशाल की मोहर चाहिए थी...। वह अपने वज़ूद को मज़बूती से पकड़ कर रखना चाहती थी...। अपने इतने बड़े निर्णय को काग़जी नाव की तरह डोलते नहीं देखना चाहती थी।

 

अंदर आई तो विशाल ऊपर गुसलखाने मैं जा चुका था। गुसलखाने के बाहर उस के कपड़े-तौलिया आदि रखे थे जो शायद पहली बार उस ने ख़ुद रखे थे। वह आश्वस्त होकर नीचे उतर आई और घर की चाबी लेकर लाइब्रेरी के लिए निकल गई। उसे उस का उत्तर मिल गया था।

 

धूप खुल कर चंदांवे की तरह उस के माथे को छू रही थी।

डॉ. सुदर्शन प्रियदर्शिनी

246, Stratford Dc

Broadview Hts OH 44147

 

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